Welcome Shankar-Jaikishen fans

GATEWAY OF STUFFS ON SHANKAR-JAIKISHAN

 Follow us on twitter 

https://twitter.com/SJFansAssnHyd

WELCOME!!! to the World of  Shanker-Jaikishen’s  memories. The duo who ruled the Music Scenario of Hindi Film Music with their debut film Barsaat for continuous 20 years like Emperors of Melody are still now most listened but less mentioned.  It is a humble effort to spread information about them, their films and music to their die hard fans. You will find rare articles, photos, stories, anecdotes about them here.

 JOIN US ON FACEBOOK

https://www.facebook.com/groups/sjtheemperorsofhfm/

ALSO PLEASE VISIT INTERESTING BLOG here

https://cinemamagicdays.wordpress.com/

शंकर जयकिशन🎸 और उनका संगीत

By Shyam Shanker Sharma

शंकर जयकिशन🎸 और उनका संगीत
*********************************
हिंदी फ़िल्म जगत का संगीत 1950 से 1970 तक यानी पूरे 20 वर्ष का संगीत शंकर जयकिशन के नाम रहा,1971 में जयकिशनजी के आकस्मिक निधन के बाद भी 1970 से 1980 तक शंकर जयकिशनजी का संगीत रथ अपने अलग अंदाज़ में अपनी पहचान बनाये रखने में कामयाब रहा और यही नहीं 1980 से 1990 के मध्य भी उनकी उपस्थिति दर्ज होती रही।शंकर जी के देहावसान के बाद ही उनका संगीत रथ जो 1949 से गतिवान हुआ था थम गया। जीवन का अंत एक सत्य प्रक्रिया है,किन्तु कुछ लोग अपने कार्यो के कारण मर कर भी अपना अस्तित्व बनाये रखते है उनमे स्वर्णिम नाम शंकर जयकिशनजी का है जिन्होंने अपने विविधता भरे प्रायोगिक संगीत से हिंदी फ़िल्म संगीत का नक्शा ही बदल दिया और उसे अपने संगीत की परिभाषा प्रदान की जो सभी के दिलो में राज करने में सफल रहा! आखिर ऐसा क्या जादू था उनके पास! या कोई अलादीन का चिराग था जो वो चाहते वैसा ही संगीत उत्पन्न हो जाता।संगीत में जादू तो होता है जो प्रायः आम प्रचलन में कहा जाता है किन्तु वास्तव में यह एक तपस्या है संगीत की साधना है उसके प्रति सम्पूर्ण सृजन है।शंकर जयकिशनजी जिज्ञासु प्रवति के संगीत साधक थे।जिज्ञासा तो बस उनके लिए संगीत ज्ञान के लिए अभीप्सा थी,पुकार थी त्वरा थी,उसी के दम पर उन्होंने लगभग 36 वर्षो तक अपना वजूद बनाये रखा और भारतीय फ़िल्म इतिहास के एक मात्र ऐसे संगीतकार बने जिनके पास काम सदा आता रहा बिना मांगे और अंतिम साँस तक! वह ज्ञानी संगीतकार थे और ज्ञानी सरल और छोटे बच्चों की मानिंद होता है….सदा ही सिखने को उत्सुक!ज्ञानी का सही अर्थ है ध्यानी..जो ध्यान पूर्ण है,वही ज्ञान पूर्ण है।इसी कारण इस जोड़ी को सर्वाधिक बार फ़िल्म फेयर अवार्ड्स से नवाजा गया ,पद्मश्री से सम्मानित होने वाले प्रथम संगीतकार बने। इनके हिट गानो की फेहरिस्त इतनी लंबी है जो उन्हें सर्व श्रेष्ठ स्थापित करती है।
अक्सर यह कहा जाता रहा है कि शंकर जयकिशन को राजकपूर ने बनाया जो संगीत की गहराइयो को समझतें थे पर में इससे सहमत नहीं हूँ!हाँ राजकपूर ने उन्हें अवसर दिया और अवसर उसी को प्राप्त होता है जो उसके योग्य हो।राज कपूर की कुल 19 फिल्मो में शंकर जयकिशनजी ने संगीत दिया जिसमे 9 फिल्मे RK के बैनर तले बनी और प्रायःसभी फिल्मो का संगीत हिट रहा किन्तु शेष लगभग 165 फिल्मो का संगीत शंकर जयकिशन ने RK की फिल्मो के अतिरिक्त दिया और वो बिना राजकपूर के अन्य फिल्मो में सुपरहिट संगीत प्रदान करने में सफल रहे,जो उनकी काबिलियत को दर्शाता है। अगर राजकपूर संगीत का इतना गंभीर ज्ञान रखते थे तो उन्हें कम से कम से कम एक फ़िल्म में तो संगीत देकर स्वयं को साबित तो करना चाहिए था जैसा कि किशोर कुमार ने दूर गगन की छाँव में, झुमरू इत्यादि फिल्मो में देकर स्वयं को प्रमाणित किया!वस्तुतः राजकपूर ने उनके संगीत का दोहन कर अपने संगीत बैंक को भर लिया और सफल व्यवसायी बन गए जिसका उपयोग वो राम तेरी गंगा मैली तक करते रहे ,शायद अब भी वह संगीत खज़ाना कई मासूम धुनों को समेटे धूल खा रहा होगा।शंकर जयकिशन राजकपूर के मासिक वेतन भोगी संगीतकार थे जिनसे RK जमकर काम लेते थे और दूसरी फिल्मो के लिए शंकर जयकिशनजी को पर्याप्त समय मिल ही नहीं पाता था,फिर भी शेष बचे हुए समय का शानंदार उपयोग करने में उन्होंने कमी नहीं छोड़ी और सफलता का शिखर पर जा पहुंचे।सच मे महसूस किया जाय तो संसार की सबसे खूबसूरत और दर्शन आधारित फ़िल्म मेरा नाम जोकर ने सभी न केवल राज कपूर को बर्बाद कर दिया अपितु यह फ़िल्म शैलेन्द्र और शंकर जयकिशनजी को भी नुक्सान पहुँचाने वाली फ़िल्म साबित हुई।जोकर में व्यस्त होने के बाद राजकपूर फ़िल्म तीसरी कसम को समय ही नहीं दे पा रहे थे जिससे शैलेन्द्र जी की फ़िल्म समय पर तैयार ही नहीं हो पाई और अधिक समय के कारण उनका बजट बिगड़ गया,फ़िल्म का सही समय पर रिलीज नहीं होना शैलेन्द्र जी को भारी पड़ा और एक यादगार बेहतरीन फ़िल्म फ्लॉप हो गयी और उसी गम में वो चल बसे।6 वर्षो तक शंकर जयकिशनजी को भी जोकर में व्यस्त रहना पड़ा इस कारण वो अन्य फिल्मो के साथ न्याय नहीं कर पा रहे थे और दूसरे संगीतकार इस अवसर का पूरा लाभ उठा रहे थे और अपने पैर ज़माने में सफल हो रहे थे।और फिर आई चिर प्रतिक्षीत फ़िल्म जोकर जो बुरीतरह फ्लॉप हो गयी! जयकिशन जी का भी निधन हो गया और एक युग की समाप्ति हो गयी,राज कपूर बर्बाद हो गए।पर तीसरी कसम और मेरा नाम जोकर के बुरी तरह फ्लॉप हो जाने के बावजूद भी इनका संगीत अजर अमर था और आज भी जीवंत है दोनों ही फिल्मो ने कई पुरस्कार बटोरे तीसरी कसम को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरुस्कार मिला तो ऋषि कपूर को बालकलाकार का राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला।और शंकर जयकिशनजी को क्या मिला! अपनों से जख्म? यही पीड़ा है कि आज कल अपनों से ज्यादा जख्म मिलते है

Where exactly Shankar-Jaikishan excelled !!

By

Shri Arun Bajaj

When Shankar-Jaikishan made their entry with Barsaat in 1949, the musical space was dominated by giants like Naushad, C. Ramchandra, Anil Biswas, S.D. Burman and Hemant Kumar. Waiting in the wings to make a splash were Madan Mohan and O. P. Nayyar. However, the music of Barsaat followed immediately by Awaara, established the supremacy of the new duo, for a very very long time, in no uncertain terms.
It would be an interesting study to have an insight into where exactly Shankar-Jaikishan excelled..and why. I will spell out four key areas as under :
1. Selection of the right musical instrument..
2. Selection of the right singer keeping in view the demand of the composition..
3. In the crafting of matching interludes to expand on the mood of the song and singing it off at a tonal point from where the singer can effortlessly resume to take on the Antara to the next level..
4. Simplifying the melodic structure to a rhythm and pace which would render it hummable even by a layman..
1. Right musical instrument.. Musical instruments owe their origin to various genre like String family, Brass, Percussion, Wind, Woodwind etc. and it is always a tough challenge for any composer to select the right instrument to convey the dominant mood of the screenplay, as perceived by the director. This is usually done by two methods : score of background music which comes in undertones and through use of songs which is blatantly done in overtones.The combined effect of these two methods help in carrying the story forward.
Music steps in where words fail. One poignant sweep of bow over a violin will convey far more melancholy than a barrage of dialogue by a dying mother. Little strumming on mandolin will communicate oodles of joy and wellbeing than a verbal explanation of his smile by a happy character.
With this backdrop to appreciate and appraise film music, when you look at the oeuvre of composition created by Shankar-Jaikishan, you are amazed by their ingenuity in not only selecting the right instrument for their compositions but also in choosing the right player to work on those instruments. Now sample some very ingenious use of musical instruments :
Three octave use of Harmonium played by V. Balsara in Awaara Hoon in Awaara, melodic use of flute played by Pannalal Ghosh in Main Piya Teri in Basant Bahar, rhythmic beat of earthen matka in Yaad Aai Aadhi Raat Ko in Kanhaiya, interlude piece of dilruba in Chali Kaun Se Desh Guzaria in Boot Polish, use of sitar in Dil Mein Sama Ke Milane Na Aaye in Kanhaiya, fleeting strains of oboe and fife in Pyar Hua Iqraar Hua in Shri 420, use of mandolin in Ghar Aaya Mera Pardesi in Awaara, magical use of violins in Aa Ab Laut Chale in Jis Desh Mein Ganga Behati Hai, clever use of ghunghroo and tambourine in Tera Teer O Be Peer in Shararat, use of bagpiper in Bol Radha Bol in Sangam…these are pure muisical lessons to understand the virtuosity of these musical instruments and how effectively they can be used to heighten the mood.
Selection of the right singer keeping in view the demand of the composition :
Even though S-J always had the most popular singers like Mukesh, Rafi, Lata, at their beck and call, to do justice with any kind of composition, they always selected the voice most appropriate to the need of the song Examples..
Picking up Subir Sen for Manzil Wahi Hai Pyaar KI (Kathputli)
Selecting Hemant Kumar for Rula Kar Chal Diye Ek Din (Badshah)
Using Talat Mahmood for Ae Mere Dil Kahin Aur Chal (Daag)
Selecting Asha Bhonsle for Dhani Chunri Pehan (Hare Kaanch Ki Choodiyan)
Zeroing in on Rafi for a Kishore starrer..Ajab Hai Dastaan Teri Ai Zindagi (Shararat)
Mubarak Begum for Mujhko Apne Gale Laga Lo (Humrahi)
Manna Dey for Ye Raat Bheegi-Bheegi (Chori-Chori)
Shamshad Begum for Ek Do Teen (Awaara)
Crafting of matching interludes :
Listen to the song “Raat Gayee Phir Din Aata Hai” from Boot Polish. In the interlude piece the mandolin starts strumming after the aspirations of hungry, flat-bellied urchins are vocalized and with each strumming of mandolin string, the ‘aam aadmi’s’ heart begins pounding. One can almost see the dark, miserable night dissolving into a golden dawn in the midst of slum and deprivation. The imaginative chorus adds luster to the mood of the song and the listener gets transported to a surreal world; and precisely that is what the film-maker wanted the music directors to deliver. That’s one reason why all Raj Kapoor films seem to be woven with wistful magic which no commercial film maker has been able to recreate thus far.
In the interludes of Aja Re Ab Mera Dil Pukara and Sunte The Naam Hum both from Aah, lower octave is blended with higher tones, to create effect of passion and longing. The interludes of Sab Kuchh Seekha Humne (Anari) and the theme song of Awaara, Accordion-Harmonium pieces in three octaves run the entire gamut of emotions and re-kindle the mood of Nehruvian era of a resurgent India conveying the hopes and frustrations of the youth of fifties..

“I have watched Shankerji on his music composing & notation writing sessions” Sharda

'Chale jana . zara thehro...At a function , with Mubarak Begumji'

I have watched Shankerji on his music composing & notation writing sessions.
His fingers moving like lightning on the keys of the harmonium bringing out beautiful pieces, piece after piece each better than the other that filled the air .
Sebastian with his pad & pencil trying to catch up with the speed captured the pieces in the music sheet . And on the spot he will play the pieces in his violin & Shankerji will ok them Afterwards Sebastian will fix the chords , counterparts & decorate them All those wonderful music pieces in SJ songs came to life like this
Many musicdirectors will let the musicians play on their own for interlude music .Not Shanker jaikishen . They composed each & every piece.. …Also not taken from the computer & fit them in the song like todays mds.
Occasionally Shankerji will let the musicians play solo pieces by themselves, like in song ‘Dekho mera dil machalgaya ‘ ustad Rais khan sab played the sitar . Naturally a stalwart like Rais khansab cannot be told to play some fixed notes. So Shankerji asked him to play on his own & he played by his imagination . Later on Shankerji told me that in each take he played different pieces
Many friends are asking me to share my experiences with SJ work & therefore I am writing this

Shanker-Jaikishen’s styles – Sharda

Most of the time the notation sessions of Shankerji will last for 2/3 hours or even more. Because Shankerji would want to play all those exotic pieces in his harmonium , to his heart’s content. He will go on playing , playing & Sebastian will go on writing , writing . Sometimes for one requirement Sebastian must have written 6 or more pieces. He will play all of them for Shankerji , to select one..

Playing playing Shankerji will stop & ask for tea.Tea will be prepared & brought . But before it came he would have started another spree of his music playing . The tea cup will be sitting there , tea getting cold & forgotten .Then again after sometime he will ask for tea & again the same story .

The music writing over, the song would have already been written , Shankerji will summon his rhythmists ,who were on his permanent pay role All of them would come & take their positions with their instruments. Then between themselves, Shankerji in his harmonium & Sebastian in his violin they will play the full song with all the music to the accompaniment of the rhythm

And Shankerji will tell me to sing the song along with them . Whether it was my song or other’s . I was under training & Shankerji thought it will give me good experience .

Once the whole thing was played a few times , small changes made & Shankerji was satisfied ,he will announce pack up .Then he will discuss with Sebastian about which musicians should be called for the recording. A list will be made & given to one of the staff who will contact the musicians. And shankerji. will fix a date for rehearsal

Then he will sit back & have his long due tea .

Memories of Shankar-Jaikishen by Sharda

Written by Singer Sharda

Shankerji loved Jaikishenji very dearly & vice versa . He treated Jaikishenji as a younger brother & Jaiji also took Shankerji like an older brother.

Jaikishenji loved to have fun , liked to go to restaurants, parties meeting friends & all & visited the music hall off & on
Where as Shankerji was a workaholic & went to the music hall every day religiously whether there was a recording or not & sat there from morning till evening.He must have his daily dose of baja playing for hours together , which he could do ‘aramse’ in his studio.

During non recording times , which were very rare & far between, Shankerji used to be in his studio , playing harmonium , accordian or the grand piano which stood there & even tabla. Sometimes trying his hands on cricket ball throwing . His hall was big enough for that.

People used to drop in all the time. Many producers ‘ offices were there in the same building like Fc mehra & others . They used to drop in to have a chat with him , talk about situations in their movies or to sign him up for their new movies, Chai will constantly be on the making & being served to all visitors

Jaikishenji patronised 2 restaurants particularly , Gaylord in churchgate & one iranian restaurant called Bombellis in warden road

Jaikishenji will be sitting there in Bombellis having breakfast , brunch or lunch. In the next lane there was this Sophia college for girls .During break time all the girls will come out & hover around the restaurant with their giggles , ‘khus puses’ , throwing sideway glances at Jaikishenji. Some of them would venture inside the restaurant , make small talks with him & ask for autograph , Jaikishenji will gladly oblige

In the meanwhile Shammi kapoor’s huge boat like cheverlet will come zooming in the road , [no traffic like today]

Suddenly there will be shouts , shrieks & yells ‘Shammi kapoor , Shammi kapoor Shammi kapoor . There will be utter chaos. For the time being Jaikishenji will be forgotten.

Then when the car disappeared, the commotion over & the situation came back to normal the girls will turn their attention back again to Jaikishenji

At that time there were only 3 big cheverlets in Bombay, When they came in the market 3 cars were imported in India , one belonged to Shankerji one to Jaikishenji & the other to Shammi kapoorji,All the fans knew the color of the cars & knew which one belonged to who . When they see the car approaching , from far they will know who is coming &start shouting their names.

Such adoration to a music director team like a star hero have never been heard of.

Then one day Jaikishenji got married… Shankerji told me that it is a secret marriage & he has to do the ‘kanya daan ‘ So he took the place of a father & performed the ‘kanya daan ‘.

later on he told me that things were not the same . But the care , concern , love & affection between them were in tact till the end ………..

S-J were nominated every year from 1957 to 1976…..except 1958 and 1974

S-J were nominated every year from 1957 to 1976…..except 1958 and 1974, winning 9 times including a hatrick. What an amazing record in popular music… despite the deaths of Shalendra and Jaikishan.
FILMFARE AWARD STARTED DURING 1954 FOR BEST MUSIC DIRECTOR
Winner
Year Film Lyricist(s)
1957 Chori Chori ShailendraHasrat Jaipuri
1960 Anari Shailendra, Hasrat Jaipuri
1961 Dil Apna Aur Preet Parai Shailendra, Hasrat Jaipuri
1963 Professor Shailendra, Hasrat Jaipuri
1967 Suraj Shailendra, Hasrat Jaipuri
1969 Brahmachari Shailendra, Hasrat Jaipuri
1971 Pehchaan NeerajIndeevar, Varma Malik
1972 Mera Naam Joker Shailendra, Hasrat Jaipuri, Neeraj, Prem Dhawan
1973 Be-Imaan Varma Malik

Nominated

Year Film Lyricist(s)
1959 Yahudi Hasrat Jaipuri, Shailendra
1960 Chhoti Bahen Hasrat Jaipuri, Shailendra
1962 Jis Desh Mein Ganga Behti Hai Hasrat Jaipuri, Shailendra
1964 Dil Ek Mandir Hasrat Jaipuri, Shailendra
1965 Sangam Hasrat Jaipuri, Shailendra
1966 Arzoo Hasrat Jaipuri
1969 Diwana Hasrat Jaipuri, Shailendra
1970 Chanda Aur Bijli Neeraj, Indeevar
1972 Andaz Hasrat Jaipuri
1975 Resham Ki Dori Neeraj, Indeevar
1976 Sanyasi Vithalbhai Patel, Varma Malik, Vishweshawar Sharma, Hasrat Jaipuri, M G Hashmat

Courtesy: Siraj Khan <khansaheb2@aol.com

संगीत के सरताज़ #शंकरजयकिशन Sangeet ke Sartaaz #ShankarJaikishan

Written by

Shri Shyam Shankar Sharma

फ़िल्म जगत में पूरे 2 दशक यानी बीस साल (1950-70) की अवधि शंकर जयकिशन के नाम रही।यह वो दौर था जब उनके संगीत से सजी हर फ़िल्म का हर गीत हिट हो जाता था।मन्ना डे कहते थे, “उनके पास हिट धुनों की एक जादुई पुड़ियां थी, जिसमे से बराबर एक से बढ़कर एक हिट गाने श्रोताओ को देते रहते थे।आज के संगीतकार तो एक फ़िल्म में किसी तरह एक हिट गाना देकर अपने आपको धन्य समझने लगते है।मगर उनके लिए यह एक मामूली बात थी।वे लगातार श्रेष्ठ सृजन करते रहे 1955 मे मैंने उनके लिए सीमा फ़िल्म का एक गीत..”तू प्यार का सागर है”..गाया था।इसके बाद उनके लिए मैंने जो भी गीत गाये, सारे के सारे जबरदस्त हिट रहे थे इस संगीतकार जोड़ी के बारे में यह बात भी मशहूर थी कि उनके पास हिट गानो का खजाना था,जिससे एक से बढ़कर एक हिट गीत निकले पर उनकी गुणवत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ा।विपिन रेशमिया लिखते है वे लीजेंड्स थे,आज के संगीतकार तो कोशिश ही नहीं करते?वे पहले संगीतकार थे।” जिन्होंने म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स का उपयोग बड़े पैमाने पर किया था. पियानो,आकार्डियन, मेंडोलिन,ओ बो.ड्रम्पेट आदि देसी विदेशी साजो का उन्होंने सटीक तालमेल बिठाया। साज़ बजाने वालोँ के मामले मे कोई कमी सख्त नापसंद थी। गायन के मामले मे भी वे हठधर्मी थे। मुकेश ,राज कपूर की आवाज थे पर इस जोड़ीं ने जरुरत पड़ने पर राजजी के कई गाने मन्नाजी से गवाएं।बाद में घोर आलोचकों ने भी यह कबूल किया की राजजी की शैली को मन्ना की आवाज ज्यादा मुफीद लगती है।इसी तरह लताजी से उन्होंने सर्वाधिक हिट गाने गवाये,पर आशाजी का भी बहुत सार्थक उपयोग किया।उस दौर के सारे नामचीन गायकों हेमन्त कुमार,तलत महमूद,रफ़ी,किशोर आदि का उन्होंने सदुपयोग किया।मृत्यु से कुछ दिन पहले हेमंत कुमार ने एक मुलाकात में उनके सम्मान में कहा “वो तो जीनियस छिलो अर्थात वो तो जिनियस है।आम धारणा है की RK की फ़िल्मो मे ही इस जोड़ी का हिट संगीत आया यह निराधार है,उस खेमे के वो जरूर थे पर इस भ्रम को उन्होंने बार बार तोड़ा, गलत सिद्ध किया,वो किसी एक खेमे के मोहताज नहीं थे।उस दौर के सारे नामचीन फ़िल्म मेकर्स के साथ काम किया।अमूमन यह कहा जाता है कि यह जोड़ी क्लासिक रागों से बचती है पर बसंत बहार,आम्रपाली,सीमा,साँझ और सवेरा,दिल एक मंदिर,तीसरी कसम,मेरे हज़ूर जैसी कई फ़िल्मो में शुद्ध क्लासिक रागों पर आधारित गानो की रचना कर उन्होंने सबका मुंह बंद कर दिया।1947 में हैदराबाद से आये शंकरजी और गुजरात से आये गुजु भाई जयकिशन जी के बाहरी व्यक्तित्व सर्वथा जुदा थे।पर संगीत ने उन्हें एकाकार कर दिया। RK की पहली फ़िल्म आग(1948) मे ये दोनों संगीतकार राम गांगुली के सहायक थे।पर राजजी की दूसरी फ़िल्म बरसात(1949) मे उन्होंने स्वतंत्र संगीत रचना की। यह साथ जयकिशनजी की मृत्यु तक बदस्तूर कायम रहा।1966 में अपने अनन्य मित्र गीतकार शैलेन्द्र की असामयिक मौत के बाद शंकर जी बेहद टूट गए थे।1971 मे जयकिशन के असामयिक निधन से शंकरजी का सृजन भी मानो बिखरने लगा था पर दृढ़ संकल्प के साथ शंकरजी ने कई हिट गीतों का निर्माण किया जिसमे सोहन लाल कँवर का उन्हें सच्चा साथ मिला।1975 में उन्होंने सन्यासी में हिट संगीत दिया और शंकर जयकिशन जोड़ी का नाम 1984 तक कायम रखा और इसी वर्ष ख़ामोशी के साथ शंकरजी ने सांसो के साथ संसार से विदा ली।इस जोड़ी ने कुल 8 बार फ़िल्म फेयर अवार्ड प्राप्त किये,सर्वप्रथम पदमश्री से सम्मानित किये गए।आज के कुछ संगीतकार देर सवेर भले ही उतने अवार्ड्स प्राप्त कर ले पर याद रखे कि यह अवार्ड्स उन्हें महान संगीतकारों के दौर मे मिले थे जिनका कोई सानी नहीं था।शंकर जयकिशन जैसी कर्णप्रियता लाना आज के संगीतकारों के वश की बात नहीं है।आज संगीत युगंधर शंकरजी की जन्म तिथि है में अपना यह आलेख पुष्प उन्हें सादर समर्पित करता हूँ।

कुछ विशेष टिप्पणियां दूसरे पाठकों द्वारा जो शंकर जयकिशन के मुरीद भी हैं

Dave Vijay  लिखते हैं कि :

शंकरजी (जय किशन) दोनों के बारे में कुछ भी मैं लिखू तो मैं छोटा पड़ जाऊंगा। मेरे अज़ीज़ मित्र Sss ने जो भी लिखा स्त प्रतिसत सच ही लिखा है।
आज मैं शंकरजी के बारे में कुछ लिखा रहा हु। जो मेरे हिसाब से सही है। जब जयकिशन जी का निधन हुआ तब शंकर जी अकेले पड गए थे। अचानक जय साब के जानेसे उनके ऊपर एक पहाड़ टूट पड़ा हो ऐसा वोह महसूस कर रहे थे।लेकिन ये आदमी हार माननेवालो में से नहीं था। अपने आप को उन्हों ने संभाल लिया और शंकर जयकिशन के नाम से ही म्यूजिक देना सुरु कर दिया। जब दोनों साथ में थे तब काम के ज्यादा भरण की वजह से दोनों अलग अलग फिल्मो का कार्यभार संभाल ने लगे थे। जरुरत पड़ने पर एक दूसरे के साथ स्स्लाह मशवरा करके काम करते थे। जय साब के निधन के बाद शंकरजी ने न केवल जय साब की फिल्मो का म्यूजिक पूरा किया लेकिन बाद में उन्होंने करीब 50 फिल्मो में और भी म्यूजिक दिया और शंकर जयकिशन के सूरज को अस्त नहीं होने दिया। और कई संगीतकार फ़िल्मी दुनिया में जोडियो में थे लेकिन ये कारनामा सिर्फ शंकरजी ने ही कर दिखाया। बाकी के संगीत कार पूरी तरह से विफल हो गए है। जब शंकरजी का निधन हुआ तब भी उनके पास 2 फिल्मो का करार था। ये इन्शान ने मौत को भी अपने पर हावी नहीं होने दिया मरते दम तक संगीत की साधना करते रहे और S J के नाम को कायम रखा। जय हो अमर S J की। 
राजजी के कैम्प से निकल ने के बाद शंकरजी अकेले हो गए थे। फिर भी ईमारत भलेही पुराणी थी लेकिन बुनियाद मजबूत थी उन्होंने अपने आप को संभाला और अन्पने काम में जुड़ गए । सोहनलाल कंवरजी राजेंद्र भाटियाजी और कुछ अन्या डायरेक्टर्स के साथ उन्होंने काम किया और सन्यासी दो जूथ दुनियादारी जंगल में मंगल आज की ताज़ा खबर नारी । हा दो और डायरेक्टर्स paacchi और आत्मरामजी के साथ भी काम किया। इत का जवाब पत्थर से इंटरनेशनल croook साजिस आत्माराम जैसी हिट्स फिल्मो में म्यूजिक दिया। अंत तक S J के बैनर के परचम को लहेराते रहे। धन्यवाद। S J की जय हो।

Shiv Shanker Gahlot  का कहना है कि :

बहुत सुन्दर लेख । शंकर जी की गाथा अनन्त है और उनके चाहने वाले पढ़ पढ़ कर आनन्दित रहते हैं ।

Raajeev Shrivaastav ने अपनी प्रतिक्रिया यों व्यक्त की :

शंकर-जयकिशन !
हिन्दुस्तानी सिने गीत-संगीत को भारत सहित विश्व के ढेरों देशों के जन मानस के ह्रदय से जोड़ने का प्रथम कार्य करने वाले संगीतकार जोड़े शंकर और जयकिशन वास्तव में सिने संगीत साम्राज्य के अब तक के एक मात्र ‘चक्रवर्ती सम्राट’ हैं.
शंकर-जयकिशन के सुरीले गीत-संगीत के ‘अश्वमेघ यज्ञ’ का अश्व जब भारत की सीमा लाँघ कर सुदूर तब के सोवियत रूस की धरती का स्पर्श करता हुआ अमरीका, कनाडा, जर्मनी, फ़्रांस, चीन सहित दक्षिण-पूर्व एशियाई के अनेकों देशों के व्योम की यात्रा करता हुआ इस सृष्टि के दशों दिशाओं में अपने कालजयी सरगम की पताका फहरा रहा था तब किसी भी राष्ट्र का गीत-संगीत उनके सुर-संग्राम को चुनौती देने की स्थिति में नहीं था. आज भी ‘आवारा हूँ’ और ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे उनके अनेकों गीतों की पुनरावृत्ति विश्व के कई देशों की वर्तमान पीढ़ी के अधरों पर सहज रूप से थिरक रही है. भारत के इस एकमात्र सर्वाधिक प्रतिभावान एवं प्रयोगवादी संगीतकार ने पाश्चात्य संगीत वाद्य यन्त्रों का जिस मनोयोग से भारतीयकरण किया उससे तब तो लोग अचम्भित हुए ही थे और आज भी अँग्रेज सहित पश्चिम के सभी संगीतकार उनके वाद्ययन्त्रों पर भारतीय धुनों को सजते हुए देख-सुन कर आश्चर्य से भर उठते हैं.
भारत के प्रथम और अब तक के एकमात्र ‘धर्म निरपेक्ष’ (सेक्युलर) संगीतकार शंकर-जयकिशन ही हैं. इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में लिखे मेरे पूर्व के आलेख को आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं —-https://www.facebook.com/notes/raajeev-shrivaastav/shanker-jaikishan-an-indian-musical-secular-face-the-emperor-of-filmfare/2149884102731   जिस अवधि (दौर) में हिन्दी सिने संगीत जगत में आर.के. कैम्प से जन्में और जीवन पर्यन्त इन्हीं के संग जुड़े रहने के शंकर-जयकिशन के संकल्प के समानान्तर जब संगीतकार नौशाद और सचिनदेव बर्मन ने देखा कि शंकर-जयकिशन गायक मुकेश के संग जुड़ कर राजकपूर के लिए धुनें सृजित कर रहे हैं तो पूर्ण सत्य को देखे-परखे बिना ही नौशाद ने मु. रफ़ी को और एस.डी. बर्मन ने किशोर कुमार को अपना स्थायी गायक (पुरुष स्वर) बना लिया. सिनेमा और संगीत के इतिहासवेत्ता (Film & Music Historian) के रूप में अपने शोध एवं अध्यन से मेरा आंकलन तथा निष्कर्ष यह रहा है कि ऐसा कर के नौशाद और एस.डी. बर्मन ने स्वयं अपना और सिने संगीत का अहित किया है. इन दोनों ही संगीतकारों के कई-कई गीत ऐसे हैं जिनमें क्रमशः रफ़ी और किशोर के स्थान पर वे अन्य दूसरे गायक से उसे और प्रभावी रूप में प्रस्तुत कर सकते थे. यदि ये शंकर-जयकिशन की तरह उदारवादी वृत्ति के होते तो सम्भवतः धर्म निरपेक्ष संगीतकारों में इनका भी नाम जुड़ जाता. आवश्यकता पड़ने पर शंकर-जयकिशन ने राजकपूर के लिए मुकेश के स्थान पर मन्ना डे से गवाया है तथा गीतों की प्रकृति के अनुरूप इस जोड़े ने मु. रफ़ी और किशोर कुमार से गीत गवाने में कभी भी परहेज नहीं किया. यहाँ तक की तलत महमूद, हेमन्त कुमार, महेन्द्र कपूर, सुबीर सेन, शमशाद बेग़म, आशा भोसले, शारदा, सुमन कल्याणपुर, मुबारक बेग़म के ढेरों श्रेष्ठ गीत इन्हीं के संगीतबद्ध किये हुए हैं. मु. रफ़ी के गायन में चमत्कारिक सुरीलेपन और ‘याहू’ सरीखा उन्मुक्त प्रभाव उत्पन्न करने का श्रेय तथा किशोर कुमार के ‘उड्लई’ शैली को नूतन प्रभाव देने का श्रेय शंकर-जयकिशन को ही जाता है. ऐसा शंकर-जयकिशन के ‘धर्म निरपेक्ष’ (Secular) उदारवादी मनोवृत्ति के कारण ही सम्भव हो सका था.
हाँ, भारत का ‘ऑस्कर’ कहा जाने वाला ‘फ़िल्मफ़ेयर’ पुरस्कार किसी एक श्रेणी और विधा में सर्वाधिक बार अर्जित करने वाले संगीतकार भी शंकर-जयकिशन ही तो हैं. सुरों के अद्भुत चितेरे इस संगीतकार की अपूर्व प्रेरणा ने ही मुझे उन पर एक कविता रचने का सौभाग्य प्रदान किया जिसे मैंने सर्वप्रथम भाई Sudarshan Pandey जी के संग साझा किया था. शंकर-जयकिशन पर लिखी गयी मेरी कविता जो उन्हीं के द्वारा रची गयी एक धुन पर आधारित है को आप सभी इस लिंक पर पढ़ सकते हैं —- https://www.facebook.com/notes/raajeev-shrivaastav/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%95-%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%A8-sargam-saadhak-shankar-jaikishan-/10202758399937174
आज यह सिद्ध हो चुका है की महान शंकर-जयकिशन विगत, वर्तमान और आगत के एकमात्र स्वयम्भू कालजयी संगीतकार हैं.
मंगल कामनाएं !
डॉ. राजीव श्रीवास्तव Dr Raajeev Shrivaastav

Shyam Shankar Sharma राजीव श्रीवास्तव जी के पोस्ट पर उत्तर देते हुये कहते हैं:

परम आदरणीय सर राजीव श्रीवास्तव जी,आपकी कलम में जादू है जो ह्रदय को स्पर्श करती है।आलेख का उत्तर आलेख वो भी प्रश्नो से परे।आपने जिस खूबी से SJ को सम्मान दिया है वो अप्रितम है।आज मे सांय 4 बजे दूरदर्शन के सांध्य कालीन कार्यक्रम मे शंकरजी के ऊपर बनाये कार्यक्रम को देख रहा था,तो बरबस आपकी याद आ गयी। सुरेश पुजारी , सिने इतिहासकार वही कुछ बता रहे थे जो आपने अपने आलेख मे प्रस्तुत किया है।शंकर जय किशन के बारे मे जो शब्द रचना सच्चाई से प्रस्तुत की है उससे मे अभिभूत हूँ और स्वयं को धन्य मानता हूँ कि इतने बड़े सिने इतिहासकार ने मेरी पोस्ट को मान दिया जो आपकी कविता का चरित्र उजागर करता है और आपकी विशालता को दर्शाता है।मैने अपने सम्पूर्ण जीवन मे हिंदी मे शंकर जयकिशन के ऊपर लिखे इतने उत्कृष्ठ आलेख को नहीं पड़ा।मै आपके लिंक्स पर जाकर जरूर लाभ प्राप्त करूँगा। एक मात्र धर्म निर्परक्ष संगीतकार शंकर जयकिशन को बताकर आपने उनकी खूबियों का सारांश लिख दिया।आपने सत्य ही लिखा की महान शंकर जयकिशन विगत, वर्तमान और आगत के एक मात्र कालजयी संगीतकार है। मेरा सादर प्रणाम। लिंक पर तो मे जाऊंगा पर जो कविता आपने सुदर्शनजी के संग साँझा की थी उसे मेरी इस पोस्ट पर प्रस्तुत कर मुझे कृतार्थ करे।पुनः नमन।

DrArdhaangini Kulshreshth का कहना है कि :

श्रीमान श्याम शंकर शर्मा जी का महान संगीतकार शंकर-जयकिशन पर सारगर्भित आलेख अत्यन्त ही तथ्यपरक एवं सूचनापूर्ण लगा. बधाई !
सम्भवतः आपके ही प्रस्तुत आलेख को सुरीला विस्तार देते हुए Dr Raajeev Shrivaastavसर ने ऊपर अपना जो लघु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है.
हिन्दी सिनेमा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार युगल शंकर-जयकिशन के कृतित्व का इतना गहन शोधपूर्ण अध्यन जिस प्रकार सिने संगीत के इतिहासवेत्ता के रूप में Dr Raajeev Shrivaastav सर ने प्रस्तुत किया है वह उन सब के लिए एक आँखे खोलने जैसा उपक्रम है. जो तथाकथित संगीत के महाग्यानी लोग अब तक शंकर-जयकिशन की अद्भुत प्रतिभा को विस्मृत करते रहे हैं उनके लिए इस आलेख से वृहद् सत्य का और क्या साक्ष्य हो सकता है ?
धर्म निरपेक्षता के मन्त्र को कोई भी हमारे देश की राजनीति में तो नहीं साध सका पर प्रयोगवादी के धनी संगीतकार शंकर-जयकिशन ने उसे सिने गीत-संगीत में अत्यन्त ही संतुलित एवं सहज रूप से क्रियान्वित कर के दिखा दिया. यह एक ऐसा महत्वपूर्ण क्रियान्वयन था जिसे तब मौन रह कर शंकर-जयकिशन ने व्यवहार रूप दे दिया था पर उस उदारवादी कार्य को आज Dr Raajeev Shrivaastav सर ने साक्ष्य के संग यहाँ सिद्ध कर दिया है.
‘फिल्मफ़ेयर’ पुरस्कारों पर शंकर-जयकिशन की श्रेष्ठता भी उनकी विशिष्ठ उपलब्धियों की एक महत्वपूर्ण पूँजी है. जी, विश्व में संगीत के एकमात्र ‘चक्रवर्ती सम्राट’ शंकर-जयकिशन ही हैं.
हार्दिक आभार एवं आत्मिक अभिनन्दन !

Shyam Shankar Sharma ने अर्धांगिनी कुलश्रेष्ठ जी की टिप्पणी पर कहा:
अर्धांगिनी कुलश्रेष्ठ जी, आपने मेरे आलेख् की सराहना कर मुझे कृतार्थ किया है।वस्तुतः में बाल्यकाल से ही उनके संगीत की शक्ति के प्रभाव क्षेत्र में आ गया था,और जब किशोर अवस्था में आया तो मुझे महसूस होने लगा की यह मुझे आनंद देता है।मे उनका नाम पड़कर ही फ़िल्म देखने जाता,उनके गानो को आत्म सात करता और पार्श्व संगीत मे उनकी खूबियों को समझता।में कलात्मक स्वाभाव का था पर घरवालों की इच्छा साइंस पढ़ाने की थी और उस वक़्त माता पिता की अवज्ञा करना आता ही नहीं था,मे अध्यन करता और ख़ाली समय में शरद,बंकिम,तारा शंकर वन्धोंपाध्याय,विमल मित्र,प्रेम चन्द की कृतियों को पड़ता।रेडियो पर गाने सीमित समय पर आते थे उस वक़्त का इंतज़ार करता।वक़्त ने मुझे फॉरेंसिक साइंस में वैज्ञानिक अधिकारी बना दिया और जॉब भी 24 घंटे की होती क्योंकि अपराध का कोई समय नहीं होता।में फ़िल्मो से दूर होता गया किन्तु विज्ञानं की प्रगति ने संगीत की उपलब्धता को आसान बना दिया और शंकर जयकिशन के संगीत से सजे गाने अब असली मजा देने लगे ,उनके संगीत की यही विशेषता है की वो समय से आगे रहते है यही कारण है की वो आज भी जीवंत है। 1912 में सेवानिवृति के बाद जहाँ जहाँ इंसान को वक़्त नहीं गुजरता किन्तु मुझे समय नहीं मिलता,आध्यात्मिक ज्ञान के बाद खाली समय शंकर जयकिशन के संगीत और पोते को पढ़ाने के सहारे आसानी से गुजारकर,एक दो घंटे जब नितांत अकेला होतो हूँ सोशल मीडिया पर गुजारता हूँ इसका मुझे यह लाभ मिला की बचपन की अधूरी प्यास कुछ कुछ तो बुझी और आप जैसी ज्ञानी विभूतियों के संपर्क में आया जिनमे आदरणीय डा.राजीव जी प्रमुख है इनका लेखन,शैलि, शब्द चयन इतना प्रभावशाली है की व्यक्ति अभिव्यक्ति करना भूल जाता है।शंकर जयकिशन पर जो आलेख उन्होंने लिखा वो अदभुद है,आपने उनके लेख के साथ जिस प्रकार जाकर शंकर जयकिशन की उपलब्द्धियों को उजागर किया है वो सचमुच अप्रितम है और उन महा ज्ञानी लोगो की आँखे खोलने को पर्याप्त है जो उनकी सृजन क्षमता का सही आंकलन ही नहीं कर सके कारण ये लोग प्रयोगवादी नहीं अपितु अवसरवादी है? और ज्ञान प्रयोगवादी के पास होता जो समय के साथ और निखरता है।आपका असीम आभार।

Dharma Kirthi जी ने अपने उदगार इन शब्दों में व्यक्त किये :
Shyam Shankarji, Dr.Rajeev Srivastav and Ardhaangini Kulshreshthji…the three of you have taken this discussion on the matchless and timeless genius of Shankar Jaikishan’s work to a philosophical level. I have no words to praise the quality of discussion and precise analytical observations.
One thing, which pleased me no end is the article about SJ’s Secular approach to singers and technicians, at a time when the industry was very sharply divided on parochial lines.
I was planning a detailed write up on this subject as this was bothering me since very young age…say from 1984 to be precise…
This article has strengthened my resolve to do that article, with stronger determination….!
Many thanks to all of you…!!
————————————-
लेकिन श्री Bhalchandra Wani जी ने सौ टके की बात की. उन्होने कहा कि :  Scientists might discover another Sun in the universe but there will never be another like the Great SHANKER JAIKISHEN
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,356 other followers

%d bloggers like this: