ये राखी बन्धन है ऐसा Ye Raakhi Bandhan Hai Aesa


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रक्षा बन्धन के ढेरों गीतों में से एक महत्वपूर्ण गीत है फ़िल्म ‘बे-ईमान’ का युगल गीत ‘ये राखी बन्धन है ऐसा’।

महान गायक मुकेश और गायिका लता मँगेशकर के स्वरों में ढला वर्मा मलिक का लिखा यह भावपूर्ण गीत भारत के प्रथम एवं एकमात्र वैश्विक संगीतकार शंकर-जयकिशन के अमर संगीत का एक अनमोल रत्न है।
आप सम्भवतः यह सोच रहे हों कि ‘रक्षा बन्धन’ के पावन त्योहार पर मैंने ढेरों गीतों में से इस एक गीत को ही क्यों चुना है। कारण एक नहीं कई हैं जिसे मैं आगे के अपने कथानक में गीत की प्रकृति तथा इसके सम्बन्धित प्रसंग एवं सन्दर्भ की व्याख्या करते हुए उद्घाटित करता चलूँगा जो निःसन्देह सभी संगीत रसिकों और मनीषियों के लिए नूतन होगा। 

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भारतीय सिने गीत-संगीत में यह एकमात्र ऐसा गीत है जिसमें बहन-भाई के सहज प्रीत के संग उस भाई की व्यथा को शब्द दिया गया है जिसकी अपनी कोई बहन नही है। बहन-भाई के परस्पर नेह-स्नेह, नोक-झोक, प्यार-मनुहार तथा बिछोह को परिलक्षित करते ढेरों गीत भारतीय सिनेमा में उपलब्ध हैं परन्तु सगी बहन के अभाव का जन्मजात दर्द लिए एकाकी जीवन जीने वाले भाई की पीड़ा को अभिव्यक्त करता हिन्दी सिने गीत-संगीत का ‘ये राखी बन्धन है ऐसा’ ही वह एकमात्र गीत है जो भाई के हृदय में पलती-घुमड़ती कसक को एक सार्थक वाणी दे गयी है।

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यह गीत राखी के त्योहार का गीत है जो इस पावन पर्व के उत्सव, इसकी महत्ता, इसके पारम्परिक मूल्यों एवं इसकी प्रासंगिकता को अपने में समेटे हुए है। तीन अन्तरों के इस युगल गान में प्रथम दो अन्तरा लता के स्वर में है जिसमें रक्षा बन्धन पर्व की पवित्रता, महत्ता, आदर, गरिमा, उल्लास, हर्ष एवं उत्सव के सम्मिलित भाव-भंगिमा को अत्यन्त ही सहज रूप से परोसा गया है। मुकेश का भावपूर्ण स्वर इस गीत में अन्तिम अन्तरे में आता है और मुखड़े में लता के संग मिल कर गीत को पूर्णता प्रदान करता है। मुकेश गायन का अन्तिम अन्तरा ही इस गीत का प्राण तत्व है। हर्ष-उल्लास-उत्सव का वातावरण अकस्मात् ही तब गम्भीर हो जाता है जब मुकेश की वाणी भाई के दर्द के संग फूटती है। सिनेमा के दृश्य के साथ-साथ इस गीत को यूँ ही आँख मूँद कर श्रवण करते हुए भी सभी के नयन नीर से भर जाते हैं। “आज ख़ुशी के दिन भाई के भर भर आये नैना, कदर बहन की उनसे पूछो जिनकी नहीं है बहना” में निहित अश्रु मिश्रित पीड़ा को अपनी धीर-गम्भीर सुरीली वाणी में मुकेश जिस प्रकार इसे अपने स्वर के धनुष पर सुर की प्रत्यंचा लिए चढ़ाते हैं और फिर उसे अपने भाव के प्रवाह से सम्पूर्ण आत्मिक सम्वेग के संग प्रक्षेपित करते हैं वह अद्भुत रूप से गीत के अभी तक के स्थापित उल्लास को तिरोहित कर उसे बिछोह के पीर से पाट देता है। भारतीय गीत-संगीत में यूँ अकस्मात् ही हर्ष की देहरी लाँघ कर विषाद के व्योम को सहज ही अंगीकार कर लेने की यह घटना अचम्भित करने वाली है। 
इसी प्रकार भाव का समूल उलट कर विपरीत भाव को परिलक्षित करता हिन्दी सिने गीत के प्रथम गान के रचयिता भी शंकर-जयकिशन ही थे और उसके सम्वाहक यही गायक मुकेश ही थे। आपको फ़िल्म ‘श्री ४२०’ का कालजयी सहगान ‘रमय्या वत्ता वैय्या, मैंने दिल तुझको दिया’ का स्मरण तो होगा ही। इस गीत में चार अन्तरे हैं। प्रथम तीन अन्तरे में लता मँगेशकर और मु रफ़ी के स्वरों में गीत हर्ष-उल्लास-उत्सव को जीवन्त करता हुआ आगे बढ़ता हुआ जब चौथे अन्तरे में मुकेश की वाणी के संगत में आता है तब अकस्मात् ही गीत उल्लास की डोर छोड़ दर्द के सुर को पकड़ लेता है। गीत का सुर वही है, गति, तीव्रता और ताल भी जस का तस है। उच्च सप्तक के उसी निर्धारित सरगम पर आरूढ़ हो कर इस गीत के अन्तिम भाग में मुकेश की वाणी जिस प्रकार अनन्त पीर को साकार कर गयी है वह इस गीत के द्वारा अब तक के सभी स्थापित भाव रूपकों को पार्श्व में स्वतः ही ढकेलती दर्द के दर्पण में साक्षात पीड़ा को सजीव कर देती है। मुकेश की खरज भरी वाणी में निहित करुणा का सागर इतना गहन और व्यापक बन पड़ा है कि इस एक सहगान में लता और रफ़ी दोनों ही का स्वर इसमें डूब कर कहाँ विलीन हो जाता है यह समझना आज भी उतना ही कठिन है जितना यह समझ पाना कि मुकेश किस प्रकार अपने स्वर से सम्पूर्ण गीत के भाव को ही पलट कर उसे अपने पक्ष में कर लिया करते थे। शंकर-जयकिशन के संगीत में ऐसे प्रयोग को साधना आज लोगों को अचम्भित अवश्य कर जाता है पर इन प्रमाणों के रहते इतिहास की ऐसी विलक्षण घटना को कोई कैसे झुठला सकता है। प्रसंगवश मैं यहाँ पर फ़िल्म ‘दिल ने फिर याद किया’ के शीर्षक गीत का भी स्मरण कराता चलता हूँ जिसमें मु रफ़ी और सुमन कल्याणपुर के बाद जब अन्तिम अन्तरे में मात्र चार पंक्तियों के साथ मुकेश प्रगट होते हैं तो यहाँ भी इस अत्यधिक लोकप्रिय गीत का सम्पूर्ण ओज मुकेश की वाणी में घुले भाव के चरम उत्कर्ष के संग अपना वर्चस्व स्पष्ट रूप से स्थापित कर जाता है। इस गीत से यदि मुकेश की इन चार पंक्तियों को पृथक कर दें तो गीत अपूर्व करुणा के अभाव में निस्तेज हो कर विशिष्ट से साधारण रह जाता है।

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आइए, पुनः राखी के इस अमर गीत ‘ये राखी बन्धन है ऐसा’ पर लौट आते हैं। शंकर-जयकिशन की संगत में एक बार फिर मुकेश जिस प्रकार इस गीत में भाई के भीतर सिमटे दर्द को अपने भावपूर्ण स्वर से बाँध कर उसे अनन्त विस्तार देते हुए बाहर उड़ेलते हैं वह संसार भर के समस्त भाइयों का समवेत स्वर में एक ऐसा नाद बन कर आज भी हमारे मध्य स्थापित है जो अन्य कहीं किसी भी गीत में उपलब्ध नहीं है। वाद्य यन्त्रों में प्रमुख रूप से शंकर-जयकिशन ने इस गीत में सितार का प्रभावी प्रयोग प्रारम्भ से ले कर गीत के अन्त तक इस प्रकार किया है कि वह प्रारम्भिक संगीत (Prelude Music), मध्य संगीत (Interlude Music) तथा परिणामी (समापन) संगीत (Conclude Music) में गीत के भाव के अनुरूप उसे अनुकूल आधार प्रदान करता जाता है। एक ओर प्रारम्भ में सितार के सुर कोमल झंकार के संग पर्व की पावनता को दर्शाते हैं तो मध्य संगीत में वो त्योहार के उत्सव का दृश्य उत्पन्न कर जाते हैं। यही सितार जब गीत के अन्तिम चरण में प्रवेश कर मुकेश की वाणी की संगत करते हैं तो टीस की बारीक लकीर सी खींच देते हैं। अद्भुत बन पड़ा है इस गान का गीत-संगीत। 

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आप स्वयं इस गीत को प्रस्तुत सूत्र (Link) के माध्यम से जब सुनेंगे तब स्वतः ही इसकी व्यापक तीव्रता से अवगत हो इसके कालजयी स्वरूप से परिचित हो जाएँगे। फ़िल्म में तथा अन्य उपलब्ध स्रोतों में इस गीत के अन्त में मुखड़े की वो पंक्ति जिसे मुकेश ने अपने एकल स्वर में गाया है अनुपलब्ध है पर प्रख्यात लेखक एवं सिने संगीत संग्रहकर्ता भाई कमल बेरिवाला ने अपने संग्रह से यह गीत इसके मूल रूप में हमें उपलब्ध कराया है। समय-समय पर जिस प्रकार कमल भाई हमारे समक्ष विभिन्न अनमोल गीत उसके मूल स्वरूप में हमें परोसते चले आ रहे हैं उस हेतु उनका हृदय से आभार और धन्यवाद !
https://www.youtube.com/watch?v=DUzGD1zzp14
डॉ राजीव श्रीवास्तव 

ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
जैसे चन्दा और किरण का, जैसे बदरी और पवन का, जैसे धरती और गगन का
ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
.
दुनियाँ की जितनी बहने हैं उन सबकी श्रद्धा इसमें है,
है धरम करम भईया का ये बहना की रक्षा इसमें है,
जैसे सुभद्रा और कृष्ण का, जैसे बदरी और पवन का, जैसे धरती और गगन का 
ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
.
छोटी बहना चूम के माथा भईया तुझे दुआ दे,
सात जनम की उमर मेरी तुझको भगवान लगा दे, 
अमर प्यार है भाई बहन का जैसे बदरी और पवन का, जैसे धरती और गगन का 
ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
.
आज ख़ुशी के दिन भाई के भर भर आये नैना, 
कदर बहन की उनसे पूछो जिनकी नहीं है बहना,
मोल नहीं कोई इस बन्धन का जैसे बदरी और पवन का, जैसे धरती और गगन का
.
ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
जैसे चन्दा और किरण का, जैसे बदरी और पवन का, जैसे धरती और गगन का
ये राखी बन्धन है ऐसा, ये राखी बन्धन है ऐसा,
.
फ़िल्म: बे-ईमान (१९७२), गीतकार: वर्मा मलिक, संगीतकार: शंकर-जयकिशन, गायक: मुकेश, लता मँगेशकर
https://www.youtube.com/watch?v=DUzGD1zzp14

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