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शंकर जयकिशन:शाश्वत संगीत के कालजयी प्रणेता

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श्री द्वारका प्रसाद खाम्बिया

सामान्यतः कम फिल्मों में अच्छा संगीत देना संभव है परन्तु अधिक से अधिक फिल्मों में लोकप्रियता की बुलंदियों वाला संगीत अविराम व सतत 21 वर्षों तक देना ईश्वरीय वरदान है कहा जा सकता है। ऐसे वरदान से ईश्वर ने संगीतकार शंकर जयकिशन को नवाजा था। अपने नायाब संगीत द्वारा देश के साथ विदेशों में भी धूम मचा देने वाले वे प्रथम संगीतकार थे।
लोगों में सदैव जिज्ञासा बनी रही कि आखिर इतनी लोकप्रिय धुनों मे से कोन धुन किसकी है। यह जिज्ञासा जयकिशन जी की मृत्यु के बाद शंकर जी विरोधी समूह ने और बढ़ा दी। वे सिद्ध करना चाहते थे कि धुन जय किशन ही तैयार करते थे । लोगो में भी यह जानने की इच्छा प्रबल होने लगी कि आखिर जयकिशन की रचनाएं कोन सी है। कुछ पुष्ट जानकारियों के आधार पर ज्ञात होता है कि निम्नांकित कुछ लोकप्रिय धुनों को जयकिशन ने ही रचा था –
1 जीना यहां मरना यहां(मेरा नाम जोकर)
2 तुम जो हमारे मीत न होते ( आशिक)
3आजा सनम मधुर चांदनी में हम( चोरी चोरी)
4 आवाज दे के हमें तुम बुलाओ(प्रोफेसर)
5 इस रंग बदलती दुनियां में (राजकुमार)
6 तेरी प्यारी प्यारी सूरत को (ससुराल)
7 ए मेरे दिल कहीं और चल ( दाग)
8 सनों छोटी सी गुड़िया की ये कहानी(सीमा)
9 दिल अपना और प्रीत पराई (दिल अपना और प्रीत पराई)
10 देखा है तेरी आंखों में प्यार ही (प्यार ही प्यार)
11 आए बहार बन के लुभा के (वसंत बहार)
12 दिल के झरोखे में तुझ को (,ब्रम्हचारी)
13 ओ मेरे शाहे खूब ओ मेरी (लव इन टोकियो)
14 कहे झूम झूम रात ये सुहानी ( लव मैरिज)
15 अजी रूठ कर अब कहां जाइएगा(आरज़ू)
16 रसिक बलमा (,चोरी चोरी)
17 ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर(संगम)
ये गीत जयकिशन की संगीत रचनाओं की झलकी मात्र है।
परन्तु आम जनता श्रोता उन्हें उन्हें एकीकृत रूप में देखता है। भारतीय हिन्दी फिल्म संगीत के गौरवशाली
इतिहास के पृष्ठों पर जिन महान संगीतकारों के नाम स्वर्णिम अक्षरों अंकित है उनकी जगमगाती पंक्ति में शंकर जयकिशन का नाम निर्विवादत: सर्वत्र मुख व अग्रणी रूप से परि गणित किया जस सकता है।
उनके जादुई संगीत ने जहां एक ओर परंपरा और आधुनिकता के मध्य अभूतपूर्व सेतु का निर्माण किया वहीं दूसरी ओर अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा वाद्ययंत्रों के कुशल इस्तेमाल,नूतन प्रयोगों,भावानुकूल गीतों के संयोजन तथा शास्त्रीय व पाष्छ्यात संगीत के बेजोड़ तालमेल द्वारा जून अनगिनत सरस,मधुर, कर्ण प्रिय व मनमोहक कालजयी गीतों का सृजन किया।वे न केवल भारत वरन् समूची दुनियां में फैले बेशुमार संगीत प्रेमियों के लिए सचमुच बेहद अनमोल धरोहर है।
बहुत कम प्रतिभा ऐं ऐसी होती है जिनको कालजयी होने का सौभाग्य नियति प्रदान करती है।शंकर जयकिशन का शुमार ऐसी ही कालजयी प्रतिभाओं में किया जा सकता है।वे न केवल अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय संगीतकार रहे बल्कि यह कहना किंचित भी अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि उनका मधुर संगीत आज भी प्रासंगिक होकर अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखे हुए है।उनके द्वारा रचित बेमिसाल गीत आज भी दुनियां भर के संगीत प्रेमियों के कानों में रस घोलते है।

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एक लोक प्रसिद्ध कहावत है कि जोड़ियां ऊपरवाला ही बनाता है ।शादी के संदर्भ में ख्यात यह कहावत संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन पर सौ फीसदी खरी उतरती है। निः संदेह यह जोड़ी संगीत की नैसर्गिक प्रतिभा से संपन्न थी और नियति ने ही दोनों को मिलता भी। शंकर जी जहां नृत्य कला,सितार,पियानिं एवं अकोर्डियान बजाने में पारंगत थे तो वहीं जयकिशन जी हारमोनियम वादन में सिद्ध हस्त थे।हिंदी फिल्म संगीत की दुनियां में इस जोड़ी का मिलन ‘ मणि कांचन ‘ सिद्ध हुआ। उल्लेखनीय है कि जयकिशन दाया भाई (4 नवंबर 1932) मुंबई काम की तलाश में आए थे जहां उनकी मुलाकात दक्षिण आंध्र प्रदेश(तेलंगाना) से आए शंकर सिंह रामसिंह(15 अक्टूबर 1922)से गुजराती फिल्म निर्माता चंद्रवदन काम के सिसिले में हुई।शने: शने: यह मुलाकात प्रगाढ़ मेत्री में तब्दील हो गई।विपरीत स्वभाव इसके इन दो व्यक्तित्वों का संगीत के प्रति समर्पित भाव उभयनिष्ठ था। गठीले बदनवाले शंकर जहां धीर गंभीर स्वभाव के थे तो वहीं जयकिशन जी मस्तमौला प्रकृति के
आकर्षक व्यक्तित्व के धनी इंसान थे।,
शंकर जयकिशन के बृहद संगीत के कई आयाम है जो उनको अन्य संगीतकारों स्की तुलना में विशिष्ठ स्थान आसीन करते है।उनके बेमिसाल संगीत को कतिपय शीर्षकों के तहत वर्गीकृत करते हुए सुगमतापूर्वक समझा जा सकता है। ये शीर्षक इस प्रकार ही सकते है जैसे शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत,लोक संगीत आधारित,सुकुमार भावाभिव्यक्ती प्रधान गीत,प्रेम व रूमानी भाववाले ,विरह दर्द वाले गीत,समूह गीत,नृत्य प्रधान गीत,ग़ज़ल शैली गीत,कव्वाली शैली गीत,भारतीय संगीत आधारित नृत्य गीत,पाध्छ्यात संगीत आधारित नृत्य गीत,भजन रूपी गीत, बाल गीत,प्रश्न/पहेली नुमा गीत, छेड़ छाड़ वाले गीत,हास्य प्रधान गीत,अनोखे/अटपटे बोल वाले गीत,भारतीय व पाष्छ्यात फ्यूजन गीत आदि।
समग्रहतः यह सुस्पष्ट होता है कि शंकर जयकिशन के बहुरंगी गीतों का एक व्यापक अत्यंत और विस्तृत संसार है जिसने विविध भावों को अनुकूल संगीत धुनों के साथ कुशलता पूर्वक संवारा गया है।इं मनमोहक व कर्णप्रिय गीतों का कलेवर सजाने संवारने में इस संगीत निपुण जोड़ी के दक्ष निर्देशन की भूमिका प्रमुखत : रही है।
लेकिन विविध का संगीत नियोजन करने में दत्ता राम व अरेंजर सेबेस्टियन की भूमिका भी अहम हुआ करती थी साथ ही विभिन्न वाद्ययंत्र वादकों का महती योगदान रहा है,जिनके वाद्यों ने शंकर जयकिशन के गीतों की प्राण वान बनाकर लोकप्रियता के बेमिसाल आयाम प्रदान किए
शंकर जयकिशन के विशाल ऑर्केस्ट्रा में एक से बढ़कर कुशल वाद्य यंत्र वादकों का शुमार रहा । कुछ के नाम उस प्रकार है –
1 पन्नालाल घोष (बांसुरी)
2 लाला गंगवाने ( ढोलक)
3 उस्ताद अली अकबर खां (सरोद)
4 पं राम नारायण (सारंगी)
5 उस्ताद रईस खां (सितार )
6 एस हज़ारा सिंह(इलेक्ट्रिक गिटार)
7 मनोहारी सिंह ( सैक्सोफोन)
8 चिक चॉकलेट (ट्रंपेट)
9 वी बलसारा (हारमोनियम)
10 गुडी सिरवाई( अकिर्डियान)
11 सुमित मित्रा (अकोर्डियान) आदि इत्यादि।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि शंकर जयकिशन का ऑर्केस्ट्रा अत्यंत समृद्ध था उसके भीतर विलक्षण प्रतिभा वाले तथा अपने अपने वाद्यों के वादन में दक्ष कलाकार शामिल थे। इन अति निपुण व दक्ष कलाकारों के समन्वय व सहभागिता से शंकर जयकिशन ने अनगिनत अमर गीतों का सृजन किया।

Dwarka Prasad Khambia
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Rafisahab through the lens of a musician.

by

Ashok Jagtap (musician in Bollywood)

I came to Mumbai to try my luck in the industry.One of my friend introduced me to Bal Parte.Actually his name was Jaikumar but he was popularly known as Bal Parte.
Parte was assistant to Kalyanji Anandji and Usha Khanna.One day, he called me to his music room at warli and gave me some notations to play.He liked my playing and promised me to call for K.A.Recording.He kept his word.
I had hardly played two three recordings when this incident happened.
It was K.A.’s recording at film centre.I thought as usual I will play with orchestra but Parteji called me aside and asked me if I can play song with artist, as regular song violinist Narvekarji was not coming due to health problem.Parteji knew that I learned Indian as well western notation.To play song violin one has to have knowledge of classical music.I said I can try.
I took my violin and went to singers cabin.
After some time Rafisahab came followed by Ashaji.It was for the first time i saw both the legends.I said ” Namaste ” to both but inwardly I was nervous.Kalyanjibhai explained them the tune.I checked my notations.Within half an hour both the artists were ready and all of us went to the centre of the hall for rehearsal with full orchestra.Parte and Frank farnand were counducting the orchestra.Babla was looking after rhythm section.When rehearsal was over, artists wore headphones and went in the cabin.They were given placing.I too wore headphone and full mike rehearsal started.So far it was going well.
After some time Anandjibhai came out of the recording room and said, he found the song dull.He told the singers”Let us make the key half note high if both of you are comfortable.”
Inwardly I become more nervous as I was not accustomed to such a sudden change.When reharsal started,I was fumbling with notes.What I was playing went directly in singers earphones.Ashaji stopped singing and told some one”Bal la bolv”(call Bal).Parteji came promptly.She said “where is Narvekarji?”He tu konala pakdun anle aahe ?”Where did you get this guy? Her words entered my ears like hot lead. I become totally numb.Rafisahab told her that he is new and we would manage.After some time when Ashaji went out of the cabin to talk to someone,Rafisahab came near me.He put his hand on my back and said”koi baat nahi.Iska dimag jaldi garam hota hai.”Some how the recording was over.
This is how I met Rafisahab for the time.This small incident tells a lot about Rafisahab’s nature.I will never forget this incident but it was blessings in disguise.
I started practicing more and more. Six hours a day.For years I continued practiceing.
Years went by.Slowly I established myself.
Started playing with almost all music directors.
My first love was to play with orchestra but when need arised ,I played songs too.On many occasions I have to play with Ashaji.There was no Trace of past incident.She was comfortable with me.She would chat with me freely.
I played many songs with Rafisahab too. Anil Mohile who later became arranger used to play song violin with me.Together we both played many songs with different singers. Rafisahab,Lataji,Ashaji,all of them had amazing memory. It would take hardly half an hour for them to pick up the song. Most of the songs would be recorded within four hours. As the recording techniques developed, it increased the time required for recording instead of reducing it.
Rafisahab was a perfect gentleman. I’ve never seen him getting angry or being rude to anybody. Ashaji was exactly the opposite. If not in mood, she would make life miserable for the music directors or whoever in the range. I had seen her leaving the sets and music directors running after her. She is very out spoken but her anger would not last long. On the contrary Rafisahab never got angry. No matter how many retake’s he had to give he would sing till the music director was fully satisfied.
Only once he lost his cool at the recording of
Khayyamsahab.Khayyamsahab has habit of taking many retakes.He is never satisfied easily but that particular day after many retakes he was still not getting satisfied.He made Rafisahab sing more than 32 times.Everybody was tired.Rafisahab’s face was turning red but see his decency.Another person at his place would have walked out but he sangtill Khayyamsahab was satisfied.When Khayyamsahab came out of the recording room,he told him not to call himAgain and he never sang with Khayyamsahab again.
I remember him coming in his green fiat. Later he used chevrolet models. His brother in law Zahir would always accompany him. He was kind of his secretary. He was very friendly with us.He told us many unknown facts of Rafisahab’s greatness in his personal life. Rafisahab financially helped many needy musicians, singers even music directors who were old and out of work. For some ‘Lifafa’ would be ready and reach that person every month so he does not have to come to collect it. He did it all of this very secretly.We came to know about is only because of zahir. For the poor he was a ‘Masiha.
Once a musician who used to play with him wanted to buy a property.He set his eyes on one particular property which he liked very much but he has hardly twenty-five percent of the saving with him.He told his difficulty to his friend who advised him to approach Rafisahab.He was hesitant as the amount was not small but his friend convinced him to try.He went to Rafisahab’s house.He told him the reason.Without asking a single question Rafisahab went inside and came back with bundle of notes.That musician cried.In due course of time he returned the amount but it takes golden heart to help others.
Memory is like a small child walking on a sea-shore. You never know which pebble he will pick and treasure for the rest of his life. I also have some pebbles that I have stored .Today is Rafisahab,s death anniversary so i want to share these incidents with you which happened long time ago.
Actualy I am not an eye witness to the incidents but i got first hand information from my musician friends who always accompanied Rafisahab. Even in his famous world tour also he accompanied him. A regular player in film industry too. Before we go on with the incident, let me tell you about Narayan Naidu, a fine tabla player. I remember him for one more reason and cant resist the temptation to tell you about it.
He was staying at the distance of hardly five minutes from the place where I used to stay. Every Gokul Astami he used to call his musician friends to his house for Jagran. There would be a vocal as well as instrumental program till dawn. Many musicians from film industry used to attend every year.Kalyanjibhai’s assistant Bal Parte also used to come every year.
At four o clock or five o clock all would be served with rice and sambar. 
To come back to the point Rafisahab’s program was at Gandhi Nagar Gruh, Vadodara.
In those days record dance by female dancer was a must. A dancer named Sheela Ramani who acted or better to say danced in few films and was famous. Due to some reason she could not come for the program and the ticket holder created a ruckus when they got to know this. Even few chairs were broken. Police were called. Before the situation could go out of hand, the organizers agreed to return the money to those who want to return the tickets. He was so nervous that he asked Rafi sahab to announce the same.
The curtain opened and Rafi sahab appeared on the stage and announced that whoever wants thair money back can have them and program will continue without dancer. But nobody returned the tickets. as the program started,everybody forgot about dancer and the program passed on peacefully.
Buji lord is good friend of mine.He is a very good drumer and vibraphone player.Buji’s father was a great persecutionist.His late brother Kercy Lord was a accomplished arranger who worked with Naushad,Madanmohan and many other music directors.Rafisahab was so close to Lord’s family that he even attended Buji’s marriage.He told me about West Indies tour which was held in year 1966.
Rafisahab was accompanied by Enoc Danial, Narayan Naidu,guitarist Dilip Naik and Abdul Karim.Female singer was Minoo Purshottam.In those days she was famous stage artist.Later Dilip Naik got married to her.
People were crazy for Rafisahab.For hours they would wait out side the hotel to just see him.Buji said he was surprised to see public response. All shows were housefull.He said,
Once the organizer tried to accommodate musicians in different low budget hotel.When Rafisahab came to know,he told the organizer that his musicians should get the same treatment and if he has any problem,he would not mind shifting to the hotel where his musicians were accommodated.
There was some type of gossip with almost all top singers but not Rafisahab.In my long carrier in film industry I never heard any body speaking against him.He was ajatshatru (person without enemy).He was not in a rat race for money.
I will tell you another small incident.

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Music director Srikant Telang was my close friend.Both of us were staying in same building. He gave music in five to six small budget films.It was his wish to record at least one song by Rafisahab.His budget was so small that it was impossible to call Rafisahab for singing.
Amar Haldipurkar was his arrenger.He said”let us aproch Rafisahab.No harm in trying”.When reached there ,his brother in law zahir opened the door.He was the one who looked after financial affair of Rafisahab.Srikant told him about limited budget.He said “look.Rafisahab charges fifteen thousands but since I know you all,I will settle for thirteen thousand”In those days this amount was not small.Srikant’s face fell. Luckily same time Rafisahab came in the hall.Zahir told him about thirteen thousands.Looking at Srikants face he said ok ! How much you can afford?With great difficulty Srikant said”Sir my total budget is seven thousands.That including studio..Musicians charges etc.I can afford only two thousand.Rafisahab immediately said OK.Dont worry about money.Asked Zahir to write down date in diary.This was nature of Rafisahab.
This was not new for Rafisahab.Years ago same thing happened with Lakshmikant Pyarelal.Only difference was he returned the money and asked to share them among themselve.
You will be surprised to know that in those dayes some top singers were getting very good payment but still they charged hundred rupees extra for petrol and driver.
When Lataji was fighting for royalty,she was expecting Rafisahab to tow in her line but rafisahab flatly refused.She stopped singing with him.
After the release of film Aradhana,it was lean period for him.Actualy Rafisahab was supposed to sing all song of Aradhana.He sang first two songs but then senior Burmanda fell ill and R.D.took over.He wanted fresh voice and rest is history.
During that period he sang many beautiful songs with other singers .
Nearly two year after Rafisahab’s death, there was a recording at Bombay lab in Dadar. Music director was Roshan. He was not the famous music director Roshan but a messenger who worked with music director Ravi. He was giving music for the first movie he got. The song was being recorded at Bombay labs – As we were waiting for the rehearsal to start,
And then Rafi sahab entered. All were shocked and there was pin drop silence. It was only after he came close that we realised that he must be Rafisahab’s brother and later it was confirmed. Until then we had no idea that Rafi sahab had a brother. Though they were not identical twins, he looked like Rafisahab. Later he sang few songs with some small time music directors but none of them released.
Today after so many years Rafisahab is still in the heart of people.He was a great artist and great human being.
Day after tomorrow on 31July all over the world his death aniversary will be observed but I am posting my tribut today on occasion of my birthday.
I am not a professional writer so there are bound to be some mistakes but I have tried to write it honestly.

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My heartfelt tribute to great singer.

Tribute to Shailendra after his demise by Jaikishen

by

Jay subramanyam

That sad Wednesday afternoon, a little after he died, the radio sang :

Aye mere dil kahin aur chal 
gham ki duniya se dil bhar gaya 
dhoondle ab koi ghar naya
“.

It was Shailendra’s own lyric from `Daag’. He, too, had just told his weary heart : “I am full of the world’s sorrows. Let me seek a new home!”.

At the nursing home where he lay, we, his close friends, tried vainly to hold back our tears. Twenty years is a long time to know anyone, particularly in the film industry where “friendships” are made and broken easily, too easily.

Twenty years ago, we – a small group of people – had started from nothing. We had dreams, and nothing else, to sustain us. We had stood together, to the surprise and possibly dismay of many, and together we had worked out a common destiny. And today, without warning, death has laid an icy hand on one of us.

Dhoond le ab koi ghar naya.”. He had done it.

For “Teesri Kasam” his own production, he had written :

Sajan re jhoot mat bolo, khuda ke paas jana hai, na haathi hai na ghoda hai, vahaan paidal his jaana hai.”

True enough. We all have to go on foot. There will be no elephants to carry us, no horses, no Impalas. Poets have to go there when the call comes and ordinary men too.

But do the poets of the world, true creative artistes, really die?

Born and brought up a man of the people, Shailendra remained that all his life. His lyrics, like he himself, were simple, and had depth. And what a variety! He could dash off a frothy love lyric, he could compose a deeply philosophical poem. He wrote of sadness, gaiety, resignation, despair, hope.

Ye poorab hai, poorab wale, har jaan ki keemat jaante hain“, he said, in the theme song of `Jis Desh Mein Ganga Behti Hai’. That was the pariot. “Awara hoon“, he sang, in a manner at once, light-hearted and serious. The song became world famous. And it was the same patriot who laughingly wrote “Mera joota hai Japani” in `Shri 420′.
 
When Shailendra joined our fold – at the time of Raj Kapoor was making “Barsaat” – it was with two lyrics he had ready – “Barsaat mein humse mile tum” and “Patli kamar hai“. He said goodbye to the R.K. Banner, again with two lyrics, for “Mera Naam Joker”. In between, from his work done not only for us – Shanker and myself – but for other composers, I can name scores of lovely lyrics, songs which have been on everyone’s lips.

By the way, Shailendra has written lyrics for all films for which my partner Shanker and I have composed the music with the exception of `College Girl’ and `Aarzoo’. In the latter film, he didn’t work with us because he was ill.

Shanker and I met Shailendra for the first time twenty years ago. Raj Kapoor introduced us at his office which was then at Famous Studios, Mahalaxmi. Shailendra had a job in the railway workshop at Parel. He wrote poetry in his spare time. One of his poems – “Jalta hai Punjab” – moved Raj Kapoor so much he wanted to put it in `Aag’. But Shailendra was then not keen on contributing lyrics to films. He later changed his mind and joined us for `Barsaat’.

The last time I ever saw him in good health was at Rajkamal studios about a month ago where I was doing some back-ground music recording. And you know what he was saying? Despite all the difficulties he had experienced in producing `Teesri Kasam’ he wanted to launch another film!

In the early days, Shailendra was living in a one room tenement at Parel. After `Barsaat’, my partner had been offered our first contract outside R.K. ( the film was Mr. Dalsukh Pancholi’s `Nagina’) and wanting to persuade Shailendra to write the lyrics, I visited him for the first time at his home. Like us, he was quite needy then, but his work caught on quickly and he became much sought after. His address had a few changes – from somewhere, Parel, to `Rim Jhim’, his own home at Khar, but all along the man himself never changed.

He was intelligent, very gentle, full of knowledge and very sensitive. His love of poetry and literature was paramount. Tagore was an early favourite as also Khalil Gibran. He was always nice company, whether you were discussing poetry or politics. He was very emotional and wept when something moved him. When he was composing a lyric, he would walk restlessly about the room. He loved writing on the beach. From the early days, he smoked incessantly – I wish he had been more careful.

He was young – only 43. Why did he have to go that early and with so much mental suffering?

In the music room of Shanker-Jaikishan at our homes where he was so welcome, there will be a void. There will be a bigger void in our hearts.

Dhoond le ab koi ghar naya…”.

 Goodbye, my friend.

`FILMFARE’ – JANUARY 20, 1967

This is courtesy : Jay Subramanyam who composed it on Jan 12, 2009 at 1:54 PM

अमर ‘जय गाथा’ – A TRIBUTE TO ‘JAIKISHAN’ JI ON HIS 82nd BIRTH ANNIVERSARY

by

 

उम्र थी सिर्फ़ १३ वर्ष की, तब से ही संगीत से लगाव था उसे … वंसदा की गलियों में घूमना फिरना, गाव में रहनेवाली गुजरिया के लोकगीत सुनना और फिर अपने दोस्तों को हुबहू सुनाना … पिताजी चल बसे तो बड़े भाई बलवंत को घर की जिम्मेदारी आ गई थी और उसकी भी … पढाई लिखाई में ज्यादह ध्यान नहीं था … ‘टेलरी’ भी की मगर दिल नहीं लगा उसका … ‘जयकिशन दयाभाई पांचाल’ फिर एक दिन चला आया सपनों की मायानगरी में …बंबई (मुंबई) हर किसी को सहारा देनेवाली नगरी …. संगीत विशारद वाडीलाल जी के शिष्य रहे जय की, ‘हारमोनियम’ पर कुशलता से उंगलिया चलती थी … ‘चंद्रवदन भट्ट’ साहब के ऑफिस में अक्सर चक्कर लगाता रहता की, कुछ ‘चक्कर’ चल जाये … वहां एक युवक से मुलाक़ात हो गयी, और फिर गहरी दोस्ती भी … उस युवक का नाम ‘शंकर सिंह रघुवंशी’ था, वह युवक भी संगीत निर्देशक बनना चाहता था …तबला ग़जब का बजाता था …उसे भी भट्ट साहब ने काम दिलाने का वादा किया था … दोनों का सपना, मक़सद एक था … फिर एक दिन उस युवक ने जय को कहा, पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम वादक की जगह खाली है क्या वहां काम करोगे ? जय ने फ़ौरन हां कहा, फिर एक नयी जिंदगी, नयी कहानी शुरू हुई, तब उन्हें भी पता नहीं था, लेकिन दिल गा रहा था …

‘कहता है दिल रस्ता मुश्किल
मालूम नहीं है कहा मंजिल’ ?

लेकिन मंजिल अब ज्यादह दूर नहीं थी … पृथ्वी थिएटर में दिन बड़े ग़ज़ब के गुजरने लगे …शंकर और जय कुछ छोटी छोटी भूमिकाएं भी निभाते नाटक में … साथ में धुनें भी बनाते … किस्मत पलटने में देर नहीं लगी … राज साहब ने १९ वर्षीय जय और २६ वर्षीय शंकर को बरसात के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी दी … और इस युवा संगीतकार जोड़ी ने पहले ही फ़िल्म में कम्माल कर दी, संगीत का नया इतिहास लिख दिया … इन दोनों के साथ दो नौजवाँ गीतकार भी थे शैलेंद्र और हसरत जयपुरी
एक आया था हैदराबाद से, एक गुजरात से, एक रेलवे में था तो एक ‘बेस्ट’ में … चारों चार दिशाओं से एक जगह आये और दसो दिशाओंमें इनका बोलबाला रहा, लगातार २० बरस तक संगीत साम्राज्य पर इन्हीं का अधिराज था …शंकर जी अपने काम पर दृढ़ विश्वास रखते थे, काम के बाद भी संगीत से जुड़े रहते तो जयभाई काम के बाद अपना समय लोगों से मिलने में गवाते …जैसे की गुजराती होते है, वैसे ही बड़े ही मिलनसार थे जय …पार्टियों में जाना …लोगों से परिचय बढ़ाना, उनकी खुशियाँ और गम में शरीक होना … जिंदगी को जिंदादिली नजरिये से देखते थे …अब शोहरत थी, इज्जत थी, इस जोड़ी का संगीत देश के कोने कोने के साथ रूस, मिडिल ईस्ट और चीन की धरती तक पहुँच गया था लेकिन शंकर जी के साथ जय के भी कदम जमीं पर थे, नए नए प्रयोग करते थे, पारंपारिक वाद्यों के साथ ‘गिटार’, ‘मेंडोलिन’, ‘अकॉर्डियन’ आदि नए वाद्यों का भी बदलते वक़्त को भांपकर इस्तेमाल करते रहे, अजरामर धुनें बनाते रहे ….
१९६४ के बिनाका गीतमाला के अंतिम सालाना प्रोग्राम में, हसरत साहब से अमिन सायानी साहब ने एक सवाल पूछा था …

‘ये कैसे पहचाने की, कौनसी धुन शंकर जी ने बनाई है और कौनसी जयकिशन साहब ने ?

हसरत साहब का जवाब यूँ था (ऑडियो क्लिप)

‘आशिक़ाना ढंग की धुनें बनाते थे ‘जयकिशन’ साब और फलसफ़ा ढंग की, क्लासिकल ढंग की धुनें बनाते थे हमारे शंकर जी’

सैकड़ों गीतों को अमर कर दिया था जय ने शंकर भाई के साथ दिन रात एक करके, कभी कभी पूरी रात बीत जाती थी गीतों की रिकॉर्डिंग में पर मुस्कुराहट कायम रहती …उन दिनों आज जैसी सुविधाएं भी नहीं थी रिकॉर्डिंग की, लेकिन संगीत की साधना करनेवाले सच्चे फनकारों को सृजन के लिए इन की जरुरत भी नहीं थी …पाश्चात्य धुनों के साथ ‘बसंत बहार’ (१९५६) में अस्सल रागदारी पर आधारित धुनें बनाकर उन्होंने ‘हम किसी से कम नहीं’ यह दिखा दिया था … सबको मुंहतोड़ जवाब दिया था …५० और ६० के दशक केवल उन्हीं के थे … SJ की इस लोकप्रियता की वजह थी, शंकर जी को जय की आजीवन समर्थ साथ … कभी कभी शंकर जी की गैरहाजिरी में जय ही संगीत की बागड़ोर संभालते और संगीत का दर्ज़ा किसी भी कीमत पर कायम रखते (फ़िल्म – आरज़ू)
‘दो जिस्म मगर एक जान है हम
एक दिल के दो अरमान है हम’
बस ऐसे ही जिये, साथ हँसे, रोयें जय साहब और शंकर जी …

राज साहब की होली भी धूमधाम से मनाते थे जय, शंकर जी के साथ तो ‘वॉर फंड’ के लिए स्टेज प्रोग्राम में भी क़दम से क़दम मिला कर खड़े रहते और सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देते रहते …
फ़िल्म संगम में राज साहब का एक संवाद है …

‘रोयें तो यार के काँधे पर
जायें तो यार के काँधे पर’

१४ दिसंबर १९६६ को अपना जिगरी यार शैलेंद्र के बिछड़ने पर कंधा देते वक़्त, रोते हुए जय और शंकर जी के साथ राज साब को भी यही संवाद याद आया होगा और फिर अपनी सफलता की चरम सीमा पर पहुंच कर १२ सितंबर १९७१ को जय भी चले गये अपनी सुरीली जीवनयात्रा समाप्त करके सिर्फ ४१ साल की उम्र में …शंकर जी के दोनों बाहूँ टूट चुके थे, पहले कविराज अब जय …
लेकिन शानदार कीर्तिमान स्थापित किये थे उन्होंने, सब कुछ हासिल कर लिया था …

‘नौ बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का ‘फ़िल्म फेयर पुरस्कार’,

‘बिनाका गीतमाला’ इस सर्वाधिक लोकप्रिय रेडियो प्रोग्राम में १३५ ‘सरताज’ गीत

१९६८ में ‘पदमश्री’ पुरस्कार

आज #जय साहब के जन्मदिन पर सभी दोस्तों के साथ उन्हें विनम्र अभिवादन !!!

Sudhakar Shahane

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Shankar The Selfless Emperor Of Music. 

A tribute by Shri Ajay Dagaonkar

Shankar
#Shankar  @ #Shanker of Shanker Jaikishen, Shankar Jaikishan, Shanker Jaikishan, Shankar Jaikishen

Shankar was from different world. He came here to give us happiness by music. He took all the pains but never uttered a word.

A man of immense pride his goals were highest like Mount Everest
A struggling young man rejects chance to become single music director for an 18 years old friend is rarest of rare event in modern world of greedWhosoever came to him became his life long associate. Be it Jaikishan: Shailendra; Hasrat: Dattaram and Sebastian

He along with Jaikishan changed the entire musical world. They made it world class but with Indian stamp . Every aspect of Navarasas of music were explored only by Shankar Jaikishan with grand success

They remain till date only one star music directors in every aspect Be it money or popularity For every noble cause from defence to aids for various society’s SJ contribution is unsupassed.

When Shailendra left Jaikishan left due to Destiny but other left for reasons other than music, anybody would have been bitter But Shankar never retaliated but answer was music

He is perhaps the only music director who had films till his last day.All duos closed with demise or leaving of one partner but not Shankar Jaikishan

We his admirers bow in respect ; love; admiration for this great music director

असावे २६ एप्रिल शंकरजी ची पुण्यतिथी. या शापित यक्षाला आदरांजली.

Main Aag Hoon
Kishore Kumar, lyricist Vitthal Bhai Patel, a guest and music director Shankar of Shankar Jaikishan at the recording of a song for film ‘Ganga Aur Geeta’ (1979). Tu Aag Hai, Main Aag Hoon, Aag ko Aag mein dhaal de is the song.

 

Vivek Puntambekar

दोस्त दोस्त ना रहा. संगम चे गाणे ऐकले की डोळ्यासमोर उभे रहातात शंकर जयकिशन जोडीतले शंकरजी.शंकरसिंग रामसिंग रघुवंशी यांचा जन्म १५ ऑक्टोबर १९२२ चा.मूळचे हे पंजाबी कुटुंब नोकरी निमित्ताने हैद्राबाद ला स्थायिक झाले.लहानपणापासून शंकरजींना दोन गोष्टी अतिशय प्रिय होत्या.एक म्हणजे कसरत करणे आणि दुसरे म्हणजे तबला शिकायचे.ख्वाजा खुर्शिद अन्वर यांच्याकडे ते तबला शिकले.तसेच कथ्थक पण शिकले.दहावी शिकल्यावर मुंबईत सिनेविश्वात काही काम मिळते का हे पहायला ते मुंबईत आले.इथे त्यांची ओळख सुप्रसिद्ध नर्तक सत्यनारायण आणि त्यांची पत्नी हेमवती यांच्याबरोबर झाली.या दोघांचे कलापथक होते.त्यात शंकरजी सामिल झाले.त्यांच्या बरोबर ते काम करु लागले. मिळालेल्या पैश्यातून त्यांनी एक सायकल विकत घेतली. त्यावरून त्यांची मुंबईत भटकंती सुरु झाली. एकदा त्यांची सायकल चोरीला गेली.सायकल चा शोध घेत ते कामाठीपुरात पोहोचले.एका कोठ्यावरून येणारे संगीताचे सूर ऐकताना त्यांना जाणवले की तबलजी चा ठेका चुकतो आहे.न रहावून ते तडक कोठ्यावर गेले.तबलजी ला म्हणाले गलत बजा रहे हो.सगळे चकीत झाले. कसलेल्या तबलजी ना सांगायची याची हिम्मत कशी झाली?संतप्त तबलजीनी आव्हान दिले तुम बराबर बजाके दिखाओ वरना मार खाना पडेगा.आव्हान स्विकारुन शंकरजीनी वाजवलेला तबला ऐकून सगळे चकीत झाले. त्यांनी शंकरजींना बक्षिस दिले.मानी स्वभावाच्या शंकरजींनी पैसे नाकारले. कोठेसे पैसा लेना मेरे असूल के खिलाफ है असे सांगून ते बाहेर पडले.काही काळ शंकरजी हुसनलाल भगतराम जोडीचे सहाय्यक बनले.सुरुवातीच्या कालखंडात त्यांच्या संगीतावर हुसनलाल भगतराम यांची छाप जाणवते ती यामुळेच. पापाजींच्या नाटक कंपनीत त्यांना सत्यनारायण घेऊन गेले.इथेच त्यांची गाठ पडली राजकपूर बरोबर.पापाजींच्या नाटक कंपनीत संगीत विभागाचे प्रमुख होते राम गांगुली. पूर्वी नाटकात मध्यंतरात तबला किंवा सतार वाजवत.शंकरजी तबला वाजवत.कसरत करायला व्यायाम शाळेत जात तिथेच त्यांची गाठ दत्ताराम वाडकर शी पडली.त्यांनी सहाय्यक म्हणून दत्ताराम ची शिफारस पापाजींकडे केली.दत्ताराम नाटक कंपनीत आल्यावर तबला वाजवायचे काम करु लागले.एकदा शहा नावाच्या निर्मात्याला शिवमहिमा सिनेमासाठी संगीतकार पाहिजे असे समजल्या वर शंकरजी भेटायला गेले.तिथे एका तरुणाकडे त्यांचे लक्ष गेले.बोटांनी त्याने ताल घरला होता.या बुज-या तरुणाशी शंकरजींनी ओळख करून घेतली.तेव्हा समजले हार्मोनियम वाजवणारा हा पण सिनेमात काम मिळते का पहायला आला होता.गुजरात च्या वालडा गावातून आलेला हा तरुण शिवडी च्या टिंबर मार्ट मधे नोकरी करत होता.या तरुणाचे नाव होते जयकिशन डाह्याभाई पांचाळ.या दोघांनाही सिनेमात काम मिळाले नाही. संध्याकाळी शंकरजी जयकिशन ना घेऊन नाटक कंपनीत आले.पापाजींनी या तरुणांना कंपनीत हार्मोनियम वादक म्हणून घेतले.इथूनच या दोघांची मैत्री सुरु झाली ती जयकिशन च्या जाण्यापर्यंत टिकली.पठाण,दिवार या नाटकात शंकरजींनी छोट्या भुमिका केल्या.हसरत जयपुरी पण नाटक कंपनीत आलेल्या. राजकपूर, हसरत, शंकर,जयकिशन यांची मैत्री जमली.राजकपूर नी शंकरजींना आश्वासन दिले होत की सिनेमा निर्मिती सुरु केल्यावर त्यांना संगीतकार म्हणून संधी देईन.पण आग च्या निर्मितीच्या वैळी अनुभवी संगीतकार हवा म्हणून राम गांगुली ना घेतले.शंकरजी निराश झाले पण राम गांगुलीचे ते सहाय्यक बनले.जोडीला होते जयकिशन. आग मधे नावाड्याच्या रोलमध्ये शंकरजी पडद्यावर दिसले.आग सिनेमा यशस्वी झाला. बरसात सिनेमाची तयारी सुरु झाली.या वेळी पण संगीत राम गांगुली कडे गेले.सहायक शंकरजी नी एक गाणे रेकॉर्ड केले.पण राजकपूर नी पास केलेली एक चाल राम गांगुली दुसऱ्या निर्मात्याला ऐकवतो आहे हे समजल्यावर संतप्त राजकपूर नी राम गांगुली ना काढून टाकले.गाणे रेकॉर्ड करणाऱ्या शंकरजींचे नाव संगीतकार म्हणून रेकॉर्ड वर छापायला सांगितले. शंकरजींनी राजकपूर कडे आग्रह धरला की जोडीला जयकिशन चे नाव पण संगीतकार म्हणून छापा.राजकपूर तयार झाले आणि शंकर जयकिशन ही संगीतकार जोडी उदयास आली.महालक्ष्मी येथल्या फेमस स्टुडियोत राजकपूर नी ऑफिस घेतले.तिथेच शैलेंद्र ची भेट शंकर जयकिशन बरोबर झाली. शंकरजी नी तयार केलेल्या चालीवर शैलेंद्र नी शीर्षक गीत (टायटल सॉंग) आणि पतली कमर है ही दोन गीते लिहीली. राजकपूर नी शंकर जयकिशन या जोडीला ,हसरत जयपुरीना दरमहा पगारावर नेमले.आधी शैलेंद्र तयार नव्हते पण राजकपूर नी अनेकदा विनवणी केल्यावर तयार झाले. अश्या रितीने शैलेंद्र, हसरत,शंकर जयकिशन अशी चौकडी जमली जिने सिने संगीताला एका वेगळ्या उंचीवर नेले.बरसात रिलीज झाला तुफान लोकप्रिय झाला. रसिक खुळावले.शंकरजींनी जयकिशन बरोबर अलिखित करार केला.यापुढे कायम एकत्र काम करायचे.जे मिळेल ते एकत्र वाटून घ्यायचे आणि कोणती चाल कोणाची हे कधीच दुनियेला कळता कामा नये.आवारा रिलीज होईपर्यंत एकही बाहेरचा सिनेमा या जोडीने घेतला नाही. राजकपूर नी ओळखले ही जोडी जबरदस्त आहे यांना फक्त आर.के.फिल्म बरोबर बांधून ठेवणे चुकीचे आहे.त्यांनी उदारपणे या जोडीला बाहेरचे सिनेमे घ्यायची परवानगी दिली. एकच अट घातली की ज्या चाली तुम्ही कराल त्या आधी मला ऐकवायच्या.ज्या चाली मला आवडतील त्या माझ्या. नेहमी टायटल सॉंग शैलेंद्र लिहीत आणि शंकरजी त्याला चाल लावीत.पार्श्वसंगीत जयकिशन तयार करत.पण अनेक सिनेमात हाच प्रकार उलट असे.शंकरजी गंभीर स्वभावाचे त्यामुळे शैलेंद्र त्यांचे आवडते, जयकिशन रोमँटिक स्वभावाचे त्यामुळे हसरत त्यांचे आवडते असे असले तरी दोघांनी ही या दोघा गीतकारांबरोबर काम केले.वयाने मोठे असल्याने ऑर्केस्ट्रा अँरेजमेंट शंकरजी ठरवत आणि सँबेस्टियन आणि दत्ताराम कडून गाण्याला साज चढवत.मनमिळावू स्वभावाचे जयकिशन इतर निर्मात्यांशी संपर्क साधत किंवा व्यहवार तेच ठरवत असा गैरसमज आहे.तसे नव्हते अतिंम शब्द शंकरजींचा असे.शंकरजी कडक स्वभावाचे, फटकळ शीघ्रकोपी होते.पण त्यांचा राग लगेच शांत होत असे.यामुळे त्यांच्या विषयी गैरसमज होत असत.पण कामात ते अतिशय एकनिष्ठ होतो. रेकॉर्डिंग च्या दिवशी बरोबर सकाळी सात वाजता त्यांची गाडी आत शिरायची.आत शिरल्यावर त्यांच्या हस्ते पुजा झाल्यावर ते नारळ फोडून रिहर्सल सुरु करत.नऊ वाजता गायक आल्यावर १२ वाजेपर्यंत रिहर्सल सुरू व्हायची.मग छोटी विश्रांती घेऊन दिड वाजता फायनल टेक सुरू होऊन अडीच पर्यंत रेकॉर्डिंग पुर्ण होत असे.उशिरा आलेल्या वादकाला त्या दिवशी संधी देत नसत.एक वादक उशिरा आला.शंकरजी नी राग शांत झाल्यावर कारण विचारले तेव्हा समजले त्याच्याकडे घड्याळ विकत घेण्यासाठी पैसेच नव्हते. लगेच शंकरजींनी आपले मनगटी घड्याळ काढून त्याला दिले.सिनेक्षेत्रात शंकर जयकिशन चलनी नाणे होते.त्यांच्या नावावर सिनेमे विकले जात. नायकापेक्षा ही जास्त मानघन त्यांना मिळायचे.प्रत्येक गायकाची रेंज त्यांना अचूक ठाऊक होती.मुकेश च्या आवाजाच्या मर्यादा माहिती असल्याने चोरीचोरी मधली राजकपूर च्या तोंडची सगळी गाणी मन्ना डे कडून गाऊन घेतली.निर्माता मयप्पन बरोबर वाद झाला त्याला हा बंगाली पसंत नव्हता.रागात शंकरजी मन्ना डे आणि वादकांसकट रेकॉर्डिंग हॉल च्या बाहेर पडले.मयप्पन घाबरला कारण शंकर जयकिशन नी सिनेमा सोडला तर कोणीच संगीतकार जवळ करणार नाही याची खात्री त्या काळात होती.राजकपूर च्या मध्यस्थीने मन्ना डे च्या आवाजात गाणी रेकॉर्ड झाली आणि आजतागायत लोकप्रिय आहेत.चोरीचोरीतल्या रसिक बलमा गाण्याला फिल्म फेअर मिळाले नाही म्हणून नाराज झालेल्या लतादिदींना चौपाटीवर नेऊन त्यांचे आवडते आईसक्रीम देऊन त्यांची समजूत शंकरजींनी काढली.इतके त्यांचे स्नेहपुर्ण संबंध त्या काळी होते.अनाडी च्या तेरा जाना गाण्याच्या रेकॉर्डिंग ला हजर असलेल्या सी.रामचंद्र यांनी सोलो व्हायोलिन च्या ऐवजी लतादिदींचा आलाप वापरायची सूचना शंकरजींनी खिलाडू पणे मान्य केली.त्यामुळे या गाण्यातला आर्त परिणाम आपल्या काळजात घुसतो.गमंत म्हणजे अनाडी च्या आधी काही काळ एकही सिनेमा शंकर जयकिशन कडे नव्हता. पण त्यांचे वादक त्यांना सोडून गेले नाही. रोज नियमित पणे रिहर्सल करून शेकडो चाली त्यांनी रचल्या आणि त्या जोरावर पुढचे एक तप त्यांनी रसिकांच्या मनावर राज्य केल्याचे शंकरजींनी मुलाखतीत सांगितले होते.जयकिशन वर तर त्यांचे लहान भावासारखे प्रेम होते.पल्लवी मढीवाला बरोबर जयकिशन चा विवाह झाला. घरच्या विरोधाने तिचे कन्यादान करायला नकार दिल्याने शंकरजींनी स्वतः तिचे कन्यादान केले.शंकरजींच्या आयुष्यात आली कुंदन काळे.एका प्रतिष्ठित सरदार धरातली.नव-या बरोबर फारकत घेतलेली.तिच्याबरोबर लिव इन रिलेशनशिप मधे शंकरजी राहू लागले. पण हा संसार त्यांना खूपच त्रास देऊन गेला.पण तिच्या संपर्कात आल्यावर शंकरजी मराठी शिकले .सोनोपंत दांडेकर यांच्याशी शंकरजींचा परिचय झाला. ते नियमितपणे वारीला जात.दरवर्षी दहा हजार रुपयांची देणगी देत.तसा बोर्ड आळंदीला लावला आहे.सोनोपंत गेल्यावर त्यांच्या अंत्ययात्रेत शंकरजी पुणे ते आळंदी पायी चालत सामिल झाले होते.संगम च्या वेळी लतादिदीं बरोबर झालेल्या वादामुळे त्या शंकरजीं पासून दूरावल्या.या जोडीत फूट पाडायचे प्रयत्न याच सुमारास झाले. फिल्म फेअर नाईट नंतर जयकिशन नी आपआपसातला अलिखित करार मोडून ये मेरा प्रेमपत्र ची चाल आपली असल्याचे जाहीर केले.यामुळेच शंकरजी दुखावले.यातच शारदा त्यांच्या जीवनात आली. वास्तविक शारदा राजकपूर यांचे फाईंड.घरच्या परिस्थिती ने तंगलेले शंकरजी शारदाकडे ओढले गेले.तिलाच ते प्राधान्य देऊ लागले.यातूनच त्यांच्यात आणि जयकिशन मधे दुरावा आला.१९६६ ला शैलेंद्र गेला.शंकरजींचा मित्र गेला.शंकरजी बरोबरच्या वादामुळे लतादिदींनी मेरा नाम जोकर साठी गायला नकार दिला.ढिसाळ संकलनामुळे जोकर दणदणीत आपटला.कल आज और कल अर्धवट असताना सिरोसिस ने जयकिशन गेला.कल आज और कल चे पार्शसंगीत करताना रणधीर बरोबर त्यांचा वाद झाला. रणधीर ने तिखटमिठ लावून राजकपूर कडे तक्रार केली.राजकपूर नी शंकरजींना दूर केले.पंचवीस वर्षाची दोस्ती क्षणात संपली.जयकिशन गेल्यावर त्यांचे अनेक सिनेमे अर्धवट राहिले.त्यातला एक होता लाल पत्थर.निर्मीता फकीरचंद ने शंकरजींचे दहा हजार रुपये बुडवले होते.त्यामुळे शंकरजींकडे जायची त्याला हिम्मत नव्हती नाईलाजाने तो शंकरजींकडे गेला.शंकरजींनी दुपारी सिटींग रूमवर बोलावलं. शिव्या घालून तयार केलेली चाल ऐकवली.चाल सरस होती.गपचुप दहा हजार रुपये देऊन आपला सिनेमा पुर्ण करायची विनंती फकीरचंद नी केली.या चालीवरचे सरस गाणे होते गीत गाता हू मै .जरी पार्श्वसंगीताची बाजू जयकिशन संभाळायचे तरी काही वेळा शंकरजी पण तितक्याच ताकदीने पार्श्वसंगीत करत.संगम च्या वेळी जयकिशन आजारी होते म्हणून एकट्या शंकरजींनी चार दिवसात संगम चे पार्श्वसंगीत पुर्ण केले.शंकर जयकिशन चे चहाते अभ्यासक प्रो.गावंड यांना शंकरजींचा सहवास लाभला होता.त्यांनी सांगितलेली आठवण अँन इव्हिनिंग इन पँरिस च्या वेळची.शंकरजींच्या आईचे निधन झाले. अंत्यविधी आटोपून ते मुंबईत आले.वादकांना संघ्याकाळी म्युझिक रुमवर बोलावले.निर्माते शक्ति सामंत पण आले.दु:खद मनस्थितीत शंकरजी काय सांगणार कोणालाच माहीत नव्हते.सगळे जमल्यावर शंकरजी नी रुमवर अंधार केला.पियानो वर मेणबत्ती लावली आणि रात के हमसफर गाण्याची चाल ऐकवली.सगळे चकीत झाले. दु:खी मनस्थितीत असतानाही निर्मात्याचे नुकसान होऊ नये या भावनेतून शंकरजी नी लगेच काम सुरू केले होते.आम्रपाली च्या वेळी वैजयंती माला नडली.नील गगन की छाओमे गाण्यावर नाचता येणे अवघड आहे असे तिने सांगितले. कथ्थक शिकलेल्या शंकरजींनी पायात चाळ बांधून त्या चालीवर नाचून दाखवले. मुकाट्याने वैजयंती माला ने नाच केला.साथीदार गेल्यावर संगीताची धुरा तितक्याच ताकदीने संभाळणारे शंकरजी हे एकमेव उदाहरण.शंकर जयकिशन याच नावाने ४० सिनेमे जयकिशन गेल्यावर त्यानी कंपोज केले.महमंद रफि यांच्या मध्यस्थीने लतादिदी आणि शंकरजी यांच्यातला दुरावा संपला.सन्यासी ची शंकरजींनी कंपोज केलेली गाणी गाऊन त्या वर्षीचे फिल्मफेअर लतादिदींना मिळाले.पण त्या सुमारास फिल्म संगीतात घाणेरडे राजकारण शिरले.शंकरजी ना वादकाचा ताफा कमी करायला लावला.निर्मात्यांची हाजी हाजी करणे त्यांच्या रक्तात नव्हते.त्यांच्या नावावर सिनेमे विकले जायचे दिवस संपले.नमकहराम चे संगीत आधी शंकरजी देणार होते पण वितरक मिळणे कठीण आहे हे समजल्यावर त्यांनी स्वतः आर.डी.चे नाव सुचवले. शोलेची स्किन मधे पानभर जाहिरात आली होती त्यात संगीत शंकर जयकिशन असा उल्लेख आहे.नंतर तो सिनेमा आर.डी.कडे.गेला.सत्यम शिवम सुंदरम च्या वेळी सगळा अपमान गिळून आर.के.स्टुडिओत गेले पण राजकपूर नी त्यांची दखल सुध्दा घेतली नाही.२६ एप्रिल १९८७ ला शंकरजी गेले.ते कसे गेले हे मात्र गूढ आहे.त्या दिवशी फेमस मधे रेकॉर्डिंग ठरले होते.वादक आले होते.शारदा पण आली होती.नेहमीच सात वाजता येणारे शंकरजी १२ वाजेपर्यंत का आले नाहीत म्हणून त्यांचे अनेक वर्षाचे सहकारी चंद्रकांत भोसले धरी गेले तेव्हा समजले शंकरजी गेले.इतकेच नाही तर घाईघाईने चंदनवाडीत त्यांचा अंत्यसंस्कार उरकला.धरी पुजेला येणा-या ब्राह्मणाला पण लगेचच काढून टाकले. शंकर जयकिशन हे शापित यक्ष होते.भूतलावरचे काम संपले म्हणून नियतीने क्रूरपणे यांना वर बोलावले असावे.२६ एप्रिल शंकरजी ची पुण्यतिथी. या शापित यक्षाला माझी आदरांजली.

शब्दांकन विवेक पुणतांबेकर.

Shri Srigopal Shroti’s tribute to Shankar Jaikishan

36th episode

HASRAT JAIPURI

 

 TIME is like a river water which flows forward bur never comes back….but in our memories’s river, there are the enchanting remembrances of 50s,60s,70s when and till now we hum the indispensable musical scores created by the great brains of the S-J duo, and they come back again and again as though the duo are telling us that physically they are not with us but their immortal scores will reside in our souls….and as is said in Geeta that the soul never dies and the duo mingled with our souls to tell the story of their successful years when they reigned the film industry in their heydays and till date we are stuck to their songs.. we are obliged to radios, which daily play their songs in one programme or the other…….. AND reverred Hasrat Jaipuri continues that it was the contrast in their temperaments which bound the two and they had respect for each other as the two brothers have, which was evident in their compositions, and till date, when many things are revealed, still it is difficultto find out who tuned which song, such was the similarity in their temperaments to have different orchestration, but the tunes somewhere echoed Shankar and Jaikishan together which the then music directors too agreed and had respect for each other….. HASRAT continues that when Raj saab was going to London to process ”Sangam”, he wanted to take all of us, but we just cud not think of going because of work pressure. Thereupon, JAI asked Shankar and all of us to go with Raj saab assuring that he wud hold the fort here. NEXT time came whan Ramanand Sagar wanted to take us to Paris for his film, Shankar said that u people go with Sagar, and i will manage here. and even in later years when their individual reputation came under doubts, there was a lot of give and take. On Shankar, Hasrat goes on that he was the fastest composer of our time. He cud compose a beautiful tune in a matter of minutes. He was a spontaneous composer to whom tunes came in a torrent…..both lived for music….and if there was one Jaikishan so there was one Shankar and both were like two knots of a musical rope……..to continue……… 

(to read Shrotiji’s other episodes on this subject please visit http://shankerjaikishen.blogspot.com

Taken from 33rd episode of Tribute to Shankar-Jaikishan by Srigopal Shroti

 

RAGS TO RICHES v/s TALENT

 

 

 

OPN tuned ”ye hai Bombay, ye hai Bombay meri jaan”…..in CID….it gives enough opportunities to the struggler…and there are hundreds of examples when Bombay made them from rags to riches but not sans talent……i am writing about the great duo of Hindi Film Industry, who also went from rags to riches exploiting their inborn talent….and these facts are not known to the general public of that time and today also excepting their ardent followers….

 

”BAKAUL HASRAT SAAB, ”WE WERE AT THE BEGINNING OF OUR CAREERS AND NONE OF US (S-J, SHAILENDRA AND HASRAT),WAS RICH ENOUGH TO AFFORD TAXIES AND CARS. WE WUD ALL MEET AT CHOWPATTI AND WALK TO CHURCHGATE TO CATCH A TRAIN. AS WE WALKED WE WUD DECIDE WHERE TO EAT THAT DAY….ONE DAY IT WUD BE A THALI AT THE PUROHIT AT CHURCHGATE, THE NEXT DAY DEPENDING UPON OUR RESOURCES  IT CUD BE A MEAL AT WAYSIDE ‘DHABA’, AND WE WUD POOL IN TO MEET THE BILL. …..BUT IF SHANKAR HAD MONEY ON HIM, HE WUD WITHOUT A SECOND THOUGHT, PICK UP THE BILL AND PAY FOR ALL OF US. ….IT WAS SHANKAR’S GENEROUS NATURE.”

 

AGAIN HE NARRATED ABOUT SHANKARJI’S MAGNANIMITY…..”WHENEVER LATAJI SANG FOR S-J COMPOSITION TO HIS SATISFACTION, SHANKARJI WUD HABITUALLY PRESENT HER WITH A HUNDRED RUPEE NOTE.  ….AND LATAJI, AS I REMEMBER, WUD CONSIDER IT THE ULTIMATE COMPLIMENT TO HER ARTISTRY FROM ONE WHO KNEW MUSIC INSIDE OUT”’……THE MEMORIES GO ”SHANKAR WAS THE FIRST AMONGST US TO BUY A CAR. WE WUD ALL PILE INTO IT AND DRIVE AROUND TOWN, JUST FOR A LARK”….IN HASRAT’S OPINION SHANKARJI HAD LESS NEGATIVE POINTS…..BUT INDUSTRY AND OTHER PEOPLE’S EGO MAY HAVE MADE HIM A HARD NUT LATER, WHICH WAS NATURAL FOR A MAN LIKE HIM WHO WAS AGAINST COMPROMISES ALL THE TIME..

 

AND WHAT I HAD GONE THRO’ A LONG BACK THAT DURING THIS CAR DRIVE, JAIKISHAN SAW SOME BEAUTIFUL GIRLS PASSING BY, AND HE SAW THEM TURNING AROUND….AND SHAILENDRA DID HIS IMAGINATION FLOAT TO ”MUD MUD KE NA DEKH, MUD MUD KE”, WHICH WAS A SUPER -DUPER HIT FROM ”SHRI 420” TUNED BY JAIKISHAN…AND MANNADA AND ASHAJI GAVE VOICE TO IT ALONGWITH AN ELEGANT CHORUS…..AND UNMATCHABLE TRUMPETS

gshroti@in.com……….