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आ अब लौट चलें … कैसे गूँजा शंकर जयकिशन का शानदार आर्केस्ट्रा? Aa Ab Laut Chalein

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http://www.ek-shaam-mere-naam.in/2018/06/aa-ab-laut-chalein.html

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पुराने हिंदी फिल्मी गीतों में अगर आर्केस्ट्रा का किसी संगीतकार ने सबसे बढ़िया इस्तेमाल किया तो वो थे शंकर जयकिशन। हालांकि उनके समकालीनों में सलिल चौधरी और बाद के वर्षों में पंचम ने भी इस दृष्टि से अपने संगीत में एक अलग छाप छोड़ी। पर जिस वृहद स्तर पर शंकर जयकिशन की जोड़ी वादकों की फौज को अपने गानों के लिए इक्ठठा करती थी और जो मधुर स्वरलहरी उससे उत्पन्न होती थी उसकी मिसाल किसी अन्य हिंदी फिल्म संगीतकार के साथ मिल पाना मुश्किल है। शंकर जयकिशन का आर्केस्ट्रा ना केवल गीतों में रंग भरता था पर साथ ही इस तरह फिल्म के कथानक के साथ रच बस जाता था कि आप फिल्माए गए दृश्य से संगीत को अलग ही नहीं कर सकते थे।

मिसाल के तौर पर फिल्म  “जिस देश में गंगा बहती है” के इस सदाबहार गीत आ अब अब लौट चलें को याद कीजिए। 1960 में बनी इस फिल्म का विषय चंबल के बीहड़ों में उत्पात मचा रहे डाकुओं को समाज की मुख्यधारा में वापस लौटाने का था। इस फिल्म के निर्माता थे राज कपूर साहब। राजकपूर की फिल्म थी तो शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश और लता जैसे कलाकारों का जुड़ना स्वाभाविक था। कुछ ही दिनों पहले सोशल मीडिया पर शैलेंद्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेंद्र ने इस फिल्म से जुड़ी एक रोचक घटना सब के साथ बाँटी थी। दिनेश शंकर शैलेंद्र के अनुसार

“राजकपूर ने फिल्म की पटकथा बताने के लिए शंकर, जयकिशन, हसरत और मुकेश को आर के स्टूडियो के अपने काटेज में बुलाया था। राजकपूर ने  फिल्म की कहानी जब सुनानी खत्म की तो कमरे में सन्नाटा छा गया। अचानक शंकर ने चाय का कप टेबल पर दे मारा और गाली देते हुए उस ठंडे, धुँए भरे कमरे से बाहर निकल गए। सारे लोग उनके इस व्यवहार पर चकित थे। फिर राजकपूर ने शैलेंद्र से कहा कि जरा देखो जा के आख़िर पहलवान* को क्या हो गया? कहानी पसंद नहीं आई? शैलेन्द्र शंकर के पास गए और उनसे पूछा कि मामला क्या है? शंकर ने गालियों की एक और बौछार निकाली और फिर कहा कि डाकुओं की फिल्म में भला संगीत का क्या काम है? बना लें बिन गानों की फिल्म, हमें यहाँ क्यूँ बुलाया है? शैलेंद्र ने उन्हें समझाया कि इस फिल्म में भी गाने होंगे। सब लोग वापस आए और कहानी के हिसाब से गीतों के सही स्थान पर विचार विमर्श हुआ और अंततः फिल्म के लिए नौ गाने बने।”

(*संगीतकार बनने से पहले शंकर तबला बजाने के साथ साथ पहलवानी का हुनर भी रखते थे 😊।)

तो बात शुरु हुई थी शंकर जयकिशन की आर्केस्ट्रा पर माहिरी से। आ अब लौट चलें के लिए शंकर जयकिशन ने सौ के करीब वायलिन वादकों को जमा किया था। साथ में कोरस अलग से। हालत ये थी कि तारादेव स्टूडियो जहाँ इस गीत की रिकार्डिंग होनी थी में इतनी जगह नहीं बची थी कि सारे वादकों को अंदर बैठाया जा सके। लिहाजा कुछ को बाहर फुटपाथ पर बैठाना पड़ा था। कहा जाता है कि इस गीत कि रिहर्सल डेढ़ दिन लगातार चली और इसीलिए परिणाम भी जबरदस्त आया।

आर्केस्ट्रा में बजते संगीत को ध्यान में रखते हुए निर्देशक राधू कर्माकर ने गीत की रचना की थी। ये गीत फिल्म को अपने अंत पर ले जाता है जब फिल्म का मुख्य किरदार डाकुओं को आत्मसमर्पण करवाने के लिए तैयार करवा लेता है। गीत में एक ओर तो डाकुओं का गिरोह अपने आश्रितों के साथ लौटता दिख रहा है तो दूसरी ओर पुलिस की सशंकित टुकड़ी हथियार से लैस होकर डाकुओं के समूह को घेरने के लिए कदमताल कर रही है। निर्देशक ने पुलिस की इस कदमताल को वायलिन और ब्रास सेक्शन के संगीत में ऐसा पिरोया है कि दर्शक संगीत के साथ उस दृश्य से बँध जाते हैं। संगीत का उतर चढाव भी ऐसा जो दिल की धड़कनों के  साथ दृश्य की नाटकीयता को बढ़ा दे। वायलिन आधारित द्रुत गति की धुन और साथ में लहर की तरह उभरते कोरस को अंतरे के पहले तब विराम मिलता है जब हाथों से तारों को एक साथ छेड़ने से प्रक्रिया से शंकर जयकिशन हल्की मधुर ध्वनि निकालते हैं। इस प्रक्रिया को संगीत की भाषा में Pizzicato कहते हैं। इस गीत में Pizzicato का प्रभाव आप वीडियो के 39 से 45 सेकेंड के बीच में सुन सकते हैं।

गिटार की धुन के साथ गीत गीत आगे बढ़ता है।  मुकेश तो खैर राजकपूर की शानदार आवाज़ थे ही, अंतरों के बीच कोरस के साथ लता का ऊँचे सुरों तक जाता लंबा आलाप गीत का मास्टर स्ट्रोक था। इस गीत में लता जी की कोई और पंक्ति नहीं है पर ये आलाप इतनी खूबसूरती से निभाया गया है कि पूरे गीत के फिल्मांकन में जान फूँक देता है। गीतकार शैलेंद्र की खासियत थी कि वो बड़ी सहजता के साथ ऐसे बोल लिख जाते थे जो सीधे श्रोताओं के दिल को छू लेते थी। गलत राह पे चलने से नुकसान की बात हो या समाज द्वारा इन भटके मुसाफ़िरों को पुनः स्वीकार करने की बात, अपने सीधे सच्चे शब्दों से शैलेंद्र ने गीत में एक आत्मीयता सी भर दी है। उनका दूसरे अंतरे में बस इतना कहना कि अपना घर तो अपना घर है आज भी घर से दूर पड़े लोगों की आँखों की कोरें गीला कर देगा।

आ अब लौट चलें, आ अब लौट चलें

नैन बिछाए बाँहें पसारे तुझको पुकारे देश तेरा

आ जा रे – आ आ आ

सहज है सीधी राह पे चलना

देख के उलझन बच के निकलना

कोई ये चाहे माने न माने

बहुत है मुश्किल गिर के संभलना

आ अब लौट चलें …

आँख हमारी मंज़िल पर है

दिल में ख़ुशी की मस्त लहर है

लाख लुभाएँ महल पराए

अपना घर फिर अपना घर है

आ अब लौट चलें …

इतना मधुर संगीत संयोजन करने के बाद भी ये गीत उस साल के फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नामांकित नहीं हुआ। इसके संगीत संयोजन के बारे में शंकर जयकिशन पर आरोप लगा कि उनकी धुन उस समय रिलीज़ हुए इटालवी गीत Ciao Ciao Bambina से मिलती है। अगर आप वो गीत इटालवी में सुनें तो शायद ही आप इस साम्यता को पकड़ पाएँ। पर अलग से उस धुन सुनने के बाद तुझको पुकारे देश मेरा वाली पंक्ति गीत की धुन से मिलती दिखती है। पर इस हल्की सी प्रेरणा को नज़रअंदाज करें तो जिस तरह गीत को शंकर जयकिशन ने कोरस और लता के आलाप के साथ आगे बढ़ाया है वो उनके हुनर और रचनात्मकता को दर्शाता है।

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वैलेंटाइन के दौर में आज एक अनूठे प्यार की यादें !!! ‘दिल एक मन्दिर’

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लेखक

श्री शिव शंकर गहलोत

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा 
बीते ना मिलन की बेला…

जिंदगी और मौत के बीच खतरनाक जंग जारी थी और मरणासन्न पड़े हुए राजकुमार की बीवी मीना कुमारी मौत को इतने करीब से देखकर बेहद घबड़ायी हुई थी । और उस पर थोड़ी बची जिंदगी मे पति की आखिरी बार दुल्हन के वेश मे देखने की ख्वाहिश । शायद वो अपने जीवन के बेहतरीन लमहे को मरने से पहले एक बार देखना चाहता था । एक तरफ मौत का मंज़र और दूसरी तरफ सुहागरात का दृश्य । इस सिचुएशन पर गाना बनाना कितना मुश्किल था। पर शंकर जयकिशन तो संगीत के जादूगर थे ही जो इस मुश्किल को आसान बना सकते थे । मेरा विचार है कि दोनो श्रीधर पर बेहद ही मेहरबान थे या कहूँ कि उसकी 30 दिन मे पूरी फिल्म बनाने की कयावद पर जी जान से फिदा थे तो गलत नही होगा । शैलेन्द्र ने गीत लिखा-

“रुक जा रात ठहर जा रे चंदा,
बीते ना मिलन की बेला,
आज चांदनी की नगरी में,
अरमानों का मेला”

“पहले मिलन की यादें लेकर,
आई है ये रात सुहानी,
दोहराते हैं फिर ये सितारे,
मेरी तुम्हारी प्रेम कहानी ।

कल का डरना,
काल की चिंता,
दो तन हैं मन एक हमारे,
जीवन सीमा से आगे भी,
आऊँगी मै संग तुम्हारे

शैलेन्द्र ने ये गीत लिखा जो सुहागरात के लिये उचित था और रात को भी सुहानी बताया गया था । अब जिम्मेदारी थी शंकर जयकिशन की मौत का मंजर गीत मे भरने की । तो जब लता ने शब्द “रुक जा रात ठहर जा रे चंदा” खिड़की से झांकते चांद को बोलती है तो लगता है मौत के मंज़र से खौफज़दा मीना कुमारी का कलेजा हलक के बाहर निकल जायेगा । बोल तो सुहागरात के थे पर स्वर मे खौफ था मौत के मंज़र का । शंकर जयकिशन ने लता को ग़ज़ब सुर दिया और लता ने बहुत बेहतरीन निभाया । शैलेन्द्र ने पत्नि के मुख से मरणासन्न पति को दिलासा भी दिलवाया ‘जीवन सीमा से आगे भी आऊँगी मै संग तुम्हारे’ । ये स्थापित हिन्दु मान्यता के अनुरूप ही था कि स्त्री पुरुष का संबंध जनम जनम का है और मृत्यु महज़ एक पड़ाव है ।
मरणासन्न पति पत्नि से वचन मांगता है कि वो उसकी मृत्यु के बाद अपने प्रेमी से शादी कर लेगी । पर एक भारतीय पत्नि के लिये तो ये सुनना भी पाप था । अब बारी थी हसरत जयपुरी साहब की जिन्होंने यहाँ जो गीत लिखा वो एक भारतीय पतिव्रता नारि की मन:स्थिति, मन की पीड़ा, उसके अन्तर्मन की आवाज़ और गुजरी घटनाओं की परिणति का खुलासा बयान कर दिया गया । ये गीत स्थापित हिन्दु मान्यताओं की स्थापित मर्यादाओं में ही बंधा था और हसरत जयपुरी मै समझता हूँ यहाँ बिल्कुल शैलेन्द्र के अवतार में नज़र आये ।

हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे हैं खो बैठे,
तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ,
भूल जाओ
हम तेरे प्यार में…..

पंछी से छुड़ाकर उसका घर,
तुम अपने घर पर ले आए
ये प्यार का पिंजरा मन भाया,
हम जी भर-भर कर मुस्का ए
जब प्यार हुआ इस पिंजरे से,
तुम कहने लगे आजाद रहो
हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा,
तुम अपनी जुबां से ये न कहो
अब तुम सा जहां में कोई नहीं है,
हम तो तुम्हारे हो बैठे
तुम कहते हो कि…..

इस तेरे चरण की धूल से हमने,
अपनी जीवन माँग भरी
जब ही तो सुहागन कहलाई,
दुनियां के नजर में प्यार बनीं
तुम प्यार की सुन्दर मूरत हो,
और प्यार हमारी पूजा है
अब इन चरणों में दम निकले,
बस इतनी और तमन्ना है
हम प्यार के गंगाजल से बलम जी,
तन मन अपना धो बैठे
तुम कहते हो कि…..

सपनों का दर्पण देखा था,
सपनों का दर्पण तोड़ दिया
ये प्यार का आँचल हमने तो,
दामन से तुम्हारे बाँध लिया
ये ऐसी गाँठ है उल्फत की,
जिसको न कोई भी खोल सका
तुम आन बसे जब इस दिल में,
दिल फिर तो कहीं ना डोल सका
ओ प्यार के सागर हम तेरी
लहरों में नाव डुबो बैठे
तुम कहते हो कि…

एक भारतीय पतिव्रता स्त्री कैसे शादी से पहले के प्यार को त्याग कर अपनी जीवन धारा को एक निश्चित राह पर मोड़कर अपनी मर्यादाओं का पालन करके प्रसन्न रहती है ये कितने खूबसूरत शब्दों में लिखा हसरत साहब ने कि देखते ही बनता है ।

पर कहानी दिल एक मंदिर की यहीं खतम नही होती । एक और गीत था जो बचपन की अठखेलियों के बीच मौत के मंज़र से दो चार होता है । पर इस बार शंकर जयकिशन ने अपना विश्वास सुमन कल्याणपुर पर जताया । गीत था “जूही की कली मेरी लाडली”। गीत तो शैलेन्द्र ने लिखा जो मां और बेटी के वात्सल्य को ही प्रदर्शित करता है। पर मौत का खौफ फजांओं में था और बच्ची पर मौत का साया मंडरा रहा था । इसी मौत के खौफ को व्यक्त किया गीत की एक लाइन ने “ओ आस किरन जुग जुग तू जिये” । जब सुमन कल्याणपुर ने स्वर को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचाया तो उसमे प्रार्थना थी ऊपरवाले से जो स्पष्ट सुनी जा सकती थी । । ऐसा लगा वहाँ सुमन कल्याणपुर लता के समकक्ष जा खड़ी हुई । और इस तरह शंकर जयकिशन ने लता शैलेन्द्र सुमन के साथ मिलकर संगीत के स्वर्णिम काल के इतिहास में एक पन्ना स्वर्ण अक्षरों से लिखा ।

श्रीधर साहब के पास फिल्म दिल एक मन्दिर के प्रेम त्रिकोण का हल तो नही था इसलिये राजेन्द्र कुमार की मृत्यु दिखाकर अपना रास्ता आसान कर लिया । शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी साहब ने अपने इन दो गीतों में इस प्रेम त्रिकोण से उपजी समस्याओं का न सिर्फ गहन अध्ययन गीतों में दिया बल्कि सही हल भी सुझाया। पति पत्नि के संबंधों को शादी से पूर्व के प्रेम से कहीं ऊँचा दर्जा दिया ।

शंकर जयकिशन के संगीत ने फिल्म को पूर्णता प्रदान की । दिलों में उठ रहे भावनाओं के तूफानों को पार्श्व संगीत और गानों के प्रील्यूड और इन्टरल्यूड संगीत के द्वारा पूरी फिल्म में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया । जिस हिन्दु दर्शन को फिल्म में अधूरा छोड़ दिया गया था उसे हसरत शैलेन्द्र ने अपने गीतों में पूरा किया ।

फिल्म दिल एक मन्दिर और उसका संगीत हमारे मानस पटल पर आज पांच दशकों के बाद भी छपा हुआ है ।

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Feature entitled ‘Saat Suron Ka Saath’ written by Harish Tiwary of Madhuri (ALL EPISODES)

CourtesyShrikant Deshpande

SHRIKANT DESHPANDE

 

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17TH  Page of  Feature  entitled 'Saat Suron Ka Saath' written by Harish Tiwary of Madhuri (9TH & LAST EPISODE)
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18TH & FINAL  Page of  Feature  entitled 'Saat Suron Ka Saath' written by Harish Tiwary of Madhuri (FINAL  & LAST EPISODE)
18TH & FINAL Page of Feature entitled ‘Saat Suron Ka Saath’ written by Harish Tiwary of Madhuri (FINAL & LAST EPISODE)