Shankar Jaikishan : The Incessant Shower of Exuberant Melody

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WELCOME!!! to the World of  Shanker-Jaikishen’s  memories. The duo who ruled the Music Scenario of Hindi Film Music with their debut film Barsaat for continuous 20 years like Emperors of Melody are still now most listened but less mentioned.  It is a humble effort to spread information about them, their films and music to their die hard fans. You will find rare articles, photos, stories, anecdotes about them here.  Since Lyricists Shailendra and Hasrat Jaipuri were their inseparable parts, this blog is also a memorabilia of Fab Fours SJSH (Shankar-Jaikishan-Shailendra-Hasrat). 

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Aashiq..a forgotten movie of 1962

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From Aashiq to Agneepath

By : Shri Arun Bajaj

Aashiq released in 1962 with a star cast of Raj Kapoor, Padmini, Nanda and Abhi Bhattacharya, directed by Hrishikesh Mukherji, remains the Cindrella-girl of Hindi films which has still to find her pumpkin chariot to go to the ball. It is a mystery wrapped in an enigma as to why and how for so long, such a gem of a movie has not caught the eyes of the discerning cinegoers and critics alike ; even when retro films have become the latest flavor of the season.

The story of Aashiq depicts the conflicts confronted by all creative artists who at the end of the day, have to go back to their hearth and home. The protagonist in Aashiq looks for creative fulfillment in a talented, sensual danseuse and is attracted towards her while the silent, suffering beau at home, eternally waits for him to come back. It is a remorseless choice which over the period has traumatized the best minds as they struggle to appease their conscience in selfish pursuit of excellence.

Nanda dons the role of a submissive plain Jane with a golden heart but her virtues have no place in the world of commerce.Conversely, Padmini tantalizes not only with promises of fame and money but also with creative fulfillment to a small town singer. As the singer gets recognition, he realizes that he has become a moth in the hands of the sensual and devouring flame of passion; hence the symbolic song“ O shama ! mujhe phoonk de, visualized so eloquently by Hrishikesh Mukherji.

The reel life gets mixed up with real life as we recall how Raj Kapoor fell for Nargis to fulfil his own creative aspirations, which though created some of the finest motion pictures, yet at individual levels generated a deluge of tears and heartbreaks, including his own.Of course, the transient fame in no time unfolds its brazen brass and there is no mistaking on where the actual gold lies. But the final realization comes at a tremendous cost : the lover (Aashiq) has taken a beating and returned home but the viewer is faced with a moral dilemma : is it worthwhile to have a morally upright life but with no creative fulfillments ? That is something the viewer has to figure out.

Abhi Bhattacharya essayed the best role of his career giving expressions to a wide spectrum of emotions ranging from despair to compassion to calm acceptance of destiny’s quirks in a baritone voice which was a counterpoint to Raj Kapoor’s flamboyant portrayal. However, it was Shankar Jaikishan’s music which overpowered all the artistic verticals of Aashiq in such an obtrusive manner that even today, 50 years after the film’s release, the songs transport you to a different world on a flying carpet. O shama Mujhe Phoonk De begins with strains of violins reaching a crescendo with multiple instruments followed by the slow, sweet cadence of Mukesh’s voice is a treat to listen. The flute pieces dominate to produce an eerie montage of burning candle with fluttering moths . Conversely, “Ye To Kaho Kaun Ho Tum” has heavy orchestration but maddening beats of dholak with jazziness of accordion. Mukesh sings this number with a gay abandon and surprisingly covers an entire octave with a felicity of expression. Tum Aaj Mere Sang Hans Lo, Mehtab Tera Chehara, TumJo Hamare Meet Na Hote and Lo Aayee Milan Ki Raat Suhani are another gems.

Raj Kapoor with a duf in his hands, leading the troupe, singing “Ye toh kaho” makes one think that here is one actor who sports a violin in Barsaat, an accordion in Sangam, a duf in Jis Desh mein ganga behti hai, and conversely today you have Amitabh Bachchan who has a dagger in Kaalia, a revolver in Don, a sword in “Mard”. This is how Hindi cinema has degenerated to its lowest depths. From spouting love and brotherhood we have stooped to preaching violence and blood. No wonder, today’s youth speak in a tapori language, using four-letter words, without respect either to elders or to women.

From Aashiq to Agnipath is a long journey and this journey tells you the changing dynamics of Hindi films. Aashiq did not have even a fistfight, Agnipath, from first frame to last is full of blood, gore and stench: Aashiq had the finest songs, Agnipath did not have even one hummable song, Aashiq’s dialogues are literary and evocative of a distinct culture, Agnipath’s characters mouth screaming profanities, : and perhaps for all these reasons Aashiq was a commercial flop while makers of Agnipath laughed all the way to the bank.

1956 की फिल्म बसन्त बहार भारतीय फ़िल्मी इतिहास में शास्त्रीय संगीत में सबसे अग्रणी है

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1956 की फिल्म बसन्त बहार भारतीय फ़िल्मी इतिहास में शास्त्रीय संगीत में सबसे अग्रणी है इसे सदा बैजू बावरा के साथ स्पर्धात्मक रूप में माना जाता है किंतु यही एक मात्र फिल्म है जिसके गीतों में और पार्श्व संगीत में पूर्णतः शास्त्रीय संगीत का प्रयोग हुआ है,यह उन मिथकों को पूर्ण विराम देता है कि शंकर जयकिशन जी मात्र पाश्चात्य धुनों पर ही अपनी महारत हासिल रखते है?यद्यपि शंकर जयकिशन जी ने बार बार इस मिथक को तोड़ा।
बसंत बहार फिल्म के निर्माता थे आर .चंद्र और निर्देशक थे राजा नवाथे…राजा नवाथे के साथ शंकर जयकिशन जी की और भी फिल्मे है जिसमे आह और गुमनाम प्रमुख है।
इस फिल्म के कलाकार थे निम्मी,भारत भूषण,चंद्र शेखर,मनमोहन कृष्ण,कुमकुम,ओम प्रकाश,लीला चिटनीस,परसराम,इंदिरा,चाँद बर्क, एस. के. प्रेम,नायम पल्ली,श्याम कुमार और राजे।
इस फिल्म में गायक थे पंडित भीम सेन जोशी,लता, रफ़ी,मन्ना डे,लता और आशा।
गीतकार थे शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी,एक पारंपरिक गीत भी इस फिल्म में था।इस फिल्म में कुल 10 गीत थे। जरा इन गीतों पर गौर तो कीजिये:-
1,में पिया तेरी..लता/हसरत
2,जा जा रे बालमवा/ लता/शैलेन्द्र
3,बड़ी देर भई/ रफ़ी/शैलेन्द्र
4,दुनिया न भाये…/रफ़ी/ शैलेन्द्र
5,सुर ना सजे../ मन्ना डे/ शैलेन्द्र
6,भय भंजना वंदना …/ मन्ना डे/ शैलेन्द्र
7,कर गया रे कर गया मुझपे ज़ादू…/लता, आशा/शैलेन्द्र
8,नैन मिले चैन कहां../ लता, मन्ना डे/ शैलेन्द्र
9,केतकी ,गुलाब,जूही,चम्पक बन फूले/ भीम सेन,मन्ना डे/शैलेन्द्र
10,गाओ री बसंत बहार/सामूहिक पारंपरिक गीत.यह गीत फिल्म में तो है किंतु डिस्क पर उपलब्ध् नहीं है

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किसी सज्जन के पास उपलब्ध् हो तो प्रस्तुत कर अनुग्रहित करे।
बसंत बहार एक संगीत प्रधान फिल्म थी जो शंकर जयकिशन जी के वेवध्यपूर्ण संगीत का अमृत कलश था,इस फिल्म के संगीत का कोई सानी नहीं है,भले ही इसकी तुलना बैजू बावरा से की जाती है।बैजू बावरा के संगीत के बाद नॉशाद साहिब को यह मुगालता हो गया था कि शास्त्रीय संगीत में उनका एकाधिकार है,इसी कारण उन्होंने फिल्म के निर्माता को जो भारत भूषण जी के भाई थे को फिल्म बसंत बहार का संगीत देने से इसलिए इंकार कर दिया क्यू कि वो उनका पारिश्रमिक देने में असमर्थ थे।
जब शंकर जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने निर्माता को बुलाया की वो पारिश्रमिक की चिंता न करे
संगीत हम देंगे किन्तु भारत भूषण जी को लग रहा था कि शंकर जयकिशन कैसे इस फिल्म का संगीत देंगे?किन्तु भ्राता को SJ पर विश्वास था।शंकर जयकिशन जी ने इस गीत को एक चुनोती के रूप में स्वीकार किया और रच डाला एक इतिहास जिसने पंडित भीमसेन जोशी और बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष तक को अचंभित कर दिया जो इस क्षेत्र के महारथी थे।हिंदी फिल्म संगीत इतिहास की शास्त्रीय संगीत की यह बेहतरीन फिल्म है जो शंकर जयकिशन जी के संगीत का अनुपम पुष्प है जिसकी सुगंध आज भी महक रही है।
मन्नाडे जी को जब शंकर जी ने बताया कि उन्हें पंडित भीमसेन जोशी को हराना है तो वो भाग खड़े हुए बमुश्किल से वापसी करी और क्या खूब गायन किया किन्तु निसंदेह भीम सेन जी उन पर भारी थे जिन्हें फिल्म की कहानी के कारण हारना पड़ा।
कन्नड़ उपन्यास हंस गीते पर बसंत बहार फिल्म आधारित थी,यद्यपि इसी हंस गीते नाम पर कन्नड़ में भी फिल्म बनी किन्तु संगीत की दृष्टि से यह बसंत बहार के निकट ही नहीं फटकती?
संगीत मन को पंख लगाए
गीतों से रिमझिम रस बरसाए
सुर की साधना परमेश्वर की
शंकर जयकिशन जी वास्तविक रूप में संगीत के साधक थे और इस साधना को परमेश्वर मानते थे।
आज का गीत दुनिया न भाये मोहे अब तो बुलाले चरणों में चरणों में….
रफ़ी जी का स्वर और शंकर जयकिशन जी के संगीत में इतनी आर्दता है कि वो श्रोता को आत्म विभोर कर देती है और वो ईश्वर का प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगते है यह एक आनंद का चरम विराम है,जिसे सुनकर असीम शान्ति का अहसास होता है।
आरंभिक अलाप को जिस शिद्दत से रफ़ी जी ने गाया वो अद्भुत है वही गीत के मध्य में तेज किन्तु रुआंसे स्वर में इसकी प्रस्तुति दी है यह बेहद श्रेष्ठ गायक गा सकता है जो रफ़ी जी थे।भक्त की प्रार्थना और भक्ति को जिस खूबी से रफ़ी साहिब ने गाया है मानो वह स्वयं इस भक्ति रस में डूबकर करुण पुकार कर रहे हो?
यह होता है गायन के प्रति समर्पण।
किन्तु शब्द प्रमुख है,सारा दार्शनिक तत्वों का समावेश करना कोई साधारण कार्य नहीं है वो भी तब जब भक्त समस्त सांसारिक तत्वों का त्यागकर प्रभु के चरणों में ही वास करना चाहता है,उसे दुनिया रास ही नहीं आ रही तब कवि राज शैलेन्द्र अपने शब्दों का प्रभुत्व स्थापित करते है और सोचने पर विवश कर देते है कि उन्हें शैलेन्द्र क्यू कहा जाता है।
मेरे गीत मेरे संग सहारे कोई न मेरा संसार में
दिल के टुकड़े कैसे बेच दूँ दुनियाँ के बाज़ार में
मन के ये मोती रखियो तू संभाले चरणों में चरणों में
दुनिया न भाये मोहे अब तो बुला ले चरणों में चरणों में
है प्रभु इस संसार में सिर्फ मेरे गीत मेरा सहारा है इन्हे दुनिया के बाजार में कैसे बेचूँ? में अनाथ हो जाऊँगा!
मेरी मन की भावनाओं के यह अनमोल मोती तू संभाल कर रखना इन्हे आपके चरणों में अर्पित कर रहा हूँ।
सात सुरों के सातों सागर,मन की उमंगों से जागे
तू ही बता में कैसे गाउँ बहरी दुनियाँ के आगे
मेरी यह बिना अब तेरे हवाले चरणों में चरणों में..
सात सुरों के सातों सागर तो शंकर जयकिशन जी थे जो मन में शैलेन्द्र जी के शब्दों के साथ उमंगें ही भरते रहे। किन्तु शैलेन्द्र जी भक्त के माध्यम से प्रभु से कह रहे है कि यह मेरे सातों सागर मन की उमंगों से ही उतपन्न हुए है किंतु इस बहरी दुनियाँ के आगे गाने से क्या लाभ यह तो भैंस के आगे बीन बजाना है?अतः में अपनी संगीत की वीणा आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।
अब शैलेन्द्र जी भक्त की भक्ति की पराकाष्ठा पर आ जाते है और लिखते है..
मैंने तुझे कोई सुख न दिया,तूने दया लुटाई दोनों हाथ से
तेरे प्यार की याद जो आये दर्द छलक जाय आँखों से
जीना नहीं आया मोहे अब तो बुलाले
चरणों में चरणों में…..
प्रभू आप कितने दयालू है मैंने आपके लिए कुछ नहीं नहीं किया फिर भी आपकी दया की वर्षा आपने मुझ पर दोनों हाथों से की,आपके इस स्नेह की याद आते ही मेरे नेत्र अश्रु पूर्ण हो जाते है,मुझे जीना ही नहीं आता अतः आप मुझे अब अपने चरणों में शरण देने की कृपा करे में आप ही का भक्त हूं।
राग तोड़ी पर आधारित शैलेन्द्र जी का यह भजन उनकी कलम से उपजा भक्ति का नायाब गीत है जिसे सिर्फ और सिर्फ वो ही लिख सकते थे सच में वो आधुनिक कबीर थे।
वेदों में कहा गया है…..
* अपमिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतं…*
अथार्थ भगवान् का स्नेह कभी भी रुकने वाला नहीं है,वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है
जिस प्रकार नीचे की और बहता हुआ जल।ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालो को किसी सांसारिक सम्पदा का अभाव नहीं रहता,उपासक को उसके तेज के भी दर्शन होते है।विचार किया जाय तो वास्तव में यही उपासना के सत्य होने की कसौटी है।शैलेन्द्र जी ने अपने अंतस से यही शाब्दिक उपासना की है।
रफ़ी जी का कंठ कितना मधुर था,इसकी पहचान इस गीत से की जा सकती है।कथा के अनुरूप शंकर जयकिशन जी ने संगीत देकर पूरी फिल्म को संगीतिय प्रकाश से भर दिया है।संगीत साधना में भटकते नायक ऐसे गीत मधुर धुनों में गाता है कि सुनने वाला उसी में खो जाता है।फिल्म के अंत में नायक अपनी जीभ काटकर भगवान् के चरणों में अर्पित कर देता है..
अब तो बुला ले चरणों में चरणों में….
शंकर जयकिशन जी ने इस फिल्म के माध्यम से साबित कर दिया की संगीत की हर विधा में वो संपूर्ण है।आलोचको के पास इस फिल्म के गीत संगीत को सुनने के बाद सांप सूंघ गया था और वो दबी जुबान से
स्वीकारने लगे और फिर कहने लगे शंकर जयकिशन जी अद्वितीय है।

The Glorious Shanker-Jaikishen

Sharda Rajan recounts the glorious past

God said . let there be a revolution in the music of India , let there be new abundant variety of melodies & tunes , let there be rich modern , magnificent orchestra of high grade……..and He created Shanker Jaikishen..

They were not siblings, cousins or relatives . They were not classmates , boyhood friends or any sort of associates….

How they could have met & joined in a most wonderful harmonious union which lasted a lifetime & beyond unless God had wished so .

Their association , their friendship & their style of work were so unique , pure & sincere & divine.

Shankerji used to arrive in the music hall every afternoon & sit there late till night , playing harmonium , making songs & pieces for orchestra.. Jai sab used to come off & on . When they were together sitting with their bajas ,playing & comparing notes it would seem that the Gods & Goddesses of music were present there alive in their melodious musical notes.

Most of the time the hall would be crowded with people. On some rare occasions Shankerji would be sitting there alone playing his harmonium , drowning himself in the flow of music pieces.

On one occasion a song is fixed for recording . And Shankerji goes on & on playing the song .

I ask him . ‘ why are you playing this song over & over again ? The composition is complete & the recording is fixed.

Says he, ‘ you have to go on playing it over & over , that is how you get new ideas & innovations.’

Sure , they brought countless new turns , variations & novelties in their compositions.
The bend in ‘Tera mera pyar amar,’ the hum in ‘Tu pyarka sagar hai,’
The voice over back up in ‘Jabbhi e dil udas hota hai’, the extended TUM in ‘ Tum..m…hi tum..m ,, ho mere jiwanme,’ & the zig zag swishes in the last part of ‘Asmanme tare hai beshuma..a…a…a..a…aaar …
And the up down up down swings in the antara of song ‘Jiya ho jiya kuch boldo ‘ and like these many more.

And the tunes , they would start the song from any new venues like in the notes above the highest note of the middle octave, which noone had ever done before….
Like in ‘Dil tera diwana ‘& ‘Rukja raat ‘
And the jumping in the tunes to unimaginable far away notes like
‘ Dheere dheere …..[sudden jumping]….chal…..
Any one would have thought that after ‘Dheere dheere , the next part would come in the next notes.
Not S J ..their notes would go anywhere to anywhere taking all of us in a melodious high jump ride..
In ‘Akele akele . the song is going softly & suddenly the high jump comes & we are all taken to dizzy heights.

And the various audiations like ‘uf umma ‘ ‘ayayaya’ ‘Yahoo ‘ ‘Takdhindhin, ‘vaivaivai” ‘ullalla ‘ and as such …..

And the mind blowing orchestra , the like of which no one have seen anywhere in the world…. The jerking rhythm pattern in song ‘Tera jana .. & the high energy emotional overtures in ‘Chahe koi mujhe junglee kahe’….the hummable evergreen pieces in ‘mere jhoota hai japani’. The heart pulling cuts & breaks in the music of song ‘Dost dost na raha’ And the sheer brilliance in the music of ‘Ajeeb dastaan ‘ which does not have any match to date in the whole world ..I can mention only few songs ..because I will not be able to analyse so many of them

And the background score of Joker ..an all time classic creation .

Shankerji worked day and night during the background recording holed up in the studio

He was nowhere to be seen , in his regular joints , music hall , nor in CCI club or anywhere for nearly over a month. He just disappeared from the scene.

Because in background music , you have to see the movie , take the timing of the scene & compose the music piece to fit in that time.It has to be composed on the spot , you cannot remember the timing of the scene , compose it at home & bring . So like this ,scene after scene has to be seen & the music has to be composed & recorded.

The recording studio was booked for a month or so & Shankerji stayed there day & night . I do not know how many days Jaikishenji was there.I am sure he must have been there most of the time. But I know Shankerji was there all the time. because I used to go to the studio for my regular sittings & Shankerji was nowhere to be seen there. like all the other time sitting in the music hall every evening.

When I entered film industry, it was their high ascent time & they were zooming & zooming higher & higher Their fans growing day by day & the awards & trophies pouring in .. I heard there were complains from their households that there is no more place in their huge flats to keep any more trophies.

Time for mischief mongers to make entry..Some sly foxes would come to Shankerji , & try to put a wee little poison in his mind , about Jaikishenji…. No need to say Shankerji would flare up & throw this guy out of the music hall in just one moment ,,
The same thing Jaikishenji would do ,, but in his own way

Shankerji told me , that when some such people went to them separately , he said with awe that Jaikisenji also had given the same reply as Shankerji had given to these people.

Thus was their inner tuning , they thought & worked in the same wave length whether they were near or far……………..

Many trophies many movies many jubilees many awards & many shows & then the time comes for government appreciation.

Information comes that Shankerji’s name has come on the Padmabhushan title list..

Cheers but no cheers.

Some thing wrong has happened …..As Shankerji had told me …….

Some dumbos in the government had entered the name Shanker Jaikishen as one name belonging to one person.So one award had been allotted..

Phone calls fly up & down from Delhi & Bombay Officials are contacted in Bombay.. They all understand the mistake & feel sorry.

But they cannot do anything now…. no time for rectifying the mistake .. If S J can take Padmashree , then two Padmashrees can be given . But no two Padmabhushans can be given now..

Shankerji opts for two Padmashrees instead of waiting one more year to get two Padmabhushans.

What is a Padmabhushan or Padmashree ? Can it match their work & their genius? Their value is much much higher than the value of a Padma bhushan or Padmashree..

Even calling them emperors is not giving them their worth . Because many emperors have come & gone with no naamo nishan .

Shanker Jaikishen’s greatness will live for ever like a lighthouse guiding all generations to come. Their music will be alive youthful & fresh matching to any new generation for all time to come.

अविभाज्य शंकर जयकिशन Inseparable Shanker Jaikishen

 

Shyam Shankar Sharma's photo.
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By : Shyam Shankar Sharma

हिंदी फिल्म संगीत की सबसे सफलतम,सबसे चर्चित,सबसे गुणी जोड़ी का उनके सजीव काल में भी तथाकथित बूद्धिजीवियों द्वारा उन्हें आलोचना का केंद्र बिंदु बनाया और उनके देवलोक गमन के बाद भी उन्हें चैन नहीं पड़ रहा अतः वो अवसर पाते ही शंकर जयकिशन जी को विभाजित करने का असफल प्रयास करते है।कितना बड़ा आश्चर्य है जयकिशन जी 1971 और शंकर जी की 1987 में मृत्यु हो जाने के बाद भी इन दोनों को अलग अलग मापदंडों पर रखा जाता है,उन्हें प्रथक प्रथक करने की चेष्टा की जाती है!
इसमे उनका भी दोष नहीं है,कमाई उन्ही समाचारों से होती है जो चर्चित है जिसे लोग पड़ सके।विभिन्न स्थानों पर हो रहे शंकर जयकिशन जी की स्मृति में रखे जाने कार्यक्रमो की निरंतर अभिवर्धी ने उन्हें चौका दिया है।
न जाने कितने संगीतकार आये गए और चले गए उन पर कभी कभार चर्चा जरूर हो जाती है किंतु उसमे विवाद का तड़का कभी नहीं लगता।इसका कारण है कि वो विशिष्ठ नहीं थे?भारत विभाजन के बाद नेहरूजी से लेकर मोदी जी तक के मध्य बहुत से प्रधान मंत्री बने किंतु इनमे से ज्यादा चर्चा उन्ही प्रधान मंत्री की होती है जो विशिष्ठ थे और है।
यही बात फ़िल्मी संगीत के परिपेक्ष्य में प्रायः शंकर जयकिशन को लेकर होती रही है।हाल ही में अहमदाबाद में हुए SJMF के रजत जयंती समोराह की भव्यता देख शंकर जयकिशन जी के ध्रुव विरोधी भी आश्चर्य में पड़ गए की शंकर जयकिशन जी लोकप्रियता तो आज भी जस की तस है और प्रबुद्ध वर्ग उनका दीवाना है,इसी कारण भव्य आयोजन हो रहे है।
अतः उनकी कलमें फिर से जहर उगलने लगी है।
शंकर जयकिशन की जोड़ी वर्ष 1971 में जयकिशन जी के अवसान के बाद टूटी यह नियति का खेल था।जयकिशन जी स्वर्गलोक सिधार गए किन्तु इस गम से शंकर जी कभी उभर ही न सके और यही से हुआ एक संगीत योद्धा के ऊपर कुप्रचार।
बड़े भाई से जब छोटा भाई छिन जाता है अथवा जवान पुत्र पिता से छीन जाता है तो जाने वाले का दर्द सभी को दिखता है,उसकी कमी नज़र आने लगती है किंतु जो इस गम को सह रहा है उसकी तो जीते जी मौत सी हो जाती है।
सभी यह स्थापित करने में लग गए कि मानो सब कुछ जयकिशन जी ही करते थे,शंकर जी के पास कोई सृजन ही नहीं था?यह एक ऐसा कृत्य है जिसका शमन करना बहुत जरुरी है।
दृश्य की जड़े हमेशा अदृश्य होती है !जिसे हम देखते है,छूते है उसकी जड़े भी अदृश्य होती है।पौधे पर लगे मुस्कराते पुष्प की सुंदरता तो हम भांप लेते है किंतु वह सूंदर क्यू बना इसको जानने की कोशिश नहीं करते!
यही हमारी गलती है,उस पुष्प की सुंदरता तो जड़ो से है,जड़ से पौधे को अलग कर दो फूल मुरझा जाएगा!
हम शंकर जी की आलोचना करते वक़्त यह भूल जाते है कि वो ही इस संगीत जोड़ी की मूल जड़ थे!
जयकिशन जी की स्थापना तो शंकर जी ने ही की थी,राजकपूर तो अपनी बरसात शंकर जी को ही देना
चाहते थे उन्हें जयकिशन जी में कोई रूचि नहीं थी,किन्तु शंकर जी की ज़िद के आगे झुकना पड़ा राजकपूर को,और बनी संगीत जोड़ी शंकर जयकिशन।
गर चाहते तो अकेले शंकर जी ही इस फिल्म को कर लेते किन्तु वह जयकिशन जी को इतना चाहते थे कि उनके बिना वह स्वयं की कल्पना ही नहीं कर सकते थे।क्यू कि एक पारखी ही हीरे को पहचानता है।राजकपूर उस वक़्त न जयकिशन जी का सही आंकलन कर पाए और न ही लतामंगेशकर का?
किन्तु शंकर जी ने दोनों का सही आंकलन किया उन्हें अवसर दिया जिसके कारण राजकपूर का फ़िल्मी साम्राज्य स्थापित हो सका RK बैनर की स्थापना हुई।यह एक ऐसा बैनर था जिसके सामने दूसरे बैनर बहुत छोटे नज़र आते थे और इसकी स्थापना की जड़ में थे शंकर जी।
जयकिशन जी,लता जी और राजकपूर को तो उनका ऋणी होना चाहिए।जयकिशन जी ने इस ऋण को सदा आदर दिया और संगीत का यह चंद्र गुप्त सदा अपने गुरु चाणक्य का अनुसरण करते हुए इस दुनिया से गमन कर गया।
जयकिशन जी का स्वर्गवास हो गया और शंकर जी की जीते जी मौत जैसी स्थति कर दी गयी ,अपमान दर अपमान,आरोप दर आरोप!निकृष्ठथा कि हदे पार कर दी गयी।शंकर जी को उम्र के पड़ाव पर जयकिशन जी के आकस्मिक निधन ने कमज़ोर जरूर किया था किन्तु वह संभल सकते थे,किन्तु RK बैनर ने उनकी पीठ पर छुरा भौक दिया और उन्हें संगीतकार मानने से ही इंकार कर दिया और यह कह दिया कि सब कुछ तो जयकिशन करते थे?राज साहिब आप तो जयकिशन जी को बरसात के वक़्त ही नकार चुके थे अतः आपको सफाई देने की आवश्यकता ही नहीं है,बिना शंकर जी के आप कुछ नहीं थे,आग की तपिश को क्या आप भूल गए?
RK बैनर से शंकर जी को च्युत करने से फिल्म उद्योग में यह संदेश गया कि शंकर जी से फिल्मे वापस लो और नवीन फिल्मे मत दो ,इसका प्रचार प्रसार युद्ध स्तर पर किया गया,जिस लता जी को शंकर जी ने स्थापित किया था वो मुकेश जी के संग मिलकर कुचक्र करने लगी,यह वही मुकेश जी थे जिन्हें शंकर जी ने बुरे हाल में पुनः स्थापित किया था और..ऐ प्यासे दिल बेजुबाँ तुझ को ले जाऊँ कहाँ और ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सरूर जैसे गाने गवाये थे जिससे मुकेश जी पुनः मूल धारा में लौट सके।
जोकर में एक गाने का टुकड़ा है…
माल जिससे पाता है,गीत जिससे गाता है उसके ही सीने में भोकता कटार है?
राज कपूर,मुकेश और लतामंगेशकर ने यही किया।
नितांत अकेले पड़े इस समय में फिल्म नगर बैनर ने साहस कर अपने आपको शंकर जी के सुपर्द कर दिया और उसके परिणाम पहचान,बेईमान, सन्यासी,सीमा,दो झूठ आदि फिल्मो द्वारा प्राप्त हुए जो आलोचको को जवाब देने के लिए पर्याप्त थे।अगर आप जयकिशन जी के बाद शंकर जी के सृजन को सुनेंगे तो आप महसूस करेंगे की शंकर जी में संगीत की अपार क्षमता थी,खुद लता जी ने स्वीकारा है शंकरजी की कंपोज़िंग सबसे श्रेष्ठ थी!किन्तु रस्सी जल जरूर जाती है किंतु बल नहीं जाते!लता जी पर यह बात सिद्ध होती है।
जब लता जी को शंकर जी ने अवसर दिया तो सब सही था किंतु अगर वो शारदा जी को ले आये तो अनर्थ हो गया,क्या नई प्रतिभाओं को अवसर देना गलत है?
शंकर जी और शारदा जी के संबंध में इतने घटिया शब्दो का प्रयोग किया गया कि उन्हें लिखते हुए ही शर्म आती है किंतु फ़िल्मी लेखकों की सौंच ही इतनी घटिया थी।
शंकर जी उसूलों में जीने वाले संगीतकार थे,ईश्वर ने उन्हें बहुत वैभव दिया था,चाहते तो वो भी शान्ति से अपना जीवन जी सकते थे,किन्तु संगीत उनकी आत्मा थी।
अतः वह मैदान में डटे रहे और इसी फिल्मी दुनियाँ ने उन्हें 50 के आसपास फिल्मे दी,कार्य सदा उनके दरवाजे पर दस्तक देता रहा,वह पहले संगीतकार थे जो आयुपर्यन्त संगीत देते रहे,जब उनका स्वर्गवास हुआ उस वक़्त भी उनके पास फिल्मे थी।
विपरीत हालातो में 50 फिल्मे प्राप्त होना कोई खेल नहीं है?इतनी फिल्मे तो कई संगीतकार कर ही नहीं पाते?
खैर जिस कारण मुझे यह लेख लिखना पड़ा उसका कारण यह था कि फ़िल्मी पत्रिका चित्रलेखा में एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें यह लिखा था कि एक जाने माने संगीतकार ने जयकिशन के निधन के बाद शंकर जी के साथ जोड़ी बनानी चाही तो शंकर जी ने कहा में जयकिशन के बिना कोई कल्पना ही नहीं कर सकता,मुझे भी मौत आ जाय तो अच्छा है किन्तु में जयकिशन के अलावा किसी से जोड़ी बना ही नहीं सकता।सुना है अपनी फिल्मो से प्राप्त आय का आधा हिस्सा वो जयकिशन जी पुत्री भैरवी को भिजवाया करते थे।
वक़्त गुजर जाता है और इतिहास बन जाता है।शंकर जयकिशन की जोड़ी को अन्तोगत्वा सभी संगीतकारो ने महान बताया।
शंकर जी,ख़ामोशी से इस दुनिया को अलविदा कह गए और छोड़ गए कई प्रश्न?
किन्तु उनके गीत कभी खामोश ही नहीं होते वो काल के साथ चलते चलते और जबरदस्त रूप में आज भी
भी यही कह रहे है..कि हमें शंकर जयकिशन ने बनाया है भला किसकी मजाल जो हमें मिटा सके!हम अजर है अमर है।
Shyam Shanker Sharma

Jaipur, Rajasthan.

Tribute to Jaikishan on his birthday on 4th November, 2016

आज जयकिशन जी( शंकर जी) का जन्म दिवस है।हिंदुस्तान के सबसे सुंदर और सबसे कामयाब संगीतकार जयकिशन जी को में उनके जन्म दिवस पर हार्दिक पुष्पांजली अर्पित करता हूँ। जयकिशन जी ने शंकर जी के साथ मिलकर जो संगीत इतिहास रचा उस इतिहास तक हिंदुस्तान का अन्य कोई संगीतकार पहुँच ही नहीं सकता!
जितने प्रयोग और बदलाव शंकर जयकिशन ने फिल्म संगीत में किये वो एक नज़ीर बन गए है।चाहे सचिन देव बर्मन हो,ओ पी नैयर हो,सी. राम चंद्र हो,मदन मोहन हो,पंडित रविशंकर हो ,नौशाद हो सभी ने एक मत से स्वीकार किया है कि शंकर जयकिशन जैसा संगीत कोई दे ही नहीं सकता।
शंकर जयकिशन को विभाजित कर उनका आंकलन करना सबसे बड़ी भूल है?दोनों मिलकर ही हर सृजन तैयार करते थे।
आज जयकिशन जी की जन्म तिथि है किंतु इस तिथि पर भी यह अहसास होता है कि आज शंकर जयकिशन जी की जन्म तिथि है।
हम जयकिशन जी की जन्म तिथि पर शंकर जी के बिना सिर्फ इतना ही लिख सकते है कि अप्रितम सौंदर्य के धनी, मिलनसार, शौकीन व्यक्तित्व आदि के धनी जयकिशन जी जैसा संगीतकार हिंदी फिल्म इतिहास में आज की तारीख तक तो उतपन्न नहीं हुआ?अल्पायु में जयकिशन जी ने जो कर दिखाया वो लोग दीर्घायु तक करके नहीं दिखा सके! बरसात से आरम्भ हुआ उनका संगीत सफर फिल्म अंदाज़ पर आकर यह कहते हुए समाप्त हो गया ….
जिंदगी इक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना?
जयकिशन जी जब तक जीवित रहे तब तक शंकर जयकिशन जी की जोड़ी के सामने कोई भी संगीतकार टिक ही नहीं पाया !उनकी धुन में सजे गीत सीधे बाउंडरी के पार जाते थे और सिक्स प्राप्त करते थे ?वो एक ओवर (फिल्म) की 6 बोलो ( गीत) पर लगातार सिक्स लगाने वाले एक मात्र संगीतकार थे!सिक्स भी सभी भिन्न प्रकार के किन्तु सभी कलात्मक। जयकिशन जी कभी भी संगीत के मामले में समझौता नहीं करते थे चाहे सामने कोई भी कितनी ही बड़ी हस्थी हो !संगीत ही उनकी आत्मा थी जो शंकर जी की आत्मा के साथ एकाकार थी।
शंकर जयकिशन जी को विभक्त करने में,उनके संगीत में नुक्स निकालने के असीम प्रयास तथाकथित बूद्धिजीवियों द्वारा किये गए जो असफल रहे।
शंकर जयकिशन जी को लेकर जितना मिथ्या प्रचार प्रिंट मीडिया में किया गया उतना शायद ही किसी अन्य संगीतकार के विरुद्ध हुआ हो!
इसका मुलभुत कारण है जो अतिं विशिष्ठ होता है तो सर्वाधिक आलोचना का शिकार भी वही बनता है?
कक्षा में कोई छात्र मेघावी होता है तो अन्य छात्र उससे बेवजह ईर्ष्या करने लग जाते है,उसे अलग थलक करने के सभी प्रयत्न भी होते है।
शंकर जयकिशन जी के साथ भी कुछ ऐसा ही आरम्भ से घटित होता रहा।
राजकपूर की फिल्मे तो शंकर जी के कारण हिट हुयी थी? ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ की प्रायः आलोचक यह सिद्ध करते आये है कि शैलेन्द्र जी के गीतों को संगीत शंकर जी देते थे और राजकपूर की कुल 18 फिल्मो में जिनमे उनकी निर्मित फिल्मे भी है में अधिकाँश गीत शैलेन्द्र जी ने लिखे थे,तो आलोचकों के हिसाब से राजकपूर की फिल्मो में मुख्य संगीत शंकर जी का ही होना चाहिए?
जयकिशन जी हसरत जी के गीतों को संगीत देते थे जो रोमांटिक होते थे वो सभी भी हिट थे?
इससे आलोचक यह सिद्ध करना चाहते थे की दार्शनिक गीतों का संगीत भार शंकर जी पर और रोमांटिक गीतों का संगीत भार जयकिशन जी के पास था!
आलोचकों की इस बात को स्वीकार भी कर ले तो शंकर जयकिशन विभाजित कहाँ हुए? शंकर जी दाए हाथ से और जयकिशन जी बायें हाथ से संगीत मैदान में बेटिंग किया करते थे और पारी को परवान चढ़ाते थे। आलोचकों के हिसाब से जयकिशन जी को राज कपूर ने कम अवसर दिए किन्तु शम्मी जी ने सर्वाधिक दिए।वस्तुतः शंकर जी ने तीन को मुख्य आधार दिया राजकपूर, जयकिशन जी और लता जी को स्थापित करने वाले शंकर जी ही थे।
जयकिशन जी बहुर्मुखी थे ऑर शंकर जी अंतरमुखी।और जब यह विपरीत ध्रुव एक हुए तो इनका नजरिया समान था,हर गीत दोनों का सामूहिक रूप से तैयार करते थे और वो होता था शंकर जयकिशन जी का संगीत।
जयकिशन जी ने आयुपर्यन्त शंकर जी को सम्मान दिया और दोनों के मध्य कोई मनमुटाव नहीं हुआ! जयकिशन जी ने आकाषवाणी के एक कार्यक्रम में मधुप शर्मा से कहा था आप हमारे संगीत को विभाजित मत करो यह हमारे मध्य का गोपनीय पहलु है।
आजकल प्यारेलाल जी में शंकर जयकिशन जी के प्रति असीम भक्ति भाव परिलाक्षित हो रहा है यह सब इसलिए कि उन्हें अब चर्चा में बने रहने की आदत हो गयी है?काम न मिल रहा हो वो तो ठीक है किंतु अब वह SJ के कारण ही चर्चा में बने रहते है।
500 से अधिक फिल्मो में संगीत देने के उपरांत भी LP उस मुकाम को हासिल न कर सके जो SJ को मात्र 180 के लगभग फिल्मो से ही प्राप्त हो गया?
मित्रो,शंकर जयकिशन को विभाजित कर आप उनके संगीत का मजा ले ही नहीं सकते वह अविभाज्य है।अतः आज हम सभी शंकर जायकिशन प्रेमी जयकिशन जी की जन्म तिथि पर यह प्रण ले कि हम कभी उनका विभाजित स्वरुप स्वीकार नहीं करेंगे!और उनके आलोचकों को उनका रास्ता दिखा देंगे।
जायकिशन जी आज शंकर जी से यही कह रहे है…….
ना तू है तू, ना में हूँ में
में तेरी तू मेरी आरजू!!

Shankar, The Legendary Music Director

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by-Rajan Shah

SHANKAR the legendary music director of the Shankar Jaikishan fame was the lone survivor as destiny took away his partner in 1971. There was a huge void in his personal life as well as the music industry as a whole. He faced the music alone. He held on to himself and kept the SJ flag flying. Betrayals, accusations, broken promises, all this he had seen them all, but the man with a heart of steel, refused to crumble. His pride held him in good shape, so did his confidence.

Shankar Singh Raghuvanshi, fondly known as Shankar, knew only three passions in life- tabla, gaana and kasrat. Harmless pleasures these all but Shankar Singh Raghuvansi was of an age when books ought to have been more important as he was only a child. But unlike most children he never studied, only indulged in his passions. His mother often despaired “Yeh to gaanewali ke piche hi tabla bajaayegaa. These turned out to be Prophetic words of sorts. The little boy grew up to be a part of the duo whose music took the film industry by storm. The unbeatable combination of Shankar-Jaikishen rose from the new horizions in the late fourties. Their music still mesmerizes us….Jiya bekaraar hai, yeh mere diwanapan hai, Yeh aasoon mere dilki….

“It all began for the little Shankar in Hyderabad. Those were the days of the Nizam and Maharajas. Their influence was strong and music pervaded every house; it was a part of their lives and inseparable culture. For the little boy too, music was all that mattered. And he was attracted to anything that was connected with it, be it acting or dancing. Though his parents wanted him to study and do well, he didn’t care about books. One day, while passing by the house of a nobleman, he heard the strains of the melodious voice of a singer, Saraswati Bai. But it was spoilt by some cacophonous sound which was supposed to be that of a tabla. It was unbearable for the little boy. He rushed into the mehfil, pushed aside the incompetent tabla player and took over. It all sounds very filmy, but after the little boy finished, wah-wahs poured from everybody who were present there. .

Mumbai, then Bombay was then the centre of theatre activity. So he decided to come down to try his luck. He wanted to join the theatre–perform, sing, dance, play instruments. He learnt kathakali from Krishnan Kutty, Kathak from the Jaipur Gharana and Manipuri and Bharat Natyam as well. Slowly he also learnt to play the piano, the accordion, the sitar and the harmonium quite well. Fate somewhere during this time introduced him to Papaji (Prithviraj Kapoor).

According to Shankar, Papaji looked like some Greek God. At that time he had just started his Prithvi Theatres and one day he called Shankar over to witness a play called Shakuntala that he was staging. He had enrolled many great musicians for this play and while he was watching it, he suddenly asked Shankar to go on stage and accompany the Sarod player with the tabla. He later learnt that he was none other than the great Ali Akbar Khan). After the show, Papaji called Shankar and embraced him. He even asked Shankar to join Prithvi Theatres.

“Jaikishen was a frequent visitor to Prithvi, but it was at a friend’s place that they first met . There were instant good vibes and they slowly became good friends. Shankar introduced him to Papaji and he too began working at Prithvi. Raj Kapoor was also working with his father in those days. When he began Aag, SJ helped him with the music.

“Jai and Shankar decided to be partners. RajKapoor at that time, was working on Barsaat. They composed a tune for him, Jiya bekaraar hai. RK loved it. That was their first major break. None of the two even dreamt of becoming a music director, and suddenly they got a break and it was all like a dream come true. Here they met Shailendra, who was a close friend of Raj and also Hasrat Jaipuri who was with Prithvi. They formed a group and our foursome clicked. Shailendra and Hasrat wrote the lyrics while SJ composed the tunes.”

Barsaat broke records. Then followed the deluge — Nagina, Mayur Pankh, Badal, Badshah. It was all so unexpected. A pair of eighteen year old youngsters causing existing edicts to tremble. Shankar-Jaikishen were creating a furore. They had descended upon the domain of Naushad, S.D. Burman, Husanlal Bhagatram, Ghulam Mohammed, O.P. Nayyar. The seniors were at first sceptical, Yeh ladke kitne din chal sakte hain , was what they thought and discusssed. But the matter worsened for the seniors.They got worried. But C. Ramchandra was one man who always appreciated the young duo. He used to tell the others, “Yeh ladke hum sabko hairan karke rekhenge. Hindustan mein dhoom machayenge.”

The Shankar-Jaikishen era had begun. The old order was displaced. Given their propensity to compose songs that appealed to both the box-office and people’s tastes, it wasn’t strange or surprising that almost every top hero insisted on Shankar-Jaikishen as part of his contract. With Raj Kapoor there was Awara, Aah, Shri 420, Boot Polish, Jis Desh Mein Ganga Behti Hai, Sangam, Mera Naam Joker. Shammi Kapoor danced around hills and dales and beautiful gardens teasing his pretty heroines, while Shankar-Jaikishen’s music kept mercurial pace in Junglee, Janwar, Badtameez.

Rajendra Kumar rarely worked in a film that didn’t have Shankar-Jaikishen on the credits. Aas Ka Panchi, Zindagi, Sasural, made the ‘jubilee’ hero, just because of Shankar-Jaikishen.

As partners, Shankar had a perfect tuning with his junior partner. Their relationship strengthened over time. They shared instant empathy, an inherent understanding and a deep bond of friendship. Whenever they both wanted to compose a particular song, they would toss a coin to decide who would do it. Tensions between them were only over music but they would always sort them out. When Shankar composed Nanhe munhe bachche teri muthi mein kya hai for Boot Polish, Jai didn’t like the tune. But Shankar convinced him otherwise. In fact, Boot Polish as planned earlier, was to be a song less film. Later Raj kapoor decided to add songs.

They always trusted each other completely. They never listened to those who poisoned their ears about the other. And it was like that till Jaikishans death. It is absolutely untrue that they grew apart after Sangam.

“Being basically a good Gujarati businessman, Jai also handled all the business matters. He was a financial juggler and did his job well. When he died, Shankar was shattered. For 3-4 years after his death, he could not work…could not build up the mood. And people tried to provoke him by saying things like their work was mainly Jai’s doing. But Shankar refused to speak out in retaliation.

“After Barsaat, Shankar bought an M.G. Racer Car. It was the first car between the four of them. Jai bought his own, later. Since it was a two-seater, Shankar and Jai would draw back the hood, sit in front while Shailendra and Hasrat would fit in behind . Later, Jai and Shankar both, bought Chevrolets. For the Filmfare Awards function they would drive in their Chevrolets and enter in style.

In many ways they revolutionized the industry. They were amongst the first who thought of giving due respect to the Press, calling for Press Conferences,…hosting parties. They were never afraid of change. Barsaat was the first film where Lata sang all the songs. Before that, she would be signed for only one or two of them per film as she had a very thin voice as compared to other to singers of those days for example Noorjehan, Shamshad, Zohra and Suraiya. Those days Manna Dey sang mainly bhajans. SJ took him for light songs like Chori Chori, Aa ja sanam and Yeh raat bheegi bheegi, which changed things for him. Mukeshs popularity also grew especially after he sang Yeh mera diwanapan hai for Yahudi.

Shanker had few setbacks too. Like Raj Kapoor’s betrayal. Dost Dost Na raha was one of Shankar’s contribution to Raj Kapoor’s Sangam. Perennially haunting, stirring, it exuded pathos. While at that stage no one would have dreamt that the Raj Kapoor-Shankar-Jaikishen team would one day not exist, years later the ‘dosti’ was not the same. They parted professional ways. Shankar insists he wasn’t upset when his ‘dost’ signed up Lakshikant-Pyarelal for Bobby.

Their songs have been translated in Chinese. Russian, German and even Arabic. How ever Rajkapoors son wanted some change. Thus they chose other music directors.

Another jolt came from Prasad Productions, whose films had been transformed from mediocre family dramas to musical hits….Teri pyari pyari surat to (Sasural), Jaoon Kahan bata ae dil (Chhoti Bahen)….all this courtesy, Shankar-Jaikishen. Even G.P. Sippy didn’t take after Brahmachari and Andaz.

Most of Shailendra’s lyrics were Shankar’s compositions. They both complemented each other perfectly. “When they were discussing the music of Shri 420, Rajkapoor was describing a scene. Shankar instantaneously sang out Ramaiya vatavaiya, which in Telugu means ‘Ramaiya, will you come?” And Jai spontaneously gave his rejoinder, ‘Maine dil tujhko diya’. It was the beginning of this iconic song. When they were driving past a bus-stop and Jai saw a pretty girl, he turned around instinctively to take a look. That’s how Mud mud ke na dekh (Shri 420) was born. Recalls Shankar, Shailendra was great. He wrote beautifully. People would cry at the beauty of his lyrics.

From small beginnings in a South Indian lodge at Parel to a well-appointed home at the ‘Beacan at Churchgate, Shankars success story was truly established. . His rehearsal room at Famous Studio in mahalaxmi still remains. Many moons ago, hordes of producers thronged its long corridors, waiting patiently with wads of notes, hoping to entice the two gentlemen into signing a contract. And it wasn’t easy.

posted by Lakshmi Kanta Tummala

संगीत के सरताज शंकर-जयकिशन

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संगीत के सरताज शंकरजयकिशन…।।।।।।।..।.।।।।।।।।…।।।।।।।।..।।..।।।फ़िल्म जगत में पुरे 2 दशक यानी बीस साल(1950-70)की अवधी शंकर जयकिशन के नाम रही।यह वो दौर था जब उनके संगीत से सजी हर फ़िल्म का हर गीत हिट हो जाता था।मन्ना डे कहते थे” उनके पास हिट धुनों की एक जादुई पूड़ियां थी,जिसमे से बराबर एक से बढ़कर एक हिट गाने श्रोताओ को देते रहते थे।आज के संगीतकार तो एक फ़िल्म में किसी तरह एक हिट गाना देकर अपने आपको धन्य समझने लगते है।मगर उनके लिए यह एक मामूली बात थी।वे लगातार श्रेष्ट्र सृजन करते रहे 1955 मे मैंने उनके लिए सीमा फ़िल्म का एक गीत..तू प्यार का सागर है..गाया था।इसके बाद उनके लिए मैंने जो भी गीत गाये,सारे के सारे जबरदस्त हिट रहेथे”।इस संगीतकार जोड़ी के बारे में यह बात भी मशहूर थी कि उनके पास हिट गानो का खजाना था,जिससे एक से बढ़कर एक हिट गीत निकले पर उनकी गुणवत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ा।विपिन रेशमिया लिखते है वे लीजेंड्स थे,आज के संगीतकार तो कोशिश ही नहीं करते?वे पहले संगीतकार थे जिन्होंने म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स का उपयोग बड़े पैमाने पर किया था.पियानो,आकार्डियान,मेंडोलिन,ओ बो.इम्मपेट आदि देसी विदेशी साजो का उन्होंने सटीक तालमेल बिठाया।साज़ बजाने वालोँ के मामले मे कोई कमी सख्त ना पसंद थी। गायन के मामले मे भी वे हठधर्मी थे।मुकेश ,राज कपूर की आवाज थे पर इस जोड़ीं ने जरुरत पड़ने पर राजजी के कई गाने मन्नाजी से गवाएं।बाद में घोर आलोचकों ने भी यह कबूल किया की राजजी की शैली को मन्ना की आवाज ज्यादा मुफीद लगती है।इसी तरह लताजी से उन्होंने सर्वाधिक हिट गाने गवांये,पर आशाजी का भी बहुत सार्थक उपयोग किया।उस दौर के सारे नामचीन गायको हेमन्त कुमार,तलत मेहमूद,रफ़ी,किशोर आदि का उन्होंने सदुपयोग किया।मृत्यु से कुछ दिन पहले हेमंत कुमार ने एक मुलाकात में उनके सम्मान में कहा”वो तो जीनियस छिलो अर्थार्त वो तो जिनियस है।आम धारणा है की RK की फ़िल्मो मे ही इस जोड़ी का हिट संगीत आया यह निराधार है,उस खेमे के वो जरूर थे पर इस भ्रम को उन्होंने बार बार तोड़ा, गलत सिद्ध किया,वो किसी एक खेमे के मोहताज नहीं थे।उस दौर के सारे नामचीन फ़िल्म मेकर्स के साथ काम किया।अमूमन यह कहा जाता है की यह जोड़ी क्लासिक रागों से बचती है पर बसंत बहार,आम्रपाली,सीमा,साँझ और सवेरा,दिल एक मंदिर,तीसरी कसम,मेरे हज़ूर जैसी कई फ़िल्मो में शुद्ध क्लासिक रागों पर आधारित गानो की रचना कर उन्होंने सबका मुंह बंद कर दिया।1947 में हैदराबाद से आये शंकरजी और गुजरात से आये गुजु भाई जयकिशन जी के बाहरी व्यक्तित्व सर्वथा जुदा थे।पर संगीत ने उन्हें एकाकार कर दिया।RK की पहली फ़िल्म आग(1948) मे ये दोनों संगीतकार राम गांगुली के सहायक थे।पर राजजी की दूसरी फ़िल्म बरसात(1949) मे उन्होंने स्वतंत्र संगीत रचना की।यह साथ जयकिशनजी की मृत्यु तक बदस्तूर कायम रहा।1966 में अपने अनन्य मित्र गीतकार शैलेन्द्र की असामयिक मौत के बाद जयकिशनजी बेहद टूट गए थे।1971 मे जयकिशन के असामयिक निधन से शंकरजी का सृजन भी मानो बिखरने लगा था पर दृढ़ संकल्प के साथ शंकरजी ने कई हिट गीतों का निर्माण किया जिसमे सोहन लाल कँवर का उन्हें सच्चा साथ मिला।1975 में उन्होंने सन्यासी में हिट संगीत दिया और शंकर जयकिशन जोड़ी का नाम 1984 तक कायम रखा और इसी वर्ष ख़ामोशी के साथ शंकरजी ने सांसो क संसार से विदा ली।इस जोड़ी ने कुल 8 बार फ़िल्म फेयर अवार्ड प्राप्त किये,सर्वप्रथम पदमश्री से सम्मानित किये गए।आज के कुछ संगीतकार देर सवेर भले ही उतने अवार्ड्स प्राप्त कर ले पर याद रखे की यह अवार्ड्स उन्हें महान संगीतकारों के दौर मे मिले थे जिनका कोई सानी नहीं था।शंकर जयकिशन जैसी कर्ण प्रियता लाना आज के संगीतकारों के वश की बात नहीं है।आज संगीत युगंधर शंकरजी की जन्म तिथि है में अपना यह आलेख पुष्प उन्हें सादर समर्पित करता हूँ।

Written by

Shyam Shankar Sharma's photo.

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