Archive for July, 2017

युगंधर संगीतकार शंकरजयकिशन

Written by

Shyam Shankar Sharma 

संगीतिय चिकित्सक संगीतकार शंकरजयकिशन
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महान सिद्ध ओर योगी दत्रातेय बताते है कि पृथ्वी हमे धैर्य और क्षमा का ज्ञान देती है,वायु किसी का भी गुणदोष नही अपनाती,आकाश में समस्त विश्व ब्रह्मांड ,चर, अचर, स्थिर -अस्थिर पदार्थ है,जल स्वभाव से ही स्वच्छ, मधुर ओर पवित्र है,अग्नि तेजस्वी ओर ज्योतिर्मयी है,उसके तेज़ को कोई दबा नही सकता,चंदमा की गति तो नही जानी जा सकती किन्तु काल के प्रभाव से उसकी गति घटती व बढ़ती रहती है,सूर्य अपनी किरणों से संसार को प्रकाश तो देता ही है उसके साथ ही वह पृथ्वी का भी ध्यान रखता है।
युगंधर संगीतकार शंकरजयकिशन के संगीत में पृथ्वी,वायु,आकाश,जल,अग्नि,चंद्र और सूर्य के उक्त सभी गुण विद्यमान थे।
शंकरजयकिशन म्यूजिकल फाउंडेशन ,अहमदाबाद की स्थापना वर्ष 2012 में हुई,जिसका उद्देश्य शंकरजयकिशन के दैवीय संगीत का परिचय नवीन पीढ़ी ओर आने वाली पीढ़ी से कराना था जिससे यह पीढ़ियाँ वास्तविक संगीत की पहचान कर सके,इस क्रम में शंकरजयकिशन के 25 सफल और भव्य आयोजन क्रमशः अहमदाबाद, मुम्बई,वडोदरा,,जामनगर व राजकोट में आयोजित किये गए।
इस फाउंडेशन द्वारा शंकरजयकिशन रचित 501 क्लासिकल गीतों का चयन किया गया जो विभिन्न रागों पर आधारितं थे और उनकी एक बुकलेट जारी की गई।इस कार्य को सम्पन करने में सर्वश्री आर. बी.सेठ(वडोदरा,) माणिक भाई पांड्या(जामनगर) आनन्द देसाई(मुम्बई) और ऐडविन वाज़ उर्फ अप्पू (अहमदाबाद) ने बेहद मेंहनत कर 501 गीतों की सूचि तैयार की जो निम्न प्रकार है:-
राग अभोगी,अदाना, बागेश्वारी, बेरागी, बसंत बहार, बसंत मुखरी, भैरव,भैरवी,भीम पलासी,भूपाली,बिहाग, बिलावल,चारुकेशी, दरबारी,दरबारी कणाद, देश,धानी, दुर्गा,गारा, गवांड सारंग,गुर्जर तोड़ी,जयजयवंती, जोगिया,कली, कलावती,केदार,खमाज,किरवानी,मधुवंती,मालकोस,मारु विहाग, मारवा,मेघ मल्हार आदि।
शंकरजयकिशन ने उक्त रांगो पर असंख्य गीत निर्मित किये उनकी रागों के प्रति रुचि देखकर उनके प्रिय गीतकार हसरत जयपुरी जी और शैलेंद्रजी भी अपने गीतों में शब्दों का चयन तदनुरूप ही करते थे,यही कारण है कि इन चारों महान तपस्वी व्यक्तियों ने हिंदी फिल्म संगीत को वह गीत संगीत का उपहार दिया जिसे आज तक कोई भी स्पर्श भी नही कर पाया है?
भैरवी,शंकरजयकिशन का सर्वाधिक प्रिय राग था,उन्होंने कहा था
” कोई भी राग भैरवी राग को परास्त नहीं कर सकता,हमारा अनुभव है कि इस राग द्वारा विभिन्न प्रकार का संगीत संयोजन किया जा सकता है,यह ईश्वरीय प्रदत्त राग शंकरजयकिशन को ही उपहार में मिला था,इस राग ने हिंदी फिल्म संगीत की पहचान ही बदल दी,शंकरजयकिशन ने अपने संगीत में रागों का मधुरतम मिश्रण किया कि वह संगीतिय ओषधी बन गए,उनका कहना था संगीत वही तो मानव को स्वस्थ रखे उसे प्रसन्नता दे क्योकि प्रसन्नता में ही ईश्वर निवास करता है”।
भैरवी के अलावा मियां मल्हार,मिश्र पीलू,मिश्र कली, नायकी कनाड़ा, पहाड़ी,पीलू,बागेश्वरी,सारंग,शंकरा,शिवरंजनी,शुद्ध कल्याण,शुद्ध सारंग,तिलक कामोद,तिलंग,तोड़ी,विभास, यमन कल्याण,यमन बिलवाल,यमनी खमाज और झिंजोटी..शंकरजयकिशन के प्रिय राग थे।शंकरजयकिशन पर हिंदी सिनेमा के फ़िल्मी पंडित उनके संगीत को पश्चिमी प्रेमी मानते है?किन्तु शंकरजयकिशन का मानना था संगीत केवल संगीत है,यह अनंत है,इसे दिशाओं में समेटना उचित नही?हर देश और उसकी सभ्यता का अपना संगीत होता है!संगीत बहुरंगी होता है।जब उन्होंने बसंत बहार का संगीत रचा तो आलोचक दंग रह गए,बसंत बहार जैसा शास्त्रीय संगीत आज तक कोई भी संगीतकार निर्मित नही कर पाया और संभवतया कोई कर भी ना पायेगा?ओर जिन उपरोक्त रागों पर जिनियस संगीतकार ने असंख्य गीतों का निर्माण किया अपनी शुरू की 25 फिल्मो में निरंतर लतामंगेशकर से लगभग 100 के ऊपर गीत गंवाए उन्हें आप सीमित परिधि में नही बांध सकते?वह हरफलमौला थे,विश्ब संगीत की हर विधा पर उनकी गहरीं पकड़ थी।
जब लोग राम,कृष्ण की आलोचना करते नहीं चूकते तो भला वो शंकरजयकिशन को कैसे न कौसे?
विशिष्ठता के कई दुश्मन होते है!इसी कारण राम,कृष्ण और शंकरजयकिशन के असंख्य आलोचक है!
पर कौंओ के कांव कांव करने से गांव खाली नहीं होते है?यह बात शंकरजयकिशन विरोधियों को अपने मस्तिष्क में अंकित कर लेनी चाहिए।शंकरजयकिशन असाधारण संगीतकार थे अतः उनकी तुलना किसी भी संगीतकार से करना उचित नही!क्या सूर्य की तुलना किसी से की जा सकती है?नहीं वह स्वयं प्रकाश पुंज है,जगत कल्याण के लिए उत्पन्न हुआ है जैसे शंकरजयकिशन संगीत जगत में संगीत उत्थान के लिए जन्मे थे,उनका संगीत दैवीय था और इसी कारण वो चिकित्सीय भी था जिससे मनुष्य जाती की सेवा की जा सके।
स्मरण रहे संगीत के सात स्वरों में ईश्वर की आराधना होती है…..
सा.. द्वारा ब्रह्मा,रे…द्वारा अग्नि, गा.. द्वारा विष्णु, पा…द्वारा नारद,धा… द्वारा गणेश और नि..द्वारा सूर्योपासना की जाती है,इसी आराधना को शंकरजयकिशन साधना द्वारा आत्मसात कर चुके थे।संगीत की रांगो से आत्मसुख की अनुभति होती है।
प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर ऑलिवर स्मिथ का कहना है कि राग शिवरंजनी से स्मरण शक्ति बड़ाई जा सकती है,शंकरजयकिशन ने इस राग पर कई गीतों की रचना की है,इस राग मेआपटिज्म, मष्तिष्क विचार में लाभ व याददाश्त बढ़ती है।इसको सुनने का समय रात 10 बजे से 2 बजे तक का है,यही समय इस राग से लाभ पाने के लिए उत्तम माना गया है।शंकरजयकिशन के इस राग पर आधारितं कुछ गीत है:-
1,आजा रे अब मेरा दिल पुकारा(आह 1953)
2,आवाज देके हमे तुम बुलाओ( प्रोफेसर 1962)
3,चंद्रमा मदभरा क्यो झूमे है बादल में( पटरानी 1956)
4,क्या मार सकेगी मौत उसे( सन्यासी 1975) आदि आदि
भैरवी राग आनंद और शांति प्राप्त करने का अचूक नुक्सा है,यह गठिया,मांसपेशियों से सम्बंधित रोगों में लाभप्रद है।इसको पतझड़ के मौसम में सुनना लाभकारी है,अनिंद्रा के शिकार लोंगो के लिए यह एक रामबाण ओषधी है।शंकरजयकिशन के इस राग पर आधारितं कुछ गीत है..
1,आ अब लौट चले(जिस देश मे गंगा बहती हूं)
2,आजा सनम मधुर चांदनी में हम (चोरी चोरी)
3,अपने हुए पराये किस्मत ने क्या दिन दिखलाये( अपने हुए पराये) आदि आदि
केदार राग उन मरीजों के लिए है जो जुखाम, सिर दर्द व अस्थमा रोग से ग्रसित है।यह राग आधी रात को सुनना उचित है,इससे सकारात्मक सौंच उत्पन्न होती है।1970 में प्रदर्शित फ़िल्म ज्वाला का एक गीत ..जागे रात भर तेरी याद में बालम,ओ बालम …इसका बेहतरीन उदाहरण है।
खून की कमी हो तो राग पीलू सुनना फायदेमंद होता है,शंकरजयकिशन की इस राग पर आधारितं कुछ रचनाएँ है…
1,ऐ फूलों की रानी,बहारो की मलिका (आरजू ..1965)
2,बड़ी देर भई कब लोगे खबर मोरे राम( बसंत बहार..1956)
3,बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे ( एक फूल चार कांटे..1966)
4,मुरली बैरन भई ओ कन्हिया…( New Delhi…1956) आदि आदि
राग विहाग ..मनोरोग यानी डिप्रेशन में अत्यंत लाभकारी है।शंकरजयकिशन कि इस राग पर आधारित कुछ रचनाएँ है इस प्रकार है..
1,दुपट्टे की गिरह में बांध लीजिये (अपने हुए पराये)
2,इक बुत बनाऊंगा (असली नकली)
3,तुझे जीवन की डोर से ( असली नकली)
4,वो दिन याद करो ( हमराही) आदि आदि
शरीर यदि शक्तिहीन हो रहा हो तो राग जयवंती सुनना लाभप्रद है।उत्साह वर्धन के लिए थोड़ा तेज़ संगीत सुनना लाभदायक है,शंकरजयकिशन की इस राग पर आधारितं रचनाएँ है…
1,अंग से अंग लगा ले सांसो में है तूफान (ऐलान)
2,मारे गए गुलफाम अज़ी हाँ मारे गए गुलफाम (तीसरी कसम),
3,मन मोहना बड़े झूंठे..( सीमा)
4, सुनी सुनी सांस की सितार पर (लाल पत्थर) आदि आदि
राग दरबारी हृदय रोग में अत्यंत लाभकारी है,शंकरजयकिशन की इस राग पर आधारितं रचनाएँ इस प्रकार है…
1,आज कल में ढल गया दिन हुआ तमाम (बेटी बेटे)
2,बड़ी देर भई ( बसंत बाहर )
3,कहाँ जा रहा है (सीमा)
4,तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ( हरियाली ओर रास्ता)आदि आदि
विडम्बना यह रही कि संगीत को केवल मनोरंजन का साधन माना गया इसके आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना की गई, किन्तु शंकरजयकिशन ने अपने आरम्भ से ही इस अवधारणा को तोड़ने का सतत प्रयास किया और इस हेतु प्रयोग पर प्रयोग सतत अपनी साधना के बल पर किये और अपने संगीत को मेडिकल साइंस से जोड़ने की पूरी कोशिश की ओर कामयाब रहे,इसके लिए उन्होंने प्रकृति का सहारा लिया।लगभग 40 वर्ष पूर्व मैंने शंकरजयकिशन जी के शंकरजी का कथन अपने एक दिवंगत मित्र से सुना था,जिसमे शंकरजी बताते है कि सा.. की उत्पत्ति मोर के स्वर से,रे…की उत्पत्ति बैल ,गाय के स्वर से,ग..की उत्पत्ति बकरी भेड़ से,म…की उत्पत्ति क्रोंच नामक पक्षी के स्वर से,प…की उत्पत्ति कोयल के स्वर से,ध…की उत्पत्ति घोड़े के स्वर से ओर नि …की उत्पत्ति हाथी के स्वर से हुई है।अब आप अंदाजा लगा सकते है कि शंकरजयकिशन किस प्रकार प्रकृति और आध्यात्म में अपने संगीत को खोजते थे जिसकी कल्पना संगीतकार कर ही नही सकते?संगीत तो एक सागर है जिसकी एक बूंद में भी वही गुण है जो समुन्द्र की शेष जल राशी में है।शंकरजयकिशन को ज्ञान था अथवा जो उन्होंने अपने गुरुओं से प्राप्त किया था कि जीव जंतु ओर पक्षी तो एक ही स्वर में बोल सकते है किंतु मानव समस्त स्वरों में गा सकता है।शंकरजयकिशन ने इसी धारणा को अपनाया क्योकि वेदों में भी संगीत चिकित्सा का जिक्र है।
राब ई बर्टन नामक वैज्ञानिक 17 वी सदी की अपनी कृति “द ऐनासैमी ऑफ मेलकोली”में लिखा है कि संगीत और नृत्य मानसिक रोगों के उपचार में अतिं महत्वपूर्ण है।
विश्ब विख्यात भोतिकविद आइंस्टीन ने जब अपने अविष्कारों का दुरुपयोग परमाणु विभीषिका के रूप में देखा तो वह अत्यंत दुखी हो गए और अपने जीवन के अंतिम क्षणों में “वायलिन” का सहारा लेने लगे जो उन्हें सकून पहुँचाती थी।शंकरजयकिशन का तो प्रमुख हथियार ही वायलिन था और ग्रुप वायलिन में उनका संगीत निवास करता था।”टाइटैनिक”में संगीत देने वाले आस्कर विजेता संगीतकार जेम्स हार्नर का मानना है कि प्रेम से यदि हम दुनियाँ को देखें तो हम अलग नहीं साथ साथ होते है।वह कई बार संगीत सृजन करते वक्त रोने लगे जाते थे।वह लिखते है कि में कई बार दूसरे संगीतकारों से इसलिए अलग थलग पड़ जाता हूँ ..क्योकि संगीत मात्र मेरे लिए कर्म नहीं, एक कला है?
हिंदी फिल्म संगीत में शंकरजयकिशन की अवस्था बिल्कुल जेम्स हार्नर जैसी है क्योंकि यह भी कला के लिए जीते थे फिल्मो की संख्या बल के लिए नहीं?
शंकरजयकिशन को कोरस गीतों का शहंशाह माना जाता है,अपनी प्रथम फ़िल्म बरसात से ही उन्होंने इसका आगाज़ कर दिया था और यहाँ से लगातार आप उनकी फिल्मो पर दृष्टिपात करे तो एक,दो,अथवा तीन तीन कोरस उनकी फिल्मो में आपको मिल जाएंगे,इसके पीछे का रहस्य शायद शंकरजयकिशन जानते थे।
जब कई व्यक्ति समूह में गाते है तो उनके स्वर प्रवाह से उल्लास का वातावरण निर्मित होता है,जो समस्त सुनने वालों में स्फूर्ति ओर ऊर्जा का संचार करता है।इसी कारण सामूहिक आरती,सामूहिक लोकगीत,सामूहिक विवाह गीत,सामूहिक देश भक्ति गीत अपनी स्वर लाहरियों के कारण वातावरण में जो कंपन पैदा करते है तो उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक मनुष्य भक्ति,आनंद,उल्लास,जोश और प्रेम के सागर में डूब जाता है,अपने सारे दुखो को भूल तनाव मुक्त हो जाता है,इसी कारण शंकरजयकिशन ने प्रायः अपनी फिल्मो में कोरस गीतों को बेहद महत्व दिया क्योंकि यह मानव के कल्याण और स्वास्थ्य से संबंध रखते थे,इसीलिए तो उन्हें दिव्य संगीतकार कहा जाता है।
अजीब दास्ताँ है ये,दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर,जीना यहां मरना यहां,पंछी बनू उड़ती फिरूँ, तू प्यार का सागर है,तुम्हारे है तुमसे दया मांगते है,अब कहाँ जाय हम ये बता दे जमी इस जहां में कोई भी हमारा नही आदि आदि अनगिनत गीत।
प्रकृति में संगीत से बढ़कर मानव जाती के लिए दूसरा कोई वरदान नहीं, शंकरजयकिशन ने इसी को आधार मानकर संगीत की साधना कर अपूर्व सिद्धियाँ प्राप्त की ओर कहलाये युगंधर संगीतकार
शंकरजयकिशन
Shyam Shanker Sharma
Senior Scientific Officer(Ex.)
Forensic lab.JAIPUR
RAJASTHAN.

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Comments
Manohar Thadani
Manohar Thadani शानदार लेख , अपने आप मे एक अनूठा प्रयास ।

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Shyam Shankar Sharma replied · 1 Reply
Chirag Desai replied · 4 Replies
Sudarshan Pandey
Sudarshan Pandey वाह !!!!! अप्रतिम !!!!! क्या सुंदर लेख है. मन तृप्त हो गया. कल मैं इसे अपने ब्लॉग पर लेने वाला हूँ Shyam Shankar Sharma भाई. अभी मोबाइल पर यह सुविधा नहीँ है वरना अभी ही इसे ब्लॉग पर प्रकाशित कर देता.

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Shyam Shankar Sharma
Shyam Shankar Sharma आदरणीय सुदर्शन जी,इसे आप ब्लॉग पर ले रहे है,इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है।मेरा लक्ष्य सदा यह रहेगा कि में शंकरजयकिशन जी को सदा आध्यात्म से जोड़ूँ।उनके इतिहास,उत्थान पतन,आलोचनाओं,ओर उनके साथ किये गए विश्वासघात की कई बाद सदा प्रचुर मात्रा में मिलती है,किन्तु मेरा लक्ष्य उनके दिव्य स्वरूप को दर्शाना है,इसके लिए किसी नेट,सेलिब्रेटी,SJ से परिचित ओर संबंधित व्यक्तियों से इंटरव्यू लेने की आवश्यकता नही होती।आपको मेरा लेख अच्छा,असीम आभाऱ

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Sudarshan Pandey
Sudarshan Pandey Jee haan aap ne satya kahaa…………….
इसके लिए किसी नेट,सेलिब्रेटी,SJ से परिचित ओर संबंधित व्यक्तियों से इंटरव्यू लेने की आवश्यकता नही होती
Yah aawashyakata tabhi hoti hai jab tathyon ki pushti ki jaani rahti hai, yaa koi nayaa tathya maaloom karna padta hai apne Idols ke baare mein………………….
Regards

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Shankar Jaikishan : The most prolific users of many musical Western musical instruments

By

Rajan Narayan

 

Shankar Jaikishan who have literally no formal education in Indian or Western Classical music, ended up becoming the most prolific users of many musical Western musical instruments which widened their repertoire of orchestra and synergy of sounds a great fusion of Western and Indian music which was the biggest innovation for Indian listeners, mostly the lowest common listener in the deepest location of India.

They may not be the first composers to introduce many innovations, but they were definitely the most popular innovators which was appreciated by the common listener and viewer, who was their biggest target audience.

Here is a great song by Talat who was till then known as a Gazal singer and one who excelled in pathos numbers, singing an fast number full of sentimental pain, but with loads of energy..and accordion was used so prominently in this song..

This was sustainable innovation..which made them better than the best..

Hope you like it..

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