Archive for March, 2018

Three new photos of Shailendra

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Shailendra Holi

Shailendra with Sudesh Kumar, OP Rehlan, Shankar & others celebrating Holi

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शंकर जयकिशन के संगीत का आज भी नहीं है मुकाबला

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भारतीय फिल्मों में जब भी सुकून और ताजगी का अहसास देने वाले मधुर संगीत की चर्चा होती है। संगीतकार जयकिशन और उनके साथी शंकर की बरबस ही याद आ जाती है। वह पहली संगीतकार जोडी थी, जिसने लगभग दो दशक तक संगीत जगत पर (बादशा) की हैसियत से राज किया और हिन्दी फिल्म संगीत को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता दिलाने का काम किया।

स्वर साम्रागी लता मंगेशकर आज जिस मुकाम पर हैं । वहां तक उनके पहुंचने में इस जोडी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। लता मंगेशकर के कैरियर को बुलंदी पर पहुंचाने में दो फिल्मों, महल और बरसात  की अहम भूमिका रही। दोनों ही फिल्में 1949 में प्रदर्शित हुई थीं। पहली फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने दिया था और दूसरी फिल्म के संगीतकार जयकिशन और शंकर थे। यही वह फिल्म थी,जिससे उनके साथ गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी तथा अभिनेत्री निम्मी ने भी अपने कैरियर का आगाज किया था।
इस फिल्म में शंकर. जयकिशन ने गीतों की एक से बढकर एक ऐसी सरस और कर्णप्रिय धुनें बनाई थीं कि यह फिल्म गीत और संगीत की दृष्टि से बालीवुड के इतिहास में”मील का पत्थर” मानी जाती है। मेरी आंखों में बस गया कोई रे, जिया बेकरार है छाई बहार है, मुझे किसी से प्यार हो गया, हवा में उडता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का, अब मेरा कौन सहारा, बरसात में हमसे मिले तुम सजन, तुमसे मिले हम, बिछड गई मैं घायल हिरनी, बन बन ढूंढूं,. जैसे गीतों की ताजगी आज भी कम नहीं हुई है।

लता मंगेशकर बडी विनम्रता से अपने कैरियर में मौलिक प्रतिभा की धनी इस संगीतकार जोडी के योगदान को स्वीकार करती हैं। जब भी शंकर.जयकिशन का उनके सामने जिक्र होता है. वह कहना नहीं भूलतीं. मेरा मानना है कि कोई भी शंकर.जयकिशन के संगीत की बराबरी नहीं कर सकता। उन्होंने शास्त्रीय, कैबरे, नृत्य, प्रेम तथा दुख और खुशी के नगमों के लिए स्वर रचनाएं की। कुछ ही संगीतकार हैं, जो उनकी रेंज का मुकाबला कर सकते हैं। उनके संगीत ने कई फिल्मों को जिन्दगी दी.अन्यथा वे भुला दी जातीं।

जयकिशन का पूरा नाम जयकिशन दयाभाई पांचाल था। उनका जन्म 4 नवम्बर 1929 को गुजरात के वंसाडा में हुआ था। खूबसूरत शख्सियत के मालिक जयकिशन हालांकि हारमोनियम बजाने में निपुण थे और उन्होंने संगीत विशारद वाडीलालजी, प्रेम शंकर नायक और विनायक तांबे से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली थी लेकिन वह अभिनेता बनने की तमन्ना रखते थे।

 अपने इस सपने को पूरा करने के लिए 19 वर्षीय जयकिशन ने बम्बई का रुख किया और संघर्ष के दिनों में मध्य बम्बई की एक फैक्ट्री में टाइमकीपर, समयपाल की नौकरी करने लगे। उसी दौरान सांताक्रूज में एक प्रसिद्ध निर्माता से मिलने के लिए उसके दफ्तर के बाहर इंतजार करते समय उनकी मुलाकात शंकर से हुई, जो उस समय राजकपूर के पिता प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर में तबला बजाने का काम करते थे और मौका मिलने पर कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएं भी कर लेते थे।

 शंकर ने जयकिशन को भी पृथ्वी थिएटर्स में काम करने का सुझव दिया और उन्हें वहां हारमोनियम वादक की नौकरी दिला दी। राजकपूर ने 1948 में जब अपनी पहली फिल्म”आग” का निर्माण शुरु किया तो दोनों ही फिल्म के संगीतकार राम गांगुली के सहायक बन गए और उनकी संगीत रचना में अप्रकट सहायता की। राजकपूर के एक करीबी रिश्तेदार विश्व मेहरा यह सब देख रहे थे। संयोग की बात है कि उसी समय राजकपूर और संगीतकार राम गांगुली के बीच कुछ गंभीर मतभेद हो गए। राजकपूर को अपनी अगली फिल्म”बरसात” के लिए नए संगीतकार की तलाश थी. उस स्थिति में विश्व मेहरा ने शंकर. जयकिशन को संगीतकार बनाने का सुझव जब उनके सामने रखा तो उन्होंने राम गांगुली को फिल्म में लेने का विचार छोड दिया और उन्हें संगीतकार के रूप में मौका देने का फैसला कर लिया। उसके बाद जो हुआ. वह हिन्दी फिल्मों के स्वर्ण युग के इतिहास का एक सुनहरा अध्याय है।

 बरसात के निर्माण के समय की एक घटना बडी दिलचस्प है। लता मंगेशकर ने इस घटना का जिक्र कई मौकों पर किया है। राजकपूर ने जयकिशन को लता मंगेशकर के पास भेजा कि वह फिल्म के गीतों की रिकार्डिंग के लिए उन्हें अपने साथ चेम्बूर स्टूडियो में ले आएं। उस समय लता मंगेशकर ताडदेव में एक कमरे के मकान में रहती थीं. जो चेम्बूर से लगभग 27 किलोमीटर दूर था। जयकिशन ने लता मंगेशकर के घर का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलने पर उन्होंने अपने सामने एक गोरे-चिट्टे खूबसूरत युवक को खड़ा देखा। वह पहली बार जयकिशन को देख रही थीं, इसलिए उन्हें पहचान नहीं सकीं।

 जयकिशन ने लता मंगेशकर से कहा कि राजकपूर ने उन्हें चेम्बूर में पृथ्वी थिएटर्स में रिकार्डिंग के लिए बुलाया है लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वही फिल्म के संगीत निर्देशक हैं। लता मंगेशकर ने सोचा कि वह राजकपूर के कोई रिश्तेदार या संदेशवाहक होंगे। वह सोचने लगीं कि राजकपूर अपने जो संदेशवाहक भेजते हैं, वे भी उन्हीं की तरह सुंदर होते हैं।

टैक्सी से लता मंगेशकर को साथ लेकर पृथ्वी थिएटर्स पहुंचते ही जयकिशन ने अपना हारमोनियम निकाला और उनके सामने बैठकर उनके लिए बनाई गई धुन के बारे में बताना शुरु कर दिया। लता बताती हैं कि वह यह जानकर हैरान रह गईं कि 19 साल का वह युवक न तो संदेशवाहक था और न ही राजकपूर का कोई रिश्तेदार था बल्कि बरसात के कुछ गीतों का संगीतकार था।

“बरसात” सुपरहिट रही और उसने लता मंगेशकर को हिन्दी फिल्म संगीत की निर्विवाद साम्राग्ई के रूप में स्थापित कर दिया। इस फिल्म को हिन्दी सिनेमा में दो उपलब्धियों का श्रेय जाता है। यह पहली फिल्म थी. जिसके लिए पहली बार .टाइटल गीत. बरसात में तुमसे मिले हमसे मिले हम सजन हमसे मिले तुम. और एक .कैबरे गीत. पतली कमर है तिरछी नजर है, लिखा गया।

 इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी के साथ ही शंकर. जयकिशन की गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी. तथा गायक मुकेश और गायिका लता मंगेशकर के साथ फिल्म इतिहास की एक सर्वाधिक सफल टीम बन गई. जो लगभग अगले दो दशक तक दर्शकों और श्रोताओं के दिलों पर राज करती रही। बाद में मोहम्मद रफी भी इस टीम में शामिल हो गए थे।

“बरसात” कामयाबी के बाद जयकिशन और शंकर की जोड़ी ने फिर पलट कर नहीं देखा और हिट फिल्मों की झडी सी लगा दी। फिल्म में उनके संगीत का होना सफलता की गारंटी मानी जाने लगी । आवारा, आह, श्री 420, हलाकू,पतिता,कठपुतली, अनाडी, चोरी.चोरी, दाग, बादशाह, बूट पालिश और उजाला उनके स्वर्णिम दौर की कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं। आवारा और श्री 420 से उनकी ख्याति देश की सीमाओं को भी पार कर गई। आवारा का. आवारा हूं या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं. और श्री 420 का,मेरा जूता है जापानी, सोवियत संघ. चीन और पूर्वी यूरोपीय देशों के भी गीत बन गए।

“आवारा” में पहली बार एक “स्वप्न दृश्य” का फिल्मांकन किया गया। इस दृश्य के लिए लिखे गए गीत, तेरे बिना आग ए चांदनी और उसकी की कडी में, घर आया मेरा परदेशी, के लिए इतनी खूबसूरत धुन बनाईं कि आज भी इस गीत की मिठास का कोई मुकाबला नहीं है।

जयकिशन और शंकर ने मुकेश,लता,मोहम्मद रफी के अलावा मन्ना डे की प्रतिभा का भी भरपूर इस्तेमाल किया और तलत महमूद, गीता दत्त, शारदा, किशोर कुमार, भूपेन्द्र, आशा भोंसले, मुबारक बेगम, शमशाद बेगम, दिलराज कौर, आरती मुखर्जी, चंद्राणी मुखर्जी और सुबीर सेन जैसे गायक, गायिकाओं को भी अपने गीत गाने का मौका दिया। एक दिलचस्प तथ्य है कि अपना प्रिय गायक होने के बावजूद उन्होंने मुकेश से 134 गाने ही गवाए जबकि मोहम्मद रफी को उन्होंने 363 गानों में स्वर देने का अवसर दिया।

 गायिकाओं में जयकिशन और शंकर की जोडी की प्रिय गायिका लता मंगेशकर रहीं. जिनसे उन्होंने 466 गाने गवाए। हालांकि यह भी तथ्य है कि लता मंगेशकर ने एक-दो मौकों पर गीत में सस्तेपन को लेकर उनके लिए गाने से मना कर दिया था। बूट पालिश एक गीत “मैं बहारों की नटखट रानी” जिसमें शुरु में बहारों की जगह (बाजारों) शब्द था, को उन्होंने गाने से इन्कार कर दिया था। बाद में उन्हें मनाने के लिए गीत में बाजारों की जगह बहारों का इस्तेमाल किया लेकिन लता को नहीं मानना था, सो वह नहीं मानीं।

 इसी तरह की एक और घटना है। राजकपूर की फिल्म (संगम) में एक गाने, मैं क्या करूं राम मुजे बुड्ढा मिल गया, को वह लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे लेकिन जयकिशन और शंकर पहले की घटना से आशंकित थे कि लता इस गाने को कभी नहीं गाएंगी। उधर राजकपूर फिल्म को पूरी करने के लिए जल्दी से जल्दी इस गाने को गवाने पर जोर डाल रहे थे। शंकर जयकिशन को एक उपाय सूझ। उन्होंने सोचा कि लता से यह गाना उसी स्थिति में गवाया जा सकता है जब उन्हें गीत के अर्थ को समझने का मौका ही नहीं दिया जाए।

उन्होंने लता मंगेशकर से कहा कि एक गीत की जल्दी रिकार्डिंग करनी है और उनके पास ज्यादा समय नहीं है। वह तुरन्त गाने की रिकार्डिंग के लिए आ जाएं। लता को अफरातफरी में वहां पहुंचना पडा। दोनों पहले से ही तैयार बैठे थे, जैसे ही लता आईं, उन्होंने कोई मौका दिए बगैर उनसे रिकार्डिंग करा ली। इस तरह यह गीत लता की आवाज में लोगों के सामने आया।

एक वक्त ऐसा भी आया था, जब जयकिशन को अपने अजीज दोस्त शंकर की जुदाई का गम में सहना पडा था और उसी सदमे ने उनकी जान भी ले ली। दोनों के बीच करार हुआ था कि वे कभी सार्वजनिक नहीं करेंगे कि धुन किसकी बनाई हुई है लेकिन जयकिशन ने फिल्मफेयर के एक हस्ताक्षरित लेख में बता दिया कि संगम के गीत” ए मेरा प्रेमपत्र पढकर कि तुम नाराज न होना” की धुन उन्होंने बनाई थी। शंकर ने इसे अलिखित समझोते का उल्लंघन माना। स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब शंकर ने लता के स्थान पर नई गायिका शारदा को गाने का मौका देना शुरु कर दिया। इससे दोनों के बीच दूरियां बढती चली गई। बाद में मोहम्मद रफी ने दोनों के बीच मतभेदों को दूर करने में मदद की लेकिन तब तक जयकिशन का दिल टूट चुका था और वह इसी गम में 12 सितम्बर 1971 को सिधार गए। (This is not real cause, which was a rumour. We disagree that Sharda was the reason – blogger)

शंकर जयकिशन ने हिन्दी फिल्म संगीत में जो मुकाम हासिल किया। उस तक आज भी कोई संगीतकार नहीं पहुंच सका है। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम युग में एकछत्र राज किया, जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कहा जाता है कि पचास के दशक में वह पहले संगीतकार थे. जो अपनी एक फिल्म के लिए एक लाख रुपया लेते थे और रामानन्द सागर की फिल्म.आरजू. 1965.के लिए उन्होंने दस लाख रुपए की भारी भरकम राशि ली थी। एक बार उन्हें उस दौर के सबसे ज्यादा कमाई करने वाले अभिनेता से भी ज्यादा मेहनताना दिया गया था।
जयकिशन और शंकर की जोडी ने लगभग 170 से भी ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया। उनकी कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं (बादल.1951), (नगीना.1951), (पूनम.1952), (शिकस्त.1953), (सीमा.1955), (बसंत बहार.1956), (चोरी-चोरी.1956), (नई दिल्ली.1956), (राजहठ.1956),(कठपुतली.1957), (यहूदी.1958), (अनाडी.1959), (छोटी बहन.1959),(कन्हैया.1959), (लव मैरिज.1959), (दिल अपना और प्रीत पराई.1960), (जिस देश में गंगा बहती है.1960),(जब प्यार किसी से होता है.1961),(जंगली.1961), (ससुराल.1961), (असली नकली.1962), (प्रोफसर.1962), (दिल एक मंदिर.1963), (हमराही.1963) (राजकुमार.1964), (आम्रपाली.1966), (सूरज.1966), (तीसरी कसम.1966), (ब्रह्मचारी.1968), (कन्यादान.1968) (,शिकार.1968),(मेरा नाम जोकर.1970),( अंदाज.1971), (लाल पत्थर.1971),(संन्यासी.1973)।

जयकिशन और शंकर को (चोरी.चोरी.1956), (अनाडी.1959), (दिल अपना और प्रीत पराई.1960), (प्रोफेसर.1963), (सूरज.1966), (ब्रह्मचारी.1966),( मेरा नाम जोकर.1970), (पहचान.1971) और (बेईमान.1972) के लिए नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। अंतिम तीन पुरस्कार तो उन्हें लगातार तीन वर्ष तक मिले।

 

Courtesy :

https://www.livehindustan.com/news//article1-story-71657.html

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