Tag Archives: shridhar

वैलेंटाइन के दौर में आज एक अनूठे प्यार की यादें !!! ‘दिल एक मन्दिर’

.

लेखक

श्री शिव शंकर गहलोत

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा 
बीते ना मिलन की बेला…

जिंदगी और मौत के बीच खतरनाक जंग जारी थी और मरणासन्न पड़े हुए राजकुमार की बीवी मीना कुमारी मौत को इतने करीब से देखकर बेहद घबड़ायी हुई थी । और उस पर थोड़ी बची जिंदगी मे पति की आखिरी बार दुल्हन के वेश मे देखने की ख्वाहिश । शायद वो अपने जीवन के बेहतरीन लमहे को मरने से पहले एक बार देखना चाहता था । एक तरफ मौत का मंज़र और दूसरी तरफ सुहागरात का दृश्य । इस सिचुएशन पर गाना बनाना कितना मुश्किल था। पर शंकर जयकिशन तो संगीत के जादूगर थे ही जो इस मुश्किल को आसान बना सकते थे । मेरा विचार है कि दोनो श्रीधर पर बेहद ही मेहरबान थे या कहूँ कि उसकी 30 दिन मे पूरी फिल्म बनाने की कयावद पर जी जान से फिदा थे तो गलत नही होगा । शैलेन्द्र ने गीत लिखा-

“रुक जा रात ठहर जा रे चंदा,
बीते ना मिलन की बेला,
आज चांदनी की नगरी में,
अरमानों का मेला”

“पहले मिलन की यादें लेकर,
आई है ये रात सुहानी,
दोहराते हैं फिर ये सितारे,
मेरी तुम्हारी प्रेम कहानी ।

कल का डरना,
काल की चिंता,
दो तन हैं मन एक हमारे,
जीवन सीमा से आगे भी,
आऊँगी मै संग तुम्हारे

शैलेन्द्र ने ये गीत लिखा जो सुहागरात के लिये उचित था और रात को भी सुहानी बताया गया था । अब जिम्मेदारी थी शंकर जयकिशन की मौत का मंजर गीत मे भरने की । तो जब लता ने शब्द “रुक जा रात ठहर जा रे चंदा” खिड़की से झांकते चांद को बोलती है तो लगता है मौत के मंज़र से खौफज़दा मीना कुमारी का कलेजा हलक के बाहर निकल जायेगा । बोल तो सुहागरात के थे पर स्वर मे खौफ था मौत के मंज़र का । शंकर जयकिशन ने लता को ग़ज़ब सुर दिया और लता ने बहुत बेहतरीन निभाया । शैलेन्द्र ने पत्नि के मुख से मरणासन्न पति को दिलासा भी दिलवाया ‘जीवन सीमा से आगे भी आऊँगी मै संग तुम्हारे’ । ये स्थापित हिन्दु मान्यता के अनुरूप ही था कि स्त्री पुरुष का संबंध जनम जनम का है और मृत्यु महज़ एक पड़ाव है ।
मरणासन्न पति पत्नि से वचन मांगता है कि वो उसकी मृत्यु के बाद अपने प्रेमी से शादी कर लेगी । पर एक भारतीय पत्नि के लिये तो ये सुनना भी पाप था । अब बारी थी हसरत जयपुरी साहब की जिन्होंने यहाँ जो गीत लिखा वो एक भारतीय पतिव्रता नारि की मन:स्थिति, मन की पीड़ा, उसके अन्तर्मन की आवाज़ और गुजरी घटनाओं की परिणति का खुलासा बयान कर दिया गया । ये गीत स्थापित हिन्दु मान्यताओं की स्थापित मर्यादाओं में ही बंधा था और हसरत जयपुरी मै समझता हूँ यहाँ बिल्कुल शैलेन्द्र के अवतार में नज़र आये ।

हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे हैं खो बैठे,
तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ,
भूल जाओ
हम तेरे प्यार में…..

पंछी से छुड़ाकर उसका घर,
तुम अपने घर पर ले आए
ये प्यार का पिंजरा मन भाया,
हम जी भर-भर कर मुस्का ए
जब प्यार हुआ इस पिंजरे से,
तुम कहने लगे आजाद रहो
हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा,
तुम अपनी जुबां से ये न कहो
अब तुम सा जहां में कोई नहीं है,
हम तो तुम्हारे हो बैठे
तुम कहते हो कि…..

इस तेरे चरण की धूल से हमने,
अपनी जीवन माँग भरी
जब ही तो सुहागन कहलाई,
दुनियां के नजर में प्यार बनीं
तुम प्यार की सुन्दर मूरत हो,
और प्यार हमारी पूजा है
अब इन चरणों में दम निकले,
बस इतनी और तमन्ना है
हम प्यार के गंगाजल से बलम जी,
तन मन अपना धो बैठे
तुम कहते हो कि…..

सपनों का दर्पण देखा था,
सपनों का दर्पण तोड़ दिया
ये प्यार का आँचल हमने तो,
दामन से तुम्हारे बाँध लिया
ये ऐसी गाँठ है उल्फत की,
जिसको न कोई भी खोल सका
तुम आन बसे जब इस दिल में,
दिल फिर तो कहीं ना डोल सका
ओ प्यार के सागर हम तेरी
लहरों में नाव डुबो बैठे
तुम कहते हो कि…

एक भारतीय पतिव्रता स्त्री कैसे शादी से पहले के प्यार को त्याग कर अपनी जीवन धारा को एक निश्चित राह पर मोड़कर अपनी मर्यादाओं का पालन करके प्रसन्न रहती है ये कितने खूबसूरत शब्दों में लिखा हसरत साहब ने कि देखते ही बनता है ।

पर कहानी दिल एक मंदिर की यहीं खतम नही होती । एक और गीत था जो बचपन की अठखेलियों के बीच मौत के मंज़र से दो चार होता है । पर इस बार शंकर जयकिशन ने अपना विश्वास सुमन कल्याणपुर पर जताया । गीत था “जूही की कली मेरी लाडली”। गीत तो शैलेन्द्र ने लिखा जो मां और बेटी के वात्सल्य को ही प्रदर्शित करता है। पर मौत का खौफ फजांओं में था और बच्ची पर मौत का साया मंडरा रहा था । इसी मौत के खौफ को व्यक्त किया गीत की एक लाइन ने “ओ आस किरन जुग जुग तू जिये” । जब सुमन कल्याणपुर ने स्वर को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचाया तो उसमे प्रार्थना थी ऊपरवाले से जो स्पष्ट सुनी जा सकती थी । । ऐसा लगा वहाँ सुमन कल्याणपुर लता के समकक्ष जा खड़ी हुई । और इस तरह शंकर जयकिशन ने लता शैलेन्द्र सुमन के साथ मिलकर संगीत के स्वर्णिम काल के इतिहास में एक पन्ना स्वर्ण अक्षरों से लिखा ।

श्रीधर साहब के पास फिल्म दिल एक मन्दिर के प्रेम त्रिकोण का हल तो नही था इसलिये राजेन्द्र कुमार की मृत्यु दिखाकर अपना रास्ता आसान कर लिया । शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी साहब ने अपने इन दो गीतों में इस प्रेम त्रिकोण से उपजी समस्याओं का न सिर्फ गहन अध्ययन गीतों में दिया बल्कि सही हल भी सुझाया। पति पत्नि के संबंधों को शादी से पूर्व के प्रेम से कहीं ऊँचा दर्जा दिया ।

शंकर जयकिशन के संगीत ने फिल्म को पूर्णता प्रदान की । दिलों में उठ रहे भावनाओं के तूफानों को पार्श्व संगीत और गानों के प्रील्यूड और इन्टरल्यूड संगीत के द्वारा पूरी फिल्म में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया । जिस हिन्दु दर्शन को फिल्म में अधूरा छोड़ दिया गया था उसे हसरत शैलेन्द्र ने अपने गीतों में पूरा किया ।

फिल्म दिल एक मन्दिर और उसका संगीत हमारे मानस पटल पर आज पांच दशकों के बाद भी छपा हुआ है ।

Image may contain: 3 people, people smiling, text
Image may contain: 3 people, people smiling, people sitting
Image may contain: 1 person, closeup
Image may contain: 2 people
Image may contain: 1 person, eyeglasses and closeup
+4
LikeShow more reactions
Advertisements