Nobody has even come within miles of Shanker…

by

 

Dinesh Shankar Shailendra

Shankar Singh

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Jaikishan, Shailendra & Shankar

(15 October 1922 – 26 April 1987)

I know, I am a day late in posting for this great man, but, in 1987, we also got the news a day later…

As I was growing up, I developed an interest in palmistry for a brief period of my life… It was a known ‘fact’ in Palmistry, that if one had long, slender fingers with shapely nails, one was creative and artistic… When I looked at my own hands, I saw that I fit the description to perfection ! 
When people complimented me on my fingers, I would blush …. ( With my skin colour, I turn maroon when I blush )

One day, I don’t really remember why, but I was at Famous Mahalaxmi Studios and went into Shanker Jaikishen’s music room… He was talking about his memories of my father and he had his harmonium in front of him… Suddenly, he started playing the introduction music of this song from ‘Barsaat’ and played the whole song, humming along…

IT WAS PURE MAGIC !!!

Then I noticed his fingers… short, stubby fingers !

In all these years, so many Music Directors have come and gone…

Nobody has even come within miles of Shanker…

HE WAS A GENIUS…

P.S. I stopped believing in Palmistry … 😀

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हमारी याद आएगीः और देश भर में गूंजने लगा शंकर का गुनगुनाना

‘बरसात’ (1949) रिलीज हुई तो इसके संगीत ने देश भर में धूम मचा दी और सिनेमा- संगीत को एक नया मोड़ मिला। ‘बरसात’ में आठ लोगों की मेहनत थी और उनमें से कोई भी उम्र के 30 वें पायदान तक नहीं पहुंचा था। इनमें से हसरत और शंकर की उम्र सबसे ज्यादा 27-27 साल थी और सबसे कम उम्र थी निम्मी (16 साल) की। जयकिशन (20), लता मंगेशकर (20), मुकेश (26), शैलेंद्र (26), राज कपूर (25), नरगिस (20), की एक टीम बन गई। शंकर-जयकिशन तो आरके की फिल्मों का अभिन्न हिस्सा बन गए थे। इस जोड़ी के संगीतकार शंकर की गुरुवार को 31वीं पुण्यतिथि थी।

शंकर (जयकिशन), 15 अक्तूबर, 1922-26 अप्रैल, 1987

वाकया 1948-49 का है। पृथ्वीराज कपूर के थियेटर में एक तबलावादक अक्सर एक बंदिश गुनगुनाता था, ‘अमुआ का पेड़ है वो ही मुंडेर है, आजा मेरे बालमा अब काहे की देर है…’ यह तबलावादक हैदराबाद से पांचेक साल पहले मुंबई आया था। वह तबले में माहिर था। उसे उम्मीद थी कि यह शहर उसके फन की कदर करेगा। संयोग से उसे पृथ्वीराज कपूर के थियेटर में काम मिल गया था, जहां उसके कुछेक दोस्त भी बन गए थे। इनमें से तबलावादक चंद्रकांत भोसले और गुजरात का हारमोनियम बजाने वाला जयकिशन भी था। इसी बीच पृथ्वीराज कपूर के अभिनेता बेटे ने पहली फिल्म ‘आग’ (1948) शुरू की और उसका संगीत राम गांगुली को सौंपा, जिनके शंकर-जयकिशन सहायक बन गए।

‘आग’ बनने के दौरान प्रशिक्षित गायक रह चुके राज कपूर ने कई दफा शंकर के मुंह से ‘अमुआ का पेड़ है वही मुंडेर है..’ बंदिश सुनी थी। ‘आग’ के बाद राज कपूर बरसात बनाने लगे और उसके संगीत की जिम्मेदारी राम गांगुली को ही सौंप दी। इसके एक गाने की रिकॉर्डिंग को लेकर राम गांगुली और राज कपूर में टकराव हो गया। नतीजा, राज कपूर ने ‘बरसात’ के संगीत की जिम्मेदारी राम गांगुली के बजाय शंकर को सौंप दी। शंकर ने कहा इस काम के लिए अगर जयकिशन को भी उनके साथ कर दिया जाए तो बेहतर होगा। इस तरह से 1949 की ‘बरसात’ में पहली बार शंकर-जयकिशन की जोड़ी बनी।

शंकर जब संगीत देने लगे तो राज कपूर के दिमाग में उनकी सुनाई बंदिश ‘अमुआ का पेड़ है…’ गूंज गई। उन्होंने इसे फिल्म में इस्तेमाल करना तय किया और 11 रुपए महीने में मुंबई में छह सालों तक बेस्ट की बसों में कंडक्टरी कर चुके हसरत जयपुरी को इस पर गाना लिखने के लिए लगा दिया। गाने का मुखड़ा दरअसल शंकर की सुनाई गई बंदिश पर आधारित था, जिसमें जयपुरी ने थोड़ा हेरफेर कर दिया था। जयपुरी के गाने का मुखड़ा था ‘जिया बेकरार है छाई बहार है, आजा मेरे बालमा तेरा इंतजार है…’ यह हसरत जयपुरी का रिकॉर्ड हुआ पहला गाना था, जो खूब बजा। इसके साथ ही ‘बरसात’ के सभी गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए।

‘बरसात’ की सफलता ने शंकर-जयकिशन की जोड़ी को ऐसा जमाया कि 20 सालों तक कोई हिला नहीं सका। उनकी ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘बसंत बहार’, ‘अनाड़ी’, ‘चोरी चोरी’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘दाग’, ‘यहूदी’ जैसी फिल्में सफलता के झंडे गाड़ती चली गई। फिल्म इंडस्ट्री में इस जोड़ी की तूती बोल रही थी और उनका नाम फिल्म की सफलता की गांरटी बन गया था। फाइनेंसर उनके नाम से थैली खोल रहे थे। सफलता ऐसी पतंग होती है जिसे जमीन पर आना ही होता है, यह नियति है। लिहाजा इस जोड़ी में 1966 की ‘सूरज’ के बाद दरार आई और दोनों अलग हो गए। नई गायिका शारदा (‘तितली उड़ी’ गाने से मशहूर) को शंकर द्वारा आगे बढ़ाना इसकी वजह बताया गया। 1971 में जयकिशन और 1973 में शैलेंद्र की मौत के बाद शंकर अकेले दम पर कामयाबी कायम नहीं रख सके। उनके अख्खड़ व्यवहार के चलते निर्माता उनसे दूर होते चले गए। आरके कैम्प में उनकी जगह ‘बॉबी’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आ गए। 26 अप्रैल 1987 को शंकर ने भी यह दुनिया छोड़ दी। बड़ी ही खामोशी से। शंकर के परिवार ने उनके निधन की सूचना राज कपूर तक को नहीं दी। लिहाजा करीबियों को भी उनके निधन की सूचना अगले दिन अखबारों से मिली थी।

Courtesy : Jansatta  link

https://www.jansatta.com/entertainment/story-of-shankar-jaikishan-on-his-death-anniversary/642605/

शंकर, बिन जयकिशन

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आलेख

 
शशांक दुबे

आज दो फूलों की खुशबू से महक उठा चमन
गुनगुनाती हैं फिज़ाएं रक्स करती है पवन
है कली कली के लब पे नगमा है मुबारकबाद का
बन गए भारत में पद्मश्री शंकर-जयकिशन
(महान संगीतकार नौशाद द्वारा शंकर-जयकिशन को 1967 में पद्मश्री प्रदान किए जाने के अवसर पर दी गई काव्यमय बधाई)
जगहः मुंबई का मैरिन ड्राइव, समयः रात के ग्यारह बजे. सामने ठाठे मारता समुद्र, फिज़ा में ठंडी-ठंडी हवा, पसरने को आतुर सन्नाटा और उसे चुनौती देती कार की हेडलाइटों से निकलती रोशनी. वक्त की रफ़्तार के थम जाने की कामना करते हुए आप इस `नवलखे हार’ के सौंदर्य को निहारते-निहारते कान में इयर फोन डालकर गाना सुनते हैं, “रात के हमसफ़र थक के घर को चले” . गाने में ही सही, घर का नाम सुनते ही आप थकने लगते हैं. मुंबई में घर वहाँ नहीं होते, जहाँ मुंबई होती है, मुंबई में घर वहाँ होते हैं, जहाँ से मुंबई नब्बे मिनट दूर होती है. चलना तो होगा ही. बड़े बेमन से आप उठते हैं. निकलने से पहले यहीं एक फर्लांग दूर सम्राट रेस्टोरेंट के नीचे आप पान खाते हैं, ऐसा पान जिसके पत्ते का ही स्वाद आपको खुशदम कर देता है. मुंबई की इस आपाधापी में भी खुशी के इतने अच्छे पल मुहैया कराने के लिए कुदरत के प्रति शुक्रगुज़ार होने के वास्ते जैसे ही आप गर्दन ऊपर उठाते हैं सामने म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा लगाई गई `शंकर-जयकिशन चौक’ नामक तख्ती देखकर चौंक पड़ते हैं. अरे! यह क्या? सड़क का नाम और वह भी संगीतकार के नाम पर? भई अपने यहाँ तो हर सड़क महात्मा गाँधी, हर पुलिया जवाहरलाल नेहरु, हर वाचनालय विवेकानंद और हर चौराहा दिवंगत पार्षद या रसूखदार जीवित पार्षद के दिवंगत पिता के नाम पर रखने की परंपरा है. अब शंकर-जयकिशन नामक यह चौकोण के पंच व षटकोण कहाँ से चले आये?

इसलिए क्योंकि यह मुंबई है. सरहानपुर या शुजालपुर या संबलपुर नहीं. यहाँ नेताओं ही नहीं कलाकारों, साहित्यकारों और संत-महात्माओं के नाम पर भी मार्ग या चौराहे बनते हैं. फिर शंकर-जयकिशन तो इसके हकदार भी हैं. भारतीय फ़िल्म जगत के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ संगीतकार. ऐसे संगीतकार जिन्होंने फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम दशक (1956 से 1966 तक) में श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी, दिल अपना और प्रीत पराई, दिल एक मंदिर, जंगली, प्रोफेसर, सीमा, ससुराल, हमराही, आई मिलन की बेला, जब प्यार किसी से होता है, दिल तेरा दीवाना, यहूदी, तीसरी कसम जैसी कई महान (और मामूली भी) फ़िल्मों में अद्भुत संगीत की छटा बिखेरी. फ़िल्म चाहे छोटी हो या बड़ी, शंकर-जयकिशन का नाम जुड़ते ही वह अपने-आप बड़ी हो जाती थी. उनका पारिश्रमिक फ़िल्म के नायक के मेहनताने से एक रुपया अधिक होता था और मेहनत उससे कम से कम दस गुनी. उनकी धुनें कर्णप्रिय तो होती ही थीं, उन्हें प्रभावी बनाने के लिए उनका विशिष्ट आर्केस्ट्रा भी होता था, जिसके अंतर्गत अलग-अलग वाद्यों के पारंगत 60 वादक एक साथ मिलकर संगीतकार की कल्पना को साकार (या सावाज़) किया करते थे. शंकर-जयकिशन को दो जिस्म एक जान इसलिए कहा जाता था कि वे भले ही गीतों की धुन अलग-अलग रचते थे (प्रायः शैलेंद्र के गीत की धुन शंकर बनाते व हसरत जयपुरी के गीतों की धुन जयकिशन बनाते, लेकिन प्रायः, सदैव नहीं), लेकिन रेकॉर्डिंग दोनों ही साथ मिलकर करते थे, अपने उन्हीं प्रतिभाशाली 60 वादकों के ग्रुप के साथ.

अपने तमाम समकालीनों और उत्तरकालीनों के मुकाबले शंकर-जयकिशन के संगीत की सबसे बड़ी खूबी उसमें छिपा आह्लाद था. आम तौर पर दुःख के गीतों की धुन हमारे संगीतकार इस प्रकार बनाते हैं कि सुनते ही श्रोता अफसुर्दगी में चला जाए. ऐसा माना जाता है कि जितनी धुन में मनहूसियत होगी, गीत उतना ही अधिक दमदार बनेगा. उदाहरण के लिए “तुझको पुकारे मेरा प्यार” (फ़िल्मः नीलकमल, संगीतकारः रवि), “ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया” (फ़िल्मः प्यासा, संगीतकारः एस.डी.बर्मन), “तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोए” (फ़िल्मः शिनशिनाकी बुबलाबू, संगीतकारः सी. रामचंद्र), “टूटे हुए ख्वाबों ने हमको ये सिखाया है” (फ़िल्मः मधुमति, संगीतकारः सलील चौधरी). लेकिन शंकर-जयकिशन की कंपोज़िशन में एक ऐसा जादू था कि दुःखभरे गीत भी फिज़ाओं में मनहूसियत के बदले आह्लाद फैलाते थे. “लाखों तारे आसमान में एक मगर ढूँढे ना मिला, देख के दुनिया की दीवाली दिल मेरा चुपचाप जला” (हरियाली और रास्ता) ,”आ आ भी जा, रात ढलने लगी चांद छुपने चला” (तीसरी कसम), “ये शाम की तन्हाइयाँ, ऐसे में तेरा ग़म” (आह), “अजीब दास्तां है ये कहाँ शुरू कहाँ खतम” (दिल अपना और प्रीत पराई).

उनकी दूसरी विशेषता थी, गाने की शुरूआत में इतना अद्भुत टुकड़ा बजाना कि ताड़नेवाला आग़ाज़ पर कान धरते ही अंज़ाम की भविष्यवाणी कर दे. “मेरे मन की गंगा” (संगम) की शुरुआत में बजने वाली मशक, “आवारा हूँ” (आवारा) में बजने वाला अकॉर्डियन, “मुझे कितना प्यार है तुमसे” (दिल तेरा दीवाना) से पहले बजने वाली वायलिन की लहर के तत्काल बाद सिंगल मैंडोलिन का टुकड़ा और “पंछी बनी उड़ती फिरूँ” (चोरी चोरी) में बजने वाली समवेत बाँसुरी, ये वे प्रयोग थे, जिनके चलते संगीत सुनते ही गाना ताड़ने वाली एक पीढ़ी तैयार की. शंकर-जयकिशन के इसी हुनर से प्रभावित होकर कभी महान गायिका लता मंगेशकर ने कहा था कि ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनमें यदि उनका संगीत न होता, तो वे कभी की भूला दी गई होतीं. उनके संगीत की तीसरी विशेषता फ़िल्म के संभावित सबसे बड़े हिट गीत को केंद्र में रखते हुए ज़बरदस्त टाइटल संगीत तैयार करना. साढ़े तीन मिनट के उस संगीत में शेष गीतों के छोटे-छोटे टुकड़े भी समाविष्ट कर दिए जाते और एक ऐसा पैकेज तैयार होता कि टाइटल संगीत सुनते ही लोग झनझना उठते. `राजकुमार’ में उनके द्वारा तैयार किया गया टाइटल संगीत इतना लोकप्रिय हुआ कि बरसों बाद रेडियो सिलोन के लोकप्रिय कार्यक्रम `एस कुमार्स का फ़िल्मी मुकद्दमा’ के थीम संगीत के रूप में यही टाइटल संगीत बजाया गया था.

उनकी चौथी खूबी थी अद्भुत बैक ग्राउंड म्युज़िक, जिसे तैयार करने का तरीका भी उनका अपना था. वे हर दृश्य के लिए अलग-अलग पार्श्व संगीत तैयार करते. इसके लिए सबसे पहले तो वे फिल्म के उस दृश्य को देखते हुए उसका हिसाब अँगुली की पोरों पर रखते जाते. फिर जितनी पोरों में दृश्य खत्म होता, उतनी ही पोरों के लिए एक टुकड़े की रचना करते और बाद में उस टुकड़े को पूरे दृश्य पर चस्पा कर देते. क्या मज़ाल कि एक फ्रेम भी इधर की उधर हो जाए! `जब प्यार किसी से होता है’ में देव आनंद जब डायरी तलाशने के लिए निकलते हैं और अलमारी खोलते हैं तो जब तक डायरी नहीं गिरती संगीत सधा हुआ चलता है, लेकिन जैसे ही अलमारी से डायरी गिरती है, झन्न की आवाज़ के साथ वह टुकड़ा समाप्त हो जाता है. यदि `संगम’ फिल्म को फिर से देखने का मौका हाथ लगे, तो “ये मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ न होना” गीत के दस मिनिट पहले से ही अपने कान खड़े कर लीजिएगा. गीत से पहले पार्श्व संगीत के जरिए उन्होंने जो रूमानी माहौल तैयार किया है, वह अद्भुत है. कमोबेश ऐसा ही करिश्मा वे `राजकुमार’ में साधना-शम्मी कपूर के जंगल में झरने के आसपास भटकने वाले दृश्य में भी रचते हैं.

परिवर्तन हमेशा अच्छे के लिए नहीं होता. 1966 में सिंथेसाइज़र का आगमन हुआ और संगीतकार कई वाद्यों का काम इसी से निकालने लगे. इतना भारी भरकम ऑर्केस्ट्रा अब निर्माताओं को महँगा सौदा लगने लगा. हालांकि अपने धाकड़ स्वभाव की वजह से जयकिशन निर्माताओं पर दबाव डालकर ऑर्केस्ट्रा रखवा ही लेते थे, इसलिए 1967 से 1970 तक के दौर में भी ‘कन्यादान’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘पहचान’, ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘शिकार’ जैसी कई फ़िल्मों में वे हिट संगीत दे सके. लेकिन 1971 में उनके निधन के बाद स्वभाव से अंतर्मुखी शंकर अकेले पड़ गए. मार्केटिंग से दूर रहकर सारा जीवन धुनें बनाने व उनकी प्रस्तुति देने में लगा देने वाले शंकर की पैरवी करने वाला कोई न रहा और प्रतिद्वंद्वियों ने ख़बरें उड़ानी शुरू कर दीं कि शंकर-जयकिशन में जो मलाई थी वह जयकिशन थे, अब तो सप्रेटा बचा है. जबकि दुनिया जानती थी कि शैलेंद्र के गीतों की धुन शंकर तैयार करते रहे और हसरत की धुनें जयकिशन. इन मिसाइलों से निरपेक्ष शंकर हर गीत की रेकॉर्डिंग से पहले जयकिशन की तस्वीर को माला पहना कर और पारिश्रमिक का आधा हिस्सा पल्लवी जयकिशन के सुपुर्द कर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते रहे, लेकिन तंगदिल निर्माताओं ने ऑर्केस्ट्रा के नाम पर हाथ खड़े कर दिए. अब बत्तीस तरह की तरकारी और तैंतीस तरह के व्यंजन के साथ लंच लेने वाले व्यक्ति को सत्तू के साथ श्रावणी करनी पड़े और फिर कोई उससे पूछे कि दावत कैसी रही, तो ग़रीब क्या बोले? नतीजा ! एक साल में अठारह फ़िल्में और और सभी की सभी (तुम हसीं मैं जवां, प्रीतम, एक नारी एक ब्रह्मचारी, दिल दौलत और दुनिया, दुनिया क्या जाने, दामन और आग, इंटरनेशनल क्रूक, नादान, परदे के पीछे आदि) सुपर फ्लॉप. हाँ, जिन्होंने ऑर्केस्ट्रा दिया, उनके लिए “जब भी ये दिल उदास होता है” (सीमा), “आज मैं जवान हो गई हूँ” (मैं सुंदर हूँ), “थोड़ा रुक जाएगी तो तेरा क्या जाएगा” (वचन) और “आँखों आँखों में बात होने दो” (आँखों आँखों में) जैसे हिट गीत दिए, लेकिन ये गीत भी तत्कालीन संगीत में सार्थक उपस्थिति दर्ज न कर सके. वे “लैला-लैला पुकारूँ मैं वन में” की तर्ज पर आर्केस्ट्रा-ऑर्केस्ट्रा की गुहार लगाते रहे, लेकिन निर्दयी प्रीतमों का दिल नहीं पिघला.

दरियादिली दिखाई तो सोहनलाल कँवर ने. कहते हैं कि `उपकार’ की सफलता के बाद मनोज कुमार देशभक्ति की फ़िल्में खुद के बैनर तले और धनभक्ति की फ़िल्में कँवरसाब के बैनर तले बनाते थे. नामावली में निर्देशक के रूप में भले ही सोहनलाल का नाम होता था, लेकिन फ़िल्म के सेट्स पर उनकी भूमिका पुरानी दरी के टुकड़े को लटकाकर बनाई गई आरामकुर्सी पर डले रहने के अलावा कुछ न होती थी. कुमार और कँवर की इस जोड़ी की पिछली फ़िल्मों `पहचान’ और `बेईमान’ में शंकर-जयकिशन ने हिट संगीत दिया था. उन्होंने शंकर को पूरी छूट दी. निर्माता की इस उदारता को शंकर ने पूरी गंभीरता से स्वीकारा और पॉपुलर संगीत के तत्कालीन मुहावरों को खारिज करते हुए अपना अलग ही रास्ता चुना. सबसे पहले तो उन्होंने पुराने गिले-शिकवे तमाम किए. “तितली उड़ी” फेम शारदा को तरजीह दे-देकर उन्होंने संगीत के सागर में रहते हुए लताजी से बैर मोल ले रखा था. लिहाज़ा पहले तो अपनी गुस्ताखी के लिए उन्होंने लताजी से माफी माँगी, फिर सोहबत के सुहाने दौर का हवाला देते हुए गुरबत के इस दौर में सहयोग देने का अनुरोध किया. लता नम गईं. ज़माना भले ही किशोर की आँधी में डूबा हुआ था, उन्होंने रफी की ही तरह लगभग फुरसत में बैठे मुकेश को लिया. अब बारी आई गीतकारों के चयन की. उन्होंने आनंद बक्षी, साहिर व मजरूह जैसे उस दौर के `नंबर वन-टू-थ्री’ गीतकारों को छोड़कर `फोर टू नाइन’ के क्रम में मौजूद छः गीतकारों इंदीवर, हसरत जयपुरी, वर्मा मलिक, एम.जी. हशमत, विट्ठलभाई पटेल और विश्वेश्वर शर्मा को चुना.

निर्माताओं के आर्केस्ट्रा-निरपेक्ष रवैये और राज कपूर समेत तमाम बड़े फ़िल्मकारों द्वारा की गई उपेक्षा से दुःखी शंकर ने इस अवसर को करो या मरो की लड़ाई के रूप में लिया और गीतों की तैयारी में जी-जान से जुट गए. एक-एक कर गीत रेकॉर्ड होते गए और उनका आत्म-विश्वास बढ़ता गया. विश्वेश्वर शर्मा ने दो गीत “चल संन्यासी मंदिर में” और “जैसा मेरा रूप रंगीला वैसा मिले जवान” और एम.जी. हशमत ने भी दो गीत “चोरों का माल सब चोर खा गए” और “ये है गीता का ज्ञान” लिखे. शेष चारों ने एक-एक गीत लिखे. विट्ठलभाई पटेल ने “बाली उमरिया भजन करूँ कैसे”, वर्मा मलिक ने “सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूँ कन्या कुँआरी”, हसरत जयपुरी ने “शामे फुरकत का ढल गया साया रे”, इंदीवर ने “क्या मार सकेगी मौत उसे”. शंकर (बिन जयकिशन) की धुन, लता-मुकेश की आवाज़ें और छः-छः गीतकारों की कलम, नतीजा सारे के सारे गीत सुपरहिट. `संन्यासी’ का संगीत फ़िल्म प्रदर्शित होने से कुछ समय पहले रिलीज़ कर दिया गया था और अब लोगों में उत्सुकता इसी बात को लेकर थी कि इतने अच्छे गीतों का फ़िल्मांकन किस प्रकार से होता है.

हेमा मालिनी को फ़िल्मी दुनिया की विगत तैंतालीस सालों की सबसे खूबसूरत और आकर्षक नायिका माना जाता है. सत्तर के दशक में उनकी लोकप्रियता और सौंदर्य, दोनों ही शबाब पर थे. यह वह समय था, जब नायकों में कोई नंबर वन नहीं था, लेकिन वे नायिका में नंबर वन थीं और अपनी टर्म डिक्टेट करती थीं. उनके रूप-लावण्य के निहाराकांक्षी दर्शकों में से जो सिनेमा हाउस में आगे की पंक्ति में बैठते थे, उन्हें यह जानकर झटका लगता था कि हेमा नृत्य के क्लोज़अप वाले दृश्यों में अनावृत्त कमर पर भी जाली लगाती थी. कितने आश्चर्य की बात है कि जिस अतिंद्रीय सुंदरी के पास दिखाने को बहुत कुछ था उसने हमेशा छुपाने में ही विश्वास किया, जबकि उसी की `बदशक्ल’ नहीं तो कम से कम `डिफेक्टिव पीस’ बेटियों के पास छुपाने लायक कुछ भी नहीं है, लेकिन शरीर के उन्हीं हिस्सों पर टेटू चिपका-चिपका कर दर्शकों के सामने उजागर करने की कोशिश किया करती हैं. इसे कहते हैं, थोथा चना बाजे घना. बहरहाल “सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूँ कन्या कुँआरी” और “बाली उमरिया भजन करूँ कैसे” जैसे गीतों के माध्यम से एक ब्रह्मचारी को रिझाने वाली हेमा मालिनी और नायिका से दूर-दूर रहने की भारत कुमारीय शैली अपनाने वाले मनोज कुमार की केमिस्ट्री खूब जमी. यूँ तो फ़िल्म का एक-एक गीत सुपर हिट हुआ, लेकिन सबसे ज़्यादा हैरत में डाला प्रेमनाथ ने, जिन्होंने न सिर्फ “शामे फुरकत का ढल गया साया रे” गीत में तबले बजाने का सीन निहायत ही अजीबो गरीब शैली में (गद्दी पर बैठे-बैठे उछलते हुए आगे की ओर सरककर पूरे तबले पर पाउडर मलने के अंदाज़ में) प्रस्तुत किया, बल्कि गाने की शुरुआत में लता की पंक्ति “सितारे डुबने लगे किसकी आह लेकर, चिराग बुझने लगे किसकी आह लेकर” के बाद “कोयल हँसके मस्त करे, जब आलाप से, दिल के वलवले दब जाएंगे, तबले की खड़क से” नामक उटपटांग पंक्ति भी बोली. पार्श्व गायक के रूप में यह संभवतः प्रेमनाथ की पहली और आखिरी फ़िल्म थी. इतने तामझाम के साथ जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई, तो दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया. बॉक्स ऑफिस के विश्लेषक हमेशा 1975 को अलग-अलग रंग की तीन सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों का साल मानते हैं. एक तो `शोले’, दूसरी `जय संतोषी माँ’ और तीसरी `संन्यासी’. तीनों फ़िल्मों में तीन बातें कॉमन थीं. तीनों का संगीत सुपर हिट था, तीनों के संगीत में मीठे गले वाले मन्ना डे मौजूद थे (क्रमशः “ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे” , “मत रो मत रो आज राधिके” और “क्या मार सकेगी मौत उसे”) और तीनों के संगीत से महान गायक मोहम्मद रफी नदारद थे. हाँ एक बात और भी कॉमन थी. तीनों ही फ़िल्मों की कामयाबी इनसे जुड़े सबसे महत्वपूर्ण लोगों को फली नहीं. `शोले’ के बाद रमेश सिप्पी कोई हिट फ़िल्म नहीं दे सके, `जय संतोषी माँ’ के नायक-नायिका आशीष कुमार और कानन कौशल को लोग भूल गए और `संन्यासी’ में इतना अच्छे संगीत देने के बाद भी शंकर की वापसी न हो सकी.
शशांक दुबे
(टीप: आज शंकरजी की पुण्यतिथि है. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ‘नया ज्ञानोदय’ में कुछ अरसा पहले प्रकाशित अपना लेख ‘शंकर, बिन जयकिशन’ सभी शंकर-जयकिशनप्रेमियों के अवलोकनार्थ पुनः प्रस्तुत किया गया है.

Image may contain: 8 people, including Sanjay Vitthal Bhai Patel and Shashank Dubey, people smiling, people standing and outdoor

चित्र परिचय: गत 30 मार्च को हमारे साथी श्री ए बी यादव को ठीक शंकर जयकिशन चौक के नीचे बिदाई देते हुए टीम राजभाषा)

Shankar The Selfless Emperor Of Music. 

A tribute by Shri Ajay Dagaonkar

Shankar
#Shankar  @ #Shanker of Shanker Jaikishen, Shankar Jaikishan, Shanker Jaikishan, Shankar Jaikishen

Shankar was from different world. He came here to give us happiness by music. He took all the pains but never uttered a word.

A man of immense pride his goals were highest like Mount Everest
A struggling young man rejects chance to become single music director for an 18 years old friend is rarest of rare event in modern world of greedWhosoever came to him became his life long associate. Be it Jaikishan: Shailendra; Hasrat: Dattaram and Sebastian

He along with Jaikishan changed the entire musical world. They made it world class but with Indian stamp . Every aspect of Navarasas of music were explored only by Shankar Jaikishan with grand success

They remain till date only one star music directors in every aspect Be it money or popularity For every noble cause from defence to aids for various society’s SJ contribution is unsupassed.

When Shailendra left Jaikishan left due to Destiny but other left for reasons other than music, anybody would have been bitter But Shankar never retaliated but answer was music

He is perhaps the only music director who had films till his last day.All duos closed with demise or leaving of one partner but not Shankar Jaikishan

We his admirers bow in respect ; love; admiration for this great music director

महान संगीत तपस्वी और जिंदादिल इंसान … ‘शंकरसिंह रामसिंह रघुवंशी’ !!!

इस लेख के लेखक

Sudhakar Shahane's Profile Photo, Image may contain: 2 people, people standing

सुधाकर शहाणे 

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 २५ अप्रैल १९८७ की शाम, स्टुडिओ से घर लौटते वक़्त शंकर जी ने अपने एक तबला और ह्रिदम बजाने वाले साथी चंद्रकांत भोसले (जो शंकर जी के १९४५ से करीबी थे,उन्हीके अनुसार ) को चर्नीरोड स्टेशन पर छोड़ा था … शंकर जी आगे बढ़ गये … और भोसले अपने घर चले गये … दूसरे दिन २६ अप्रैल को सुबह १० बजे स्टुडिओ जाने के लिए चर्नी रोड स्टेशन के बाहर भोसले काफी देर तक इंतजार करते रहे, पर शंकर जी का कोई पता नहीं था … असमंजस की स्थिति में वोह अकेले ही टैक्सी से स्टुडिओ चले गये …लेकिन वहां भी शंकर जी नहीं पहुंचे थे … सभी परेशान थे … २७ अप्रैल को अखबारों में सबका दिल दहला देनेवाली खबर आयी क़ि,

‘शंकर जी नहीं रहे’ …!!!

हर किसी की आँखों से आँसू बह रहे थे …पहले कविराज, फिर जय और अब शंकर जी ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया था … !

२६ साल के युवा ‘शंकरसिंह रामसिंह रघुवंशी’ १९४५ में हैदराबाद से बंबई आये थे, कृष्णनकुट्टी और हेमावती के बैले ट्रूप के साथ, जिसमें वें तबला बजाया करते थे … तब उन्हें भी पता नहीं था क़ि, वें टिपिकल हिंदी फ़िल्म संगीत को नयी दिशा की ओर ले जानेवाले है … कुछ दिनों बाद यह बैले ग्रुप ‘पृथ्वी थिएटर’ में शामिल हो गया … स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनने की चाहत, हसरत उनके मन में थी ही, इसी वजह से काम की तलाश करते हुए जयकिशन जी से मुलाक़ात हो गयी …शंकर जी ने जयकिशन जी को पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम बजाने के लिये कहा और १९ वर्षीय जय फ़ौरन मान गये …पृथ्वी थिएटर में जय के साथ काम करते हुए उन्हें राज कपूर साहब की ‘बरसात’ में स्वतंत्र संगीत निर्देशन का मौका मिला और सबसे युवा संगीतकार ‘SJ’ की जोड़ी ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा … अपनी अफ़लातून संगीतकला, प्रतिभा, साधना से शंकर जी ने २२ साल तक जय के साथ (१९४९ से १९७१) और फिर १९८७ तक अकेले ही संगीत क्षेत्र में अपनी बादशाहत बनाये रखी …
इस महान, शिस्तप्रिय, जिंदादिल शख़्स ने अपने जीवन में हर किसी की दिल से मदत की, नए गायक गायिकाओं को मौका दिया … तबला और कुश्ती का शौक़ था, नृत्यकला में भी पारंगत थे … ‘फ़िल्म पटरानी’ में नायिका ‘वैजयंतीमाला’ को नृत्य की बारीकियां, कुछ स्टेप्सभी उन्होंने समझाई थी, दर्जन भर साज भी बजाना सीखे थे … इस हरहुन्नरी संगीतकार ने जयकिशन जी के साथ शास्त्रीय संगीत,अरेबिक संगीत और पाश्चात्य संगीत में नए नए सफल प्रयोग किये … पारंपारिक वाद्यों के साथ नए साजों को प्रचलित किया और अभूतपूर्व सफलता हासिल की !
‘शंकर जी – जयकिशन जी – कविराज जी – हसरत साहब’ संगीतक्षेत्र के चार आधारस्तम्भ थे … SJ का संगीत मतलब फ़िल्म जबरदस्त हिट रहेगी यह समीकरण बन गया था उस दौर में …SJ के संपूर्ण संगीत सफ़र में उनका मुक़ाबला खुद से ही था … ‘राज साहब’, उनके छोटे भाई ‘शम्मी कपूर’, ज्युबिली कुमार ‘राजेंद्र कुमार’ इन नायकों का करिअर बनानेवाले SJ ही थे, ‘दिलीप कुमार’, ‘देवआनंद’ इन अग्रणी नायकों की फिल्में भी उनकी मधुर धुनों से सजे गीत संगीत से बेहद कामयाब रही … राज साहब की फ़िल्म ‘आवारा’ के गीतों ने देश के साथ विदेशो में भी धूम मचा दी थी … गीतों के Preludes और Interludes यह SJ की ख़ासियत थी, उनके संगीत में नज़ाकत थी जो सुनते ही मन को जकड लेती थी …फ़िल्म ‘बसंत बहार’ में शास्त्रीय संगीत पर आधारित लाजवाब रचनाएँ बनाकर उन्होंने ‘रागदारी पर भी हमारी हुक़ूमत है’ इसकी बेहतरीन मिसाल पेश कर के, टीकाकारों को करारा जवाब दिया था … ‘बिनाका गीतमाला’ (१९५२ से १९८७ ) इस लोकप्रिय हिंदी गीतों के रेडियो प्रोग्राम में SJ के १४० ‘सरताज़ गीत’ थे ..इसी से उनकी लोकप्रियता का पता चलता है … नौ बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार जीतनेवाले ‘SJ’ भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सन्मानित होनेवाले पहले संगीतकार थे !
अपने जीवनकाल में शंकर जी संगीत से जुडे उस हर व्यक्ती से मिल कर कुछ न कुछ सीखते रहे … सब से बड़ा साजों का और साजिंदों का ताफा उनके पास था … सामाजिक कार्यों में हमेशा आगे रहते थे …स्टेज प्रोग्राम कर के, उन्होंने देश की ख़ातिर फंड्स इकठ्ठा किये थे और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई थी … जयकिशन जी के मृत्यु के पश्चात् शंकर जी ने जितनी भी फिल्मों में संगीत दिया और जो पारिश्रमिक मिला, उसमें से आधा हिस्सा जय जी की पत्नी ‘पल्लवी’ जी को पहुंचाया …
कविराज १९६६ में चले गये तो जयकिशन जी १९७१ में …तनहा हो गये थे शंकरजी, लेकिन हसरत साहब के साथ अन्य गीतकारों को लेकर उन का शानदार संगीत सफ़र चलता रहा उनके अंतिम वर्षों में में कई दोस्तों ने उनका साथ छोड़ दिया था … राज कपूर ‘मेरा नाम जोकर’ के बाद दूर हो गये थे, राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार ने जब अपनी ख़ुद की फिल्मों का निर्माण किया तब अन्य संगीतकारों को मौका दिया …उस वक़्त शायद यही ख़याल होगा उनके दिल में …

‘ना कोई इस पार हमारा ना कोई उस पार
सजनवा बैरी हो गये हमार’

यह महान संगीतकार आज ही के दिन ही, २६ अप्रैल को,

‘हम तो जाते अपने गाँव अपनी राम राम राम,
सबको राम राम राम’

करते हुए दुनिया से रुखसत हो गया !

S -J आप और आपका संगीत अमर है और रहेगा !!!

शंकर जी के ‘स्मृति दिन’ पर उन्हें सलाम … विनम्र अभिवादन ! और भावपूर्ण श्रद्धांजलि !!!

उन्हें याद करते हुए यह उनका बेहतरीन गीत पेश है … फ़िल्म – जिस देश में गंगा बहती है (१९६०)
स्वर : लता – मुकेश,
गीतकार : कविराज शैलेंद्र

Sudhakar Shahane

https://youtu.be/H8Fu_O7y-dg

आ अब लौट चलें
नैन बिछाए बाँहें पसारे तुझको पुकारे देश तेरा
आ जा रे
आ आ आ

सहज है सीधी राह पे चलना
देख के उलझन बच के निकलना
कोई ये चाहे माने न माने
बहुत है मुश्किल गिर के संभलना
आ अब लौट चलें …

आँख हमारी मंज़िल पर है
दिल में ख़ुशी की मस्त लहर है
लाख लुभाएँ महल पराए
अपना घर फिर अपना घर है
आ अब लौट चलें …

Shankar, A Hero

lakshmi

This feature by Lakshmi K. Tummala

Who is a hero? A person with outstanding achievements. Shankar fits the image perfectly. In a shortest span of time, he, with his music partner Jaikishan, has achieved more than any in the music industry. The vast body of work, the innumerable genres and the huge variety in composition styles created are matchless. The highest number of awards won and the consecutive number of nominations for awards were records of their excellent performance.

Who is a hero? A person who is admired for his strength. He is strong enough to withstand any adversities at any time as well as one who can show courage when faced with a problem. Shankar matches all the traits mentioned here. When he lost his close friend and associate, Shailendra and his “brother” Jaikishan, one after another, he did not allow his grief to depress him. He showed his mettle by remaining strong and totally focused on the numerous assignments on hand and, single handedly, completed them on time.

Who is a hero? He is one who is there to help another in various ways and give them strength to go on through life’s difficulties. When Mukesh wanted to pursue a career in acting and couldn’t succeed in it and was struggling financially. Shankar wanted to help him out and had him sing, “Ye mera diwana pan hai” in Yahudi against Dilip Kumar’s objection. He composed music for his close friend, actor/producer Chandrashekhar, for a nominal rupee under the pseudonym Suraj to show his love for his pal. When write/producer/lyricist, Sudhakar Sharma approached him to compose music for his movie, Gori, Shankar immediately agreed to do so without a fee. He also readily agreed to compose the background music for the Films Division documentary “Everest” as a complimentary gesture to show his pride in the successful expedition. There are many more such instances when the composer went out of his way to be there for his near and dear.

Who is a hero? A person who feels a moral obligation to act regardless of how someone treats them. Again, Shankar wins. At a time when his close associates betrayed him, the man that he was, Shankar never let that deter him from his work. He was a man of great resilience and continued to move on with his head held high. Never did he utter a negative word against the people who backstabbed him for his sentiments towards them did not allow him to. He was contented with the few loyal producers and directors who believed in him for his abilities to deliver the product.

Shankar was a man among men. He stood tall and kept the SJ flag fluttering against harsh winds of time. BRAVO, Shankar! You are a true hero!! Rest In Peace, Great One!!

SHANKAR-MAHADEV OF MUSIC

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फिल्म गंगा और गीता के गीत “मैं आग हूँ, तू आग है, आग को आग में ढाल दे” के रिहर्सल के दौरान लिया गया चित्र.      सौजन्य श्री संजय विट्ठलभाई पटेल 

 

I have been writing about Shankar Jaikishan’s music, almost every single day of my life since , late 2013, when I had joined this Facebook page dedicated to Shankar Jaikishan and their music, and will continue to do so, as long as I can.

This is something, which has become an integral part of my daily tasks, which I have to do , lest my day is incomplete.
What I have written, doesn’t even cover a speck of what they have created, and the body of work they have left behind, for millions and millions of music lovers, for so many generations, across so many nations and cultures. My limited knowledge and understanding of music , may have touched upon , just a flimsy layer of the kind of work they have left behind, like the clichéd “ Tip of the ice berg”

Shankar , the senior partner and the founder of this brand called SHANKAR-JAIKISHAN left this mortal world on this day, and left such a void , which can never be filled. What is it that makes Shankar, such a giant in the world of Hindi Film Music? This is a tough question which , perhaps very few can answer with precision. Each answer will be a perception from their point of view , but never a complete assessment of this genius.

One has to take a look at where he came from, what was his background, and then match it with the priceless body of work they left behind. When we assess Shankar’s work, we cannot do it in isolation without Jaikishan’s name and contribution. This is because , they not only had a pact of not to reveal their identity in creations, but also because , they were two bodies and one soul.

Let us take a look at the first question; where did he come from? His question , not only includes his geographical roots, but also about his cultural exposure as well. Without this, our understanding of Shankar will be incomplete and inadequate. He was born in a Telugu family in Hyderabad, and his family did not have any exposure to any music. The locality where he was born, is Dhoolpet, which has nothing cultural about it. His early interests were wrestling and tabla.

These two interests defined his life and style. Disciplined lifestyle and lack of diplomacy ( an euphemism for hypocrisy)
He did not have the luxury of exposure to rich cultural backgrounds like all the other composers before him, his contemporaries and those who came after him. He managed to reach Bombay, and earn an employment with Prithvi Theatre of Prithviraj Kapoor, who was not only a big name in movies but a colossus in the field of theatre as well. He was kind of doing everything , from playing tabla/dholak to doing any odd job which was entrusted to him. His exuberance and energy was his strength , and that is what impressed the great Prithviraj Kapoor.

How he met Jaikishan is a part of the folklore, and within no time they were working together in Prithvi Theatre as musicians and odd job men. How they secured their assignment for Barsat, and what was the impact of Barsat’s music on Hindi cinema is now an indelible part of the History of Hindi and Indian cine music. I will not dwell on this, and would simply like to state a fact that, Shankar was 24 and Jaikishan was 17, and both of them came from very poor backgrounds and underprivileged sections of the society. This is the most important aspect in assessing their body of work.

I am listing their first 10 movies which will give us an idea of the vast canvas of their music. Barsat 1949, Awara, Badal, Nagina, Kalighata ( 1951) Daag, Parbat, and Poonam 1953, Aas, Aah (1954). Barsat and Awara, were two albums which liberated Hindi film music from the shackles of conventions and traditions, and infused a fresh air of energy and exuberance which touched and impressed the most common listener on the street and the experts alike.

Shankar , a man who came from the most uncultured part of Hyderabad, was the founder of this brand, and his vision for music was larger than life canvas, which blended the purest form of Indian classical , Western Classical and Indian folk, to create their own brand “ The Shankar Jaikishan” style, which was the new syntax and architecture of Hindi Film Music.

If one were to describe their contribution to Indian Film music, then it is “ Fresh energy” to the existing melody and richness. Between the two of them, Shankar was the one who was more inclined to give their songs a larger than life feel, rich and full orchestra, multi-layered architecture for their songs. Many of their songs , have this larger than life feel to them, without compromising a bit on the melody and feel of the songs.

Awara , was their very second movie, and its dream sequence is something which remains unmatched till date about its wide range of feel and energy in each part of the song. This song is structured in three parts; first is melancholic where the heroine is in agony, missing her beau, and pleads for him to come and join her, the second part is where the hero is caught in his own inner struggle of which way to go; follow his mentors path or abandon his path and go to his loved one; here the chorus, with wild devilish cries, create a feel of hell, and the rhythm is agonizing with frustration, and the last part is where the lovers meet, where the music is full of blissful feel, with mandolin notes. This kind of wide canvas composition was something unheard of, and could never be replicated by any other composer.

This one song, in their very second movie is their stamp of authority on Hindi Film Music, which swept the listeners and audience off their feet. The title song of Awara, is such a masterpiece, which conveys the theme of vagabond in each note, that the song became an international hit, and is sung and all over the world, including major events like greeting the heads of states, visiting India.

This was and is the stamp of Shankar Jaikishan which changed the very face and feel of Hindi Film Music for ever. The composers who came after Shankar Jaikishan and the filmmakers who could not sign them, had their music as the bench mark. Quite a few composers pitched themselves like wannabe Shankar Jaikishans, and walked the path created by these magical duo.

Why was their music so popular and successful ; again a very tough one to answer. In my humble opinion, they simplified the compositions, making them easy to hum and recall. While they simplified their compositions, their orchestration was very sophisticated, which was not easy to comprehend and replicate. They created multiple layers of music, which gave a depth to the songs, and conveyed the emotions with greater effect.

Shankar was immensely influenced by Western symphony, and its huge orchestration, with many violins, and multilayered music. Western symphonies, seldom have a prominent rhythm side, which is often taken care of by cellos, pianos and other cord sections. Shankar followed this pattern, for Hindi songs as well; he composed tunes based on Indian classical raagas, but embellished these tunes with rich and deep multi-layered Western symphonic orchestra.

Large section of violins was Shankar Jaikishan’s hallmark signature style, as these violins gave the song a special depth , which made the song acquire a third dimension of depth as well.

Very few composers , used choir like Shankar Jaikishan did , many of their songs have such a rich chorus in them, that the entire feel of the song acquired a different feel altogether. He could replace group violins with chorus, and use lead singer as an obbligato, against the chorus singers.

He composed many classical Indian dance numbers and has used group violins and sitars the way no other composer ever did, and enriched the song. All this they did , when the sound engineering and recording facilities were primitive; this makes one wonder, what kind of enormously rich music they could have created , if they had these facilities.

I will take the liberty of citing the same dream sequence song from Awara, to substantiate my point. Each frame of the song was structured on perfect notes by Shankar Jaikishan making the job of the filmmaker all that easy.

Shankar Jaikishan were the best composers for the filmmakers as they facilitated, the narrative with their near perfect music. Cinema is an Audio-visual medium, and audio part consisted of dialogues, background score and songs. Shankar Jaikishan were the best in business, to facilitate the filmmakers vision into musical narrative, thus easing more than 50% of their task.

It was no wonder that, they remained the most sought after composers, from 1951 to 1971. Jaikishan’s death in 1971, changed the situation. But, Shankar , the brave heart, continued his mission, with the same missionary zeal and worked till his last breath, which no other composer had the privilege of; in April 1987. His music retained the same class, and virtuoso, but times had changed.

The law of nature has to catch up with every living thing, and the end had to come. Shankar was unfortunate in his death, as he did not get the honours he so rightfully deserved.

Perhaps his destiny was somewhat similar to that of the great warrior Karna of Mahabharata, who despite being the best , had to live with facing the world’s wrath for no fault of his.

Shankar , you will remain one the best things to have happened to Hindi Film Music, and will be remembered till eternity, as long s your songs are heard and enjoyed.

I end my tribute to the greatest composer ever to have worked in Hindi cinema along with his partner Jaikishan, these lines from their song from Basant Bahar..

sat suro ke sato sagar, sat suro ke sato sagar
man ki umango se jage, man ki umango se jage
too hee bata
too hee bata mai kaise gau behri duniya ke aage
behri duniya ke aage
teri yeh bina abb tere hawale
teri yeh bina abb tere hawale
charno me, charno me tere charno me, charno me

Rest in Peace, Shankar, the Mahadev of Music !

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Musicians are gods special messengers

This feature by : Ajay Kanagat

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Music director #Shankar of #shankarjaikishan duo.This picture courtesy : Sharda Rajan

Musicians are born not made they are gods special messengers sent to this earth to lacerate tortured souls . Shankar of the Shankar-Jaikishan was also a prodigy. Who had music running in his blood with no formal academic education. He along with his partner Jaikishan created music that has became immortal

Geniuses like him are born once in a century it defies all logic to know that a man having hardly any formal education could create such symphonies and raag based songs which even people who had undergone rigourous musical training could not do.

The greatest test of a composition is that it should be remembered years after it has been composed. SJ’s music is still remembered and sung even by this generation and BBC had declared “Baharon phool barsao” as the song of the millennium.

Shankar was born and brought up in Hyderabad and his love for music took him to the city of Mumbai he quickly found a job as a tabla player with prithvi theatres where he got an opportunity to showcase his musical skills, it was not long before he got a break as an independent music director with his partner jaikishan in the film “Barsaat.” After Barsaat, there was no looking back and for the next 23 years 1948-1971 SJ continued to churn out music that appealed to all they were called music directors with a Midas touch, they commanded a price that even the lead actors could not demand.

They brought a new trend in composing songs where they integrated western music with Indian music (having expressive, orchestral interludes).Their style of music became popular not only in India but also internationally cutting along all boundaries

The founding father of communist china “Mao Tsetung” was a great fan of the music of SJ and his Favourite SJ song was “Awara Hoon.”

Music they say cannot be manufactured, but it has to come from your heart. That’s why you would find excellent instrumental artists becoming failures as music directors. Shankar had a great sense of music and in his compositions used all Indian instruments like the bansuri, sitar, dholak and sarod. Another innovation of Shankar Jaikishan was the use of counter melody. It means counter melody to the main tune. Example, “Kahan jaa rahe ho” from the film Love Marriage where you actually hear a dialogue between the singer and accordion.

To write and analyze about the music of SJ is an ongoing process and everyday new facets about their music are being unearthed. All I can say is let the soul of Shankar live in peace.

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