Monthly Archives: January 2018

हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है*

लेखक

श्री श्याम शंकर शर्मा

Shyam Shankar Sharma's photo.

1960 में बनी RK बैनर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है के निर्माता थे राजकपूर और निर्देशक थे राधुकर्मकार।मुख्य भूमिका में थे राजकपूर, पद्मिनी,प्राण,ललिता पंवार,राज मेहरा आदि।
14 गीतों से सुसज़्ज़ित यह फिल्म भारतीय इतिहास में अजर अमर रहेगी।पतित पावनी माँ गंगा हिमालय से उतरकर देश के विभिन्न शहरो में बहती हुई गंगासागर में जाकर विलीन हो जाती है।गंगा हमारी आस्था है,हमारी सभय्ता है और करोङो देश वासियों के लिए पेट पालने का साधन है ,यह हमारा गौरव और संस्कृति है ?तभी तो फिल्म के आरम्भ में बीच गंगा में खड़े एक व्यक्ति को सूर्य अर्ध्य करते दिखाया गया है
जो यह कह रहा है……*माँ में भी कितना भाग्य शाली हूँ कि मैंने उस देश में जन्म लिया
🇮🇳 जिस देश में गंगा बहती है🇮🇳
हम सभी हिंदुस्तानी अब प्रायः यह कहने में गर्व महसूस करते है ..कि हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है।शैलेन्द्र जी लिखित इस गीत में समूचे हिंदुस्तान की तस्वीर है,उसका इतिहास है उसका भूत, भविष्य और वर्तमान है!माँ गंगा के किनारे असंख्य सभ्यताएं,गाँव और शहर बस गए इस निर्मल अमृत जल में हमारी न जाने कितनी पीढ़ियाँ अपना उद्धार गई?इस गंगा से हमारा भावनात्मक नाता है,यह मात्र नदी नहीं भारत वर्ष की जीवन धारा है।पवित्र गंगा माँ ही कल्याण कारी है इसने हिंदुस्तान को बनते बिगते देखा है,बहुत कुछ सहा है,भारत को गर समझना है तो गंगा माँ को समझना होगा,जो दैवीय लोक से इस पावन वसुंधरा पर अवतरित हुई है।
सामाजिक समस्या प्रधान इस फिल्म का कथानक जब राजकपूर जी ने शंकर जयकिशन जी को सुनाया और तदनरुप इस फिल्म का संगीत देने को कहा तो शंकर जी ने कहा कि डाकुओं की फिल्मो के लिए हमारे पास संगीत नहीं है और उन्होंने संगीत देने से इंकार कर दिया,शैलेन्द्र जी के कहने पर वो तैयार हुए की यह उस धरातल की फिल्म नहीं है,जैसा आप समझ रहे है और इस प्रकार शंकर जयकिशन जी इस फिल्म के लिए संगीत देने को तैयार हो गए,यह वो वक़्त था जब सभी शंकर जयकिशन जी के समक्ष पानी भरते थे चाहे राजकपूर जी ही क्यू न हो?
शैलेन्द्र जी का लिखा गीत लेकर राज साहिब जयकिशन जी के संग बैठे अन्य के साथ चर्चा कर रहे थे और परेशान थे कि कवि राज शैलेन्द्र ये क्या लिख लाये ?कैसे इस पर धुन बनेगी ?जबकि परिस्थिति ही भिन्न है ,तभी शंकर जी का आगमन हुआ और राज साहिब से वो कागज़ लिया और महज़ कुछ समय बाद ही वो इस गीत की धुन तैयार कर लाये और वह कालजयी सदैव प्रासंगिक गीत था…..
होंठो पे सच्चाई रहती है
जहाँ दिल में सफाई रहती है
हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है।
इसे आप सन्देश गीत,देशभक्ति गीत या सत्य दर्पण गीत आदि की कोई भी संज्ञा दे सकते है।
गीत के मुखड़े में ही शैलेन्द्र जी हिन्दुस्तानियों के बारे में संपूर्ण विश्व🌍 को यह स्पष्ट कर देते है कि हम भारतीय सच्चाई से जीवन जीते है ,हमारा हृदय कोमल और वत्सल से भरा है,साफ़ है।
गीत के आरम्भ से पहले डाकुओं के परिवारों के माध्यम से फिल्मकार ने समस्त विश्व को एक जगह एकत्रित कर दिया जिसमें भारत का प्रधिनित्व फिल्म के नायक राजकपूर जी कर रहे थे। समूह में दुर्दांत डाकू अपने अपने हथियार लिए गर्व से सीना ताने अपना बाहुबल दिखा रहे थे,तो ढप और नगाड़े के संगीत पर कई पुरुष नांच रहे थे,महिलाएं नॉच रही थी,बच्चे उत्साह और उमंग में थे,फिल्म की नायिका अपनी चोली पे अवस्थित घंटियों को पीठ पर बजा रही थी और नायक ढपली बजा रहा था,समस्त वातावरण उत्साह और उल्लास से परिपूर्ण था,बूढी ओरते, वृद्ध जन आदि सभी आनंद में यह सब कुछ देख रहे थे की अचानक दृश्य में परिवर्तन आता है और पूरे माहौल में संन्नाटा सा पसर जाता है,सभी अपनी अपनी पोजीश न पर आ जाते है।तभी राजकपूर जी एक हँसती, मुस्कराती बच्ची को गोद में उठा लेते है..और गाने लगते है …होंठो पे सच्चाई रहती है जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है
हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है…,सभी के शस्त्र झुकने लगते है,वृद्धजन,बच्चे ,युवा ,नायिका और औरतें विस्मय से राजू को सुनने लगते है..आखिर वो समस्त विश्व को भारतीय मूल्यों की पहचान कराने को उत्सुक है,समस्त विश्व को समझाना चाहता है कि हम क्या है?
* मेहमाँ जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है,
ज्यादा की नहीं लालच हमको थोड़े में गुजारा होता है
बच्चो के लिए धरती माँ सदियों से सभी कुछ सहती है,हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है*
अथिति देवो भवः की हमारी मान्यता से पूरे विश्व को इस गीत के माध्यम से शैलेन्द्र जी ने परिचित कराया है।हम तो थोड़े में गुज़ारा कर लेते है,हमें किसी प्रकार का लालच नहीं?और संपूर्ण विश्व जानता है कि पूरे विश्व में हिंदुस्तान ही ऐसा देश है जो आक्रमणकारी नहीं है,इतिहास इसका गवाह है,यह तपस्वियों की भूमि है।
*कुछ लोग जो ज्यादा जानते है,इन्सान को कम पहचानते है
ये पूरब है,पूरब वाले हर जान की कीमत जानते है
मिल जुल के रहो और प्यार करो इक चीज़ यही जो रहती है
हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है*
आक्रमणकारी क्या जाने जीवन क्या होता है?इंसानियत क्या होती है?वो तो ध्वंस करने रक्तपात करने और लूटने में विश्वास करते है किंतु भारतीय दर्शन “वासुदेव कुटम्भकम” की धारणा पर अवलंबित है,यह पूरे विश्व् को एक परिवार मानता है और मिल जुलकर रहने और प्रेम से रहने का संदेश देता है,प्रेम ही ईश्वर है जो निर्मलता से प्राप्त होता है और जिसकी हम पर असीम कृपा है तभी तो हम कह रहे है
……हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है…….
गंगा..गंगा…गंगा..पतित पावनी गंगा हमारी माँ है,उसकी यहाँ नित्य आरती की जाती है,पूजा की जाती है,तर्पण किया जाता है,हज़ारो जगमगाते लौ युक्त दिए प्रवाहित किये जाते है,इसके घाटों पर हज़ारो श्रद्धालु अपनी बुराइयों को त्यागने का निश्चय करने आते है,इसके किनारों पर स्थित मंदिरों से बजती घंटियां संगीत की महत्ता का दर्शन कराती है,मन शुद्धतम भाव को प्राप्त हो जाता है,माँ का प्रभाव ही ऐसा है।हमारे अस्तित्व का आधार है हिमालय जहाँ से गंगा का आरम्भ होता है।
हिमालय हिम का नहीं ..हम का भी है,अथार्थ हम सबका आलय, यानी घर है।इस घर से जुड़ा हुआ है
हम सबका अस्तित्व,हमारा अतीत,वर्तमान और भविष्य।
महा कवि कालिदास ने अपने काव्य में हिमालय को अनेकों रत्नों का जन्म दाता कहा है,उसकी पर्वत श्रृंखलाओं को ओषदिय भण्डार माना है,वह पृथ्वी में रहकर भी स्वर्ग है,और गंगा माँ का उदगम् स्थल ही हिमालय है।माँ गंगा राजू को जानती है तभी तो भोले भाले राजू को इतना ज्ञान है,वो बुन्देलखण्ड का मात्र भांड नहीं अपितु उसका धाम वहां है जहाँ गंगा बहती है?
*** जो जिससे मिला सीखा हमने गैरो को भी अपनाया हमने,मतलब के लिए अंधे होकर रोटी को नहीं पूजा हमने,अब हम तो क्या सारी दुनियाँ सारी दुनीयाँ से कहती है हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहतिन्है****
जब हम रोटी का महत्व भूल गए,मतलबी हो गए,खंड खंड होकर शासन करने लगे,वर्ण व्यवस्थाओं,छुआछूत,अमीरी गरीबी के तराजू पर जीवन जीने लगे तो कमजोर हो गए,अपने अपने स्वार्थों की पूर्ति ही हमारा जीवन लक्ष हो गया तो विदेशी आक्रांताओं ने भारत वर्ष पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए आक्रमण भी इतने की कोई दूसरा देश होता तो उसका नामो निशान मिट जाता किन्तु हम मिटे सिर्फ इसलिए नहीं क्योकि यह तपोभूमि थी?
शैलेंद्रजी के लिखने का अभिप्राय यह है कि गजनी से लेकर ब्रिटिशकाल तक हम पर असंख्य आक्रमण हुए!गजनी ने लूटा और लूट कर चला गया,गोरी ने लूटा और अपने गुलाम को भारत सौप गया।खिलजी,अफगान,पुर्तगाली आदि ने हमें लुटा।बाबर ने तो मुग़ल साम्राज्य की स्थापना ही कर दीं जो जफ़र तक चली,किन्तु हम अब अंग्रेजो के अधीन हो गए?
ये सभी गैर थे फिर भी हमने इनको अपनाया,इनसे बहुत कुछ सीखा,कई विदेशी दार्शनिक और ओषधीय उपचारक भी आये उनसे भी सीखा, हम लूटते रहे,पीटते रहे,गुलामी करते रहे,विश्वासघात करते रहे,जाती संप्रदायों में बट गए,मतलबी हो गए और इसी में अंधे होकर रोटी को पूजना भूल गए?इसी कारण आज सारी दुनियाँ सारी दुनियाँ से कह रही है यह असंगठित लोग उसी देश के है…
।।।जिस देश में गंगा बहती है।।।
शैलेन्द्र जी ने बेहद सरल शब्दों में भारतीयों का कच्चा चिट्ठा खोलकर लिख दिया,संभवतया राजकपूर जी को यह गीत पल्ले नहीं पड़ा किन्तु शंकर जी शैलेन्द्र जी के शब्दों की महत्ता को भली भांति समझ गए थे
अतः उन्होंने जयकिशन जी के साथ मिलकर इस गीत की इतनी प्यारी धुन बना डाली जो काल जयी बन गयी।स्वतंत्रता दिवस अथवा गणतंत्र दिवस पर देश भक्ति के कई फ़िल्मी गीत बजते है जो जोश का जज़्बा भरते तो है किंतु एकमात्र यही गीत ऐसा है जो समस्त हिंदुस्तान को भूत, भविष्य और वर्तमान में परिभाषित करता है,यही खूबी थी शैलेन्द्र जी और शंकर जयकिशन जी में ,वह सदा हटकर नूतन प्रयोग करते थे। राजकपूर जी पर फिल्माए इस गीत को मुकेश जी ने बहुत अनुपम स्वर दिया है जो शंकर जयकिशन जी के संगीत की कसौटी पर खरा उतरता है।एक बहुत ही उच्चस्तरीय सन्देश गीत जिसमे देश प्रेम की भावना तो झलकती है किंतु सच्चाई भी साथ साथ चलती है।
श्याम शंकर शर्मा
जयपुर,राजस्थान।

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When Indian and Israeli diplomats bonded over ‘Ichak Dana, Bichak Dana’

NEW DELHI: India and Israel have been long-time allies and a cultural exchange between the two nations is natural. But Indian diplomats were greatly surprised when members of the Israeli delegation accompanying Prime Minister Benjamin Netanyahu revealed their familiarity with the classic Hindi movie song ‘Ichak Dana, Bichak Dana’.

Ministry of External Affairs secretary Vikas Gokhale shared the anecdote during a press briefing earlier today. At a luncheon hosted by Prime Minister Narendra Modi to welcome Netanyahu on his maiden visit to India, the live music band played the oldie ‘Ichak Dana, Bichak Dana’. Several Israeli delegates immediately recognised the track, and the Indians present there marveled at this shared cultural experience.

“Interesting anecdote was that during lunch which PM hosted short while ago, one of the music items played by live band was ‘Ichak Dana Bichak Dana’. Number of Israelis who knew that was amazing,” Gokhale said.

‘Ichak Dana, Bichak Dana’ is an immensely hummable ditty from 1955 hit ‘Shri 420’, starring Raj Kapoor and Nargis. Sung by Lata Mangeshkar and Mukesh, the song plays as Nargis teaches the alphabet to a bunch of ragtag kids, with Raj Kapoor acting the part of comical hanger-on.

“Films are a good way to building people to people relationships,” Gokhale astutely observed.

Interesting anecdote was that during lunch which PM hosted short while ago, one of the music items played by live band was ‘Ichak Dana Bichak Dana’. Number of Israelis who knew that was amazing. Films a good way to building people to people relationships: Vijay Gokhale, MEA Secy

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