1956 की फिल्म बसन्त बहार भारतीय फ़िल्मी इतिहास में शास्त्रीय संगीत में सबसे अग्रणी है

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1956 की फिल्म बसन्त बहार भारतीय फ़िल्मी इतिहास में शास्त्रीय संगीत में सबसे अग्रणी है इसे सदा बैजू बावरा के साथ स्पर्धात्मक रूप में माना जाता है किंतु यही एक मात्र फिल्म है जिसके गीतों में और पार्श्व संगीत में पूर्णतः शास्त्रीय संगीत का प्रयोग हुआ है,यह उन मिथकों को पूर्ण विराम देता है कि शंकर जयकिशन जी मात्र पाश्चात्य धुनों पर ही अपनी महारत हासिल रखते है?यद्यपि शंकर जयकिशन जी ने बार बार इस मिथक को तोड़ा।
बसंत बहार फिल्म के निर्माता थे आर .चंद्र और निर्देशक थे राजा नवाथे…राजा नवाथे के साथ शंकर जयकिशन जी की और भी फिल्मे है जिसमे आह और गुमनाम प्रमुख है।
इस फिल्म के कलाकार थे निम्मी,भारत भूषण,चंद्र शेखर,मनमोहन कृष्ण,कुमकुम,ओम प्रकाश,लीला चिटनीस,परसराम,इंदिरा,चाँद बर्क, एस. के. प्रेम,नायम पल्ली,श्याम कुमार और राजे।
इस फिल्म में गायक थे पंडित भीम सेन जोशी,लता, रफ़ी,मन्ना डे,लता और आशा।
गीतकार थे शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी,एक पारंपरिक गीत भी इस फिल्म में था।इस फिल्म में कुल 10 गीत थे। जरा इन गीतों पर गौर तो कीजिये:-
1,में पिया तेरी..लता/हसरत
2,जा जा रे बालमवा/ लता/शैलेन्द्र
3,बड़ी देर भई/ रफ़ी/शैलेन्द्र
4,दुनिया न भाये…/रफ़ी/ शैलेन्द्र
5,सुर ना सजे../ मन्ना डे/ शैलेन्द्र
6,भय भंजना वंदना …/ मन्ना डे/ शैलेन्द्र
7,कर गया रे कर गया मुझपे ज़ादू…/लता, आशा/शैलेन्द्र
8,नैन मिले चैन कहां../ लता, मन्ना डे/ शैलेन्द्र
9,केतकी ,गुलाब,जूही,चम्पक बन फूले/ भीम सेन,मन्ना डे/शैलेन्द्र
10,गाओ री बसंत बहार/सामूहिक पारंपरिक गीत.यह गीत फिल्म में तो है किंतु डिस्क पर उपलब्ध् नहीं है

mannadeybhimsen

किसी सज्जन के पास उपलब्ध् हो तो प्रस्तुत कर अनुग्रहित करे।
बसंत बहार एक संगीत प्रधान फिल्म थी जो शंकर जयकिशन जी के वेवध्यपूर्ण संगीत का अमृत कलश था,इस फिल्म के संगीत का कोई सानी नहीं है,भले ही इसकी तुलना बैजू बावरा से की जाती है।बैजू बावरा के संगीत के बाद नॉशाद साहिब को यह मुगालता हो गया था कि शास्त्रीय संगीत में उनका एकाधिकार है,इसी कारण उन्होंने फिल्म के निर्माता को जो भारत भूषण जी के भाई थे को फिल्म बसंत बहार का संगीत देने से इसलिए इंकार कर दिया क्यू कि वो उनका पारिश्रमिक देने में असमर्थ थे।
जब शंकर जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने निर्माता को बुलाया की वो पारिश्रमिक की चिंता न करे
संगीत हम देंगे किन्तु भारत भूषण जी को लग रहा था कि शंकर जयकिशन कैसे इस फिल्म का संगीत देंगे?किन्तु भ्राता को SJ पर विश्वास था।शंकर जयकिशन जी ने इस गीत को एक चुनोती के रूप में स्वीकार किया और रच डाला एक इतिहास जिसने पंडित भीमसेन जोशी और बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष तक को अचंभित कर दिया जो इस क्षेत्र के महारथी थे।हिंदी फिल्म संगीत इतिहास की शास्त्रीय संगीत की यह बेहतरीन फिल्म है जो शंकर जयकिशन जी के संगीत का अनुपम पुष्प है जिसकी सुगंध आज भी महक रही है।
मन्नाडे जी को जब शंकर जी ने बताया कि उन्हें पंडित भीमसेन जोशी को हराना है तो वो भाग खड़े हुए बमुश्किल से वापसी करी और क्या खूब गायन किया किन्तु निसंदेह भीम सेन जी उन पर भारी थे जिन्हें फिल्म की कहानी के कारण हारना पड़ा।
कन्नड़ उपन्यास हंस गीते पर बसंत बहार फिल्म आधारित थी,यद्यपि इसी हंस गीते नाम पर कन्नड़ में भी फिल्म बनी किन्तु संगीत की दृष्टि से यह बसंत बहार के निकट ही नहीं फटकती?
संगीत मन को पंख लगाए
गीतों से रिमझिम रस बरसाए
सुर की साधना परमेश्वर की
शंकर जयकिशन जी वास्तविक रूप में संगीत के साधक थे और इस साधना को परमेश्वर मानते थे।
आज का गीत दुनिया न भाये मोहे अब तो बुलाले चरणों में चरणों में….
रफ़ी जी का स्वर और शंकर जयकिशन जी के संगीत में इतनी आर्दता है कि वो श्रोता को आत्म विभोर कर देती है और वो ईश्वर का प्रत्यक्ष सा अनुभव करने लगते है यह एक आनंद का चरम विराम है,जिसे सुनकर असीम शान्ति का अहसास होता है।
आरंभिक अलाप को जिस शिद्दत से रफ़ी जी ने गाया वो अद्भुत है वही गीत के मध्य में तेज किन्तु रुआंसे स्वर में इसकी प्रस्तुति दी है यह बेहद श्रेष्ठ गायक गा सकता है जो रफ़ी जी थे।भक्त की प्रार्थना और भक्ति को जिस खूबी से रफ़ी साहिब ने गाया है मानो वह स्वयं इस भक्ति रस में डूबकर करुण पुकार कर रहे हो?
यह होता है गायन के प्रति समर्पण।
किन्तु शब्द प्रमुख है,सारा दार्शनिक तत्वों का समावेश करना कोई साधारण कार्य नहीं है वो भी तब जब भक्त समस्त सांसारिक तत्वों का त्यागकर प्रभु के चरणों में ही वास करना चाहता है,उसे दुनिया रास ही नहीं आ रही तब कवि राज शैलेन्द्र अपने शब्दों का प्रभुत्व स्थापित करते है और सोचने पर विवश कर देते है कि उन्हें शैलेन्द्र क्यू कहा जाता है।
मेरे गीत मेरे संग सहारे कोई न मेरा संसार में
दिल के टुकड़े कैसे बेच दूँ दुनियाँ के बाज़ार में
मन के ये मोती रखियो तू संभाले चरणों में चरणों में
दुनिया न भाये मोहे अब तो बुला ले चरणों में चरणों में
है प्रभु इस संसार में सिर्फ मेरे गीत मेरा सहारा है इन्हे दुनिया के बाजार में कैसे बेचूँ? में अनाथ हो जाऊँगा!
मेरी मन की भावनाओं के यह अनमोल मोती तू संभाल कर रखना इन्हे आपके चरणों में अर्पित कर रहा हूँ।
सात सुरों के सातों सागर,मन की उमंगों से जागे
तू ही बता में कैसे गाउँ बहरी दुनियाँ के आगे
मेरी यह बिना अब तेरे हवाले चरणों में चरणों में..
सात सुरों के सातों सागर तो शंकर जयकिशन जी थे जो मन में शैलेन्द्र जी के शब्दों के साथ उमंगें ही भरते रहे। किन्तु शैलेन्द्र जी भक्त के माध्यम से प्रभु से कह रहे है कि यह मेरे सातों सागर मन की उमंगों से ही उतपन्न हुए है किंतु इस बहरी दुनियाँ के आगे गाने से क्या लाभ यह तो भैंस के आगे बीन बजाना है?अतः में अपनी संगीत की वीणा आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।
अब शैलेन्द्र जी भक्त की भक्ति की पराकाष्ठा पर आ जाते है और लिखते है..
मैंने तुझे कोई सुख न दिया,तूने दया लुटाई दोनों हाथ से
तेरे प्यार की याद जो आये दर्द छलक जाय आँखों से
जीना नहीं आया मोहे अब तो बुलाले
चरणों में चरणों में…..
प्रभू आप कितने दयालू है मैंने आपके लिए कुछ नहीं नहीं किया फिर भी आपकी दया की वर्षा आपने मुझ पर दोनों हाथों से की,आपके इस स्नेह की याद आते ही मेरे नेत्र अश्रु पूर्ण हो जाते है,मुझे जीना ही नहीं आता अतः आप मुझे अब अपने चरणों में शरण देने की कृपा करे में आप ही का भक्त हूं।
राग तोड़ी पर आधारित शैलेन्द्र जी का यह भजन उनकी कलम से उपजा भक्ति का नायाब गीत है जिसे सिर्फ और सिर्फ वो ही लिख सकते थे सच में वो आधुनिक कबीर थे।
वेदों में कहा गया है…..
* अपमिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतं…*
अथार्थ भगवान् का स्नेह कभी भी रुकने वाला नहीं है,वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है
जिस प्रकार नीचे की और बहता हुआ जल।ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालो को किसी सांसारिक सम्पदा का अभाव नहीं रहता,उपासक को उसके तेज के भी दर्शन होते है।विचार किया जाय तो वास्तव में यही उपासना के सत्य होने की कसौटी है।शैलेन्द्र जी ने अपने अंतस से यही शाब्दिक उपासना की है।
रफ़ी जी का कंठ कितना मधुर था,इसकी पहचान इस गीत से की जा सकती है।कथा के अनुरूप शंकर जयकिशन जी ने संगीत देकर पूरी फिल्म को संगीतिय प्रकाश से भर दिया है।संगीत साधना में भटकते नायक ऐसे गीत मधुर धुनों में गाता है कि सुनने वाला उसी में खो जाता है।फिल्म के अंत में नायक अपनी जीभ काटकर भगवान् के चरणों में अर्पित कर देता है..
अब तो बुला ले चरणों में चरणों में….
शंकर जयकिशन जी ने इस फिल्म के माध्यम से साबित कर दिया की संगीत की हर विधा में वो संपूर्ण है।आलोचको के पास इस फिल्म के गीत संगीत को सुनने के बाद सांप सूंघ गया था और वो दबी जुबान से
स्वीकारने लगे और फिर कहने लगे शंकर जयकिशन जी अद्वितीय है।

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