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मैंने दिल तुझको दिया 🌷 

🌷डॉ राजीव श्रीवास्तव

उत्सव का उल्लास और दर्द की व्यग्रता का व्यापक व्योम लिये कोई एक कालजयी सहगान यदि चित्रपट पर प्रथम और अभी तक का अन्तिम गान कहा जायेगा तो उस एक गीत विशेष के लिये समस्त संगीत प्रेमी समवेत स्वर में स्वतः ही कह उठेंगे – मैंने दिल तुझको दिया।

निर्माता-निर्देशक-नायक राजकपूर की फ़िल्म ‘श्री चार सौ बीस’ का सहगान सिने संगीत में सृजित हुआ अभी तक का सर्वथा अनूठा गान है। फ़िल्म के दृश्य के संग और उसके परे भी इस समूह गीत का श्रवण करते हुये गीत के शब्दों के समानान्तर दृश्य-परिदृश्य स्वतः ही आकार ग्रहण करने लगते हैं। ‘रमय्या, वत्ता वइय्या’ तेलगु भाषा में किसी को सम्बोधित कर उसे अपने निकट बुलाने का वाक्य है। रमैय्या, यहाँ आओ ! वास्तव में पूना जाते हुये राह में चाय-पानी के वास्ते जब राजकपूर अपने सखा मुकेश, हसरत, शैलेन्द्र, शंकर, जयकिशन के साथ रुके तो शंकर ने देखा कि वहाँ काम करने वाला एक बालक तेलगु भाषी है। सहज भाव से शंकर के मुख से निकला – ‘रमय्या, वत्ता वइय्या’। इसके पहले कि शंकर उस बच्चे से कुछ कहते निकट ही बैठे शैलेन्द्र ने बालक को देख कर कहा – ‘मैंने दिल तुझको दिया’। इस तरह जन्म हुआ उस अमर कालजयी गीत का जिसकी सृजन यात्रा पर आज मैं आप सभी को अपने संग लिये चल रहा हूँ।

https://www.youtube.com/watch?v=5mdjuBdrVjA

इस विशेष समूह गान में शंकर-जयकिशन ने सर्व प्रथम अपने सरगम का एक बिछौना बिछाया है, उस पर शब्द-भाव को सजा कर उसे अपने सुर-विन्यास के ओढ़ना से ओढ़ाया है। जिस प्रकार प्रकृति सृजन के पूर्व अनुकूल वातावरण का सुयोग रचती है तत्पश्चात् अपने शृंगार से सृजित कृतित्व को ओज प्रदान करती है कुछ उसी प्रकार शंकर-जयकिशन इस गान में अपनी प्रकृति के सहज प्रवाह से वह सब कुछ रचते गये हैं जो किसी रचना को प्राणवान बनाने के उपक्रम में स्वाभाविक रूप से अनिवार्य होते हैं।

गीत की संगीत यात्रा पर आपको ले चलने के पूर्व मैं यह बता दूँ कि इस विशेष गान की कथा को गढ़ने में मेरे लिये जिस व्यक्तित्व ने समुचित ‘वातावरण’ का निर्माण किया है वो मेरे मित्र कोलकाता के भाई कमल बेरिवाला हैं। मैंने कई माह पूर्व ही उन्हें इस गीत को इसके मूल रूप में प्रस्तुत करने का आग्रह किया था और आज ‘धनतेरस’ के पावन दिवस पर उन्होंने मुझे संगीत का यह अनमोल धन अन्ततः प्रेषित कर ही दिया। आइये, सुरीली यात्रा का श्री गणेश करते हैं।

धनवान और निर्धन के पृथक-पृथक उत्सवों का तुलनात्मक परिदृश्य लिये यह समूह गान सम्पन्न लोगों द्वारा आयोजित किये गये भव्य नृत्य गीत-संगीत के दैहिक भाव-भंगिमा के आकर्षक अंग-प्रत्यंग के प्रदर्शन से प्रारम्भ होता है। जन सामान्य के साधारण पृष्ठभूमि को अपने भीतर छिपाये फ़िल्म का नायक आधुनिक वस्त्र धारण किये सम्पन्नता का उपक्रम रचने का असफल प्रयास करता हुआ अन्ततः पश्चिमी संगीत के तीव्र वेग से आहत अपने निज आवेग के प्रवाह में बहता इस असहनीय घेरे से स्वयं को मुक्त करने के प्रयास में उस महल के परिसर से बाहर निकल आता है। संगीत का तीव्र वेग पीछे छूटता है और हृदय का अंतर्द्वंद उत्कट आलाप से ध्वनित हो उठता है। गीत के पूर्व प्रारम्भिक संगीत की पृष्ठ भूमि में मन की व्यग्रता को दर्शाता यह दीर्ध आलाप मन्ना डे के स्वर में गूँजता है। महल की भव्यता से निकल कर जन साधारण के उत्सव गान की दिव्यता को अपने में समाया सहगान ‘रमय्या, वत्ता वइय्या’ के आत्मिक आमन्त्रण से नायक का स्वागत करता है। शैलेन्द्र के शब्द-भाव को उल्लास और उत्सव के सरगम पर वेगमयी गतिशीलता से जिस प्रकार शंकर-जयकिशन ने मध्य संगीत में संयोजित किया है वह लता मँगेशकर और मु रफ़ी के संयुक्त स्वर लहरियों पर सवार हो कर चित्त को प्रसन्न भाव से ‘सुर-लय-ताल’ की संगत में झूमने को विवश कर देता है। ‘नैनों में थी प्यार की रौशनी’ के इस प्रथम अन्तरे में प्रेम की उलाहना है तो दूसरे अन्तरे में सोने चाँदी के दिल के मध्य दर्द की छाँव का सहज भाव समाहित है। परस्पर नोक-झोंक, छेड़-छाड़ और प्रेम की आतुरता का चित्रण करता यह गीत अपने सामूहिक भाव प्रदर्शन में किस प्रकार राह चलते पथिक को भी अपने में बाँध लेता है उसका अद्भुत चित्रण इस गान के दृश्य में प्रस्तुत किया गया है। किसी भी नगर-महानगर के समान मुख्य पथ के समीप बसी बस्ती में निवास कर रहे विभिन्न परिवारों के सदस्यों द्वारा प्रस्तुत इस सामूहिक उत्सव गान में वहाँ से आ-जा रहे पथिकों को भी इसमें सहज रूप से सम्मिलित होते देखना मन को आश्चर्य मिश्रित आनन्द से भर देता है। आपने कभी यदि अपने ही जीवन में ध्यान दिया होगा तो सम्भवतः आपको स्मरण होगा कि राह चलते जब हम किसी को कोई गीत गाते हुये सुनते हैं अथवा यूँ ही चलते हुये रेडियो पर कोई अपना प्रिय गीत सुन लिया हो तो प्रायः हम उसे स्वयं भी गुनगुनाते हुये आगे बढ़ जाते हैं और आगे कोई और हमें सुन कर उस गीत को गाते हुये अपनी दिशा में आगे बढ़ जाता है। इस प्रकार एक ही गीत एक मुख से दूसरे और फिर तीसरे मुख से होता हुआ पृथक-पृथक दिशाओं में स्वाभाविक रूप से विस्तार पाता चला जाता है। व्यवहारिक जीवन का यही मनोविज्ञान इस सामूहिक गीत में भी सहज रूप से दर्शनीय है। गीत के तीसरे अन्तरे के पूर्व के मध्य संगीत के पार्श्व में ‘रमय्या, वत्ता वइय्या, मैंने दिल तुझको दिया’ को राह चलते पथिक भी गुनगुनाते हुये आगे बढ़ते जाते हैं। आप दृश्य में देखें तो एक ताँगे पर सवार व्यक्ति ‘मैंने दिल तुझको दिया’ गाते हुये आगे बढ़ता है जिसे रास्ते में सायकिल पर सवार दूध वाला सुनता है और वह भी उसे गुनगुनाते हुये अपनी राह पर आगे बढ़ जाता है। इसी दूधवाले के शब्द-सुर को थाम कर दूर निर्जन स्थान पर बिछोह की पीड़ा लिये बैठी नायिका का वियोग भाव अनायास ही इन शब्दों में छलक उठता है – ‘याद आती रही दिल दुखाती रही …. प्यार करके भुलाना न आया हमें’। परन्तु शब्द-भाव की यह यात्रा यहीं नहीं ठहरती। वियोगिन नायिका के इस दर्द की कम्पन से व्यथित नायक के हृदय की साँकल बज उठती है और अधीर मन की पीड़ा का सागर सहसा ही फूट पड़ता है।

इस समूह गान का चरम है इसका अन्तिम अन्तरा। आप ध्यान दें तो आपको अनुभूत होगा कि गीत के अभी तक के तीन अन्तरे में गीत-संगीत अपने उत्सव भाव के साथ त्वरित गति से वेगवान रहते हुये अन्तिम अन्तरे में भी वाद्य यन्त्रों की संगत में गति और वेग का वैसा ही तारतम्य बनाये हुये है पर जैसे ही गायक मुकेश का स्वर उभरता है सम्पूर्ण गीत का अभी तक का स्थायी उत्सव भाव अकस्मात् उदात्त भाव के संग बिछोह के अनन्त सरोवर में पूर्ण रूप से समाहित हो जाता है। यह अकस्मात् परिवर्तन इतने हौले से होता है कि गीत अपनी समाप्ति की ओर अग्रसर होते हुये जब रफ़ी के आलाप के संग पूर्णता को प्राप्त होता है तब तक भी आप उसी बिछोह के सरोवर में आकण्ठ डूबे रहते हैं। ‘लय-सुर-ताल’ के एक समान सानिध्य के बाद भी सिने गीत-संगीत के अभी तक के इतिहास में यह सहगान एक मात्र ऐसा उदाहरण है जिसमें उल्लास के उत्सव का रूप सहज ही पीर के पर्वत में समा कर विलीन हो जाता है। ‘रस्ता वोही और मुसाफ़िर वोही’ की व्यथा का मर्म परोसते हुये जब समक्ष यह प्रश्न आता है ‘मेरी आँखों में रहे कौन जो मुझसे कहे’ तब गीत श्रवण कर रहे प्रत्येक हृदय से समवेत स्वर में वाणी मुखर हो उठती है – ‘मैंने दिल तुझको दिया’।

अचरज की बात है कि यह एक उत्सव गान होने के बाद भी इसके प्रारम्भ के तीन अन्तरे भी अपने में दर्द की अभिव्यक्ति को ही समाये हुये हैं और लता तथा रफ़ी ने इसे अपने-अपने स्तर पर अत्यन्त ही सहज रूप में प्रस्तुत भी किया है परन्तु जिस प्रकार अन्तिम अन्तरे में गायक मुकेश की वाणी गीत के स्थापित भाव को अपने गहन उदात्त भाव में सहज ही समाहित कर लेती है वह इस बात का प्रमाण है कि एक वाणी विशेष से प्रक्षेपित विरह बाण किस प्रकार विशाल समूह के हृदय को बेध जाती है।

आलाप से प्रारम्भ हो कर आलाप पर ही समाप्त होने वाले इस समूह गान में प्रारम्भिक आलाप मन्ना डे का है और अन्तिम आलाप मु रफ़ी के स्वर में है। पर, गीत के मध्य में एक आलाप लता मँगेशकर के स्वर में भी है। ‘याद आती रही दिल दुखाती रही’ अन्तरे के पूर्व ताँगे और दूधवाले की गुनगुनाहट के पार्श्व में नायिका की व्यथा से उपजा लता का आलाप विरह की वेदना को सहज ही साकार कर गया है। इन आलापों की संगत में शंकर-जयकिशन का रचा संगीत संसार अभी तक जो अनमोल सुर लुटाता आया है वह काल के भाल पर सदा के लिये अजर-अमर है।
अपने आभार ज्ञापन के क्रम में मैं भाई कमल बेरिवाला के साथ ही कोलकाता के संगीत मर्मज्ञ भाई अनूप गड़ोदिया का भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जो पार्श्व में रह कर भी अपने बहुमूल्य सुझाव से गीत प्रस्तुति को जीवन्तता प्रदान करते रहते हैं। जी हाँ, मैं आप सभी संगीत रसिकों का विशेष आभारी हूँ जो आप सब इस गीत-संगीत की विशेष शृंखला को अपना आत्मिक समर्थन एवं हार्दिक स्नेह प्रदान करते हुये अपने बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं से इस प्रस्तुति का मान बढ़ा रहे हैं।

आज के इस कालजयी गीत का आनन्द आप इस लिंक पर ले सकते हैं।
https://www.youtube.com/watch?v=5mdjuBdrVjA
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डॉ राजीव श्रीवास्तव
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ओ ssss ओ ssss
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
रमय्या वत्ता वइय्या। रमय्या वत्ता वइय्या
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
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नैनों में थी प्यार की रौशनी (तेरी आँखों में ये दुनियादारी न थी – २),
तू और था तेरा दिल और था (तेरे मन में ये मीठी कटारी न थी – २)
मैं जो दुःख पाऊँ तो क्या आज पछताऊँ तो क्या – २
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या रमय्या वत्ता वइय्या
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उस देस में तेरे परदेस में (सोने चाँदी के बदले में बिकते हैं दिल – २),
इस गाँव में दर्द की छाँव में (प्यार के नाम पर ही धड़कते हैं दिल – २)
चाँद तारों के तले रात ये गाती चले – २
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या रमय्या वत्ता वइय्या
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ओ ssss ओ ssss
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या रमय्या वत्ता वइय्या
रमय्या वत्ता वइय्या रमय्या वत्ता वइय्या
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या रमय्या वत्ता वइय्या
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याद आती रही दिल दुखाती रही (अपने मन को मनाना न आया हमें – २),
तू न आये तो क्या भूल जाये तो क्या (प्यार करके भुलाना न आया हमें – २)
वहीं से दूर से ही तू भी ये कह दे कभी – २
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
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रस्ता वोही और मुसाफ़िर वोही (एक तारा न जाने कहाँ छुप गया – २),
दुनिया वोही दुनिया वाले वोही (कोई क्या जाने किसका जहाँ लुट गया – २)
मेरी आँखों में रहे कौन जो मुझसे कहे – २
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
आ ssss आ ssss
मैंने दिल तुझको दिया, मैंने दिल तुझको दिया
रमय्या वत्ता वइय्या, रमय्या वत्ता वइय्या
आ ssss आ ssss
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फ़िल्म: श्री 420 (1955), गीतकार: शैलेन्द्र, संगीतकार: शंकर-जयकिशन, गायक: मन्ना डे, मु रफ़ी, लता मँगेशकर, मुकेश

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