Tribute to Dattaram on his death anniversary on 8th June 2016

by

Shashank Dubey

जब कभी हम रेडियो या टेप या सीडी या नेट पर कोई गीत सुनते हैं और सुनते-सुनते उसके भीतर तक उतरते हैं तब हमारा काम उद्घोषक द्वारा बताए या फ्लैप पर लिखे गायक-गायिका-गीतकार-संगीतकार के नामों से ही नहीं चलता. हम यह भी जानना चाहते हैं कि अमुक गीत में बाँसुरी किसने बजाई है या फलां गीत में जो इतनी अच्छी शहनाई बज रही है, वह आखिर किसका कमाल है? हम खोज के लिए फिल्म संगीत के पुराने रसिकों को पकड़ते हैं, पुरानी किताबें खंगालते हैं और फिर जब हमें यह पता चलता है कि “दैया रे दैया चढ़ गयो पापी बिछुवा” (फिल्म : मधुमति, संगीतकार : सलील चौधरी) गीत का निचोड़ रामलाल की शहनाई में छिपा है, “कजरा मोहब्बत वाला अँखियों में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरे कुरबान” (फिल्म : किस्मत, संगीतकार : ओ.पी.नैयर) की लोकप्रियता का कारण बाबू सिंह की हारमोनियम है, “सुन री पवन पवन पुरवैया” (फिल्म : अनुराग, संगीतकार : एस.डी.बर्मन) गीत में “बंसी की धुन सुन के पिया मेरा जिया कहीं खो जाता है” पंक्तियों के एन बाद बजी बाँसुरी किसी और ने नहीं, बल्कि हमारे शिव-हरि वाले हरि प्रसाद चौरसिया ने बजाई है, “मन डोले मेरा तन डोले” (फिल्म : नागिन, संगीतकार : हेमंत कुमार) में नागिन की बीन कल्याणजी (आनंदजी वाले) ने बजाई है, “जिस दिल में बसा था प्यार तेरा, उस दिल को कभी का तोड़ दिया” (फिल्म : सहेली, संगीतकार : कल्याणजी-आनंदजी) गीत में वायलिन का संयोजन लक्ष्मी-प्यारे के प्यारेलाल ने किया है, “कोई जब राह न पाए मेरे संग आए के पग-पग दीप जलाए मेरी दोस्ती मेरा प्यार” (फिल्म : दोस्ती, संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल) का सेंट्रिफ्युगल फोर्स आर.डी.बर्मन द्वारा बजाए माउथ ऑर्गन में निहित है और “वो चाँद खिला वो तारे हँसे ये रात अजब मतवारी है, समझने वाले समझ गए हैं, ना समझे, ना समझे वो अनाड़ी है” (फिल्म : अनाड़ी, संगीतकार : शंकर जयकिशन) गीत में ढोलक की थाप दत्ताराम ने दी है, तो उस वक्त मानना पड़ता है कि नाम चाहे नेतृत्वकर्ता का हो, है तो फिल्म संगीत एक टीमवर्क ही. हाँ, यह बात दीगर है कि फिल्म संगीत के सुरीले सफर के लीडरों को तो हर कोई जानता है लेकिन इन गीतों में असली रंग भरने वाले साजिंदे हाशिये पर बैठे-बैठे चुनचुनाती रौशनी की राह तकते रह जाते हैं. हालाँकि कुछ खुशनसीब भी होते हैं, जो आर्टिस्ट से लेकर असिस्टेंट और फिर असिस्टेंट से लेकर चीफ म्युज़िक डायरेक्टर का तमगा पा जाते हैं, तो दूसरी ओर कुछ साजिंदे “जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया” फलसफे में यकीन रखते हुए उसी हाल में रहना चाहते हैं. दत्ताराम की कहानी में चमकने की चाह भी है और पाए हुए से संतुष्ट होने की भावना भी.

मूलतः गोवा के निवासी दत्ताराम वाडकर ने अपनी संघर्ष यात्रा चालीस के दशक में एक मज़दूर के हैसियत से मुंबई में शुरू की थी. पढ़े-लिखे थे नहीं, संगीत में रुचि थी, तो माँ की प्रेरणा से तबला सीखने लगे. तभी उन्हें पहलवानी का शौक लगा और जिम में जाकर कसरत करने लगे. वहीं उनकी पहचान पेशे से तबलावादक और शौक से पहलवान शंकर से हुई. उन दिनों शंकर पृथ्वी थियेटर में तबला आर्टिस्ट थे. बहुत जल्द ही वे शंकर की तबला टीम से जुड़ गए. शंकर के साथ उनका कार्यक्रमों में जाना जारी रहा. बाद में शंकर ने जैसे ही जयकिशन के साथ मिलकर जोड़ी बनाई दत्ताराम उनके सहायक के रूप में जुड़ गए. शंकर-जयकिशन के लिए उन्होंने तबला ही नहीं बजाया, ढोलक भी बजाई और ढोलक तो क्या खूब बजाई कि पूरे संगीत जगत में दत्ताराम ठेके का नाम चल पड़ा. यूँ ढोलक भारतीय फिल्म संगीत के ताल पक्ष का शुरु से ही अभिन्न अंग रहा है, लेकिन दत्ताराम के दृश्यपटल पर आने से पहले इस क्षेत्र में पहले नंबर की हैसियत तबले की थी और ढोलक को दूसरी पायदान से संतोष करना पड़ता था. लेकिन यह दत्ताराम की हथेलियों का जादू ही था कि बहुत जल्द ही यह अहम् ताल यंत्र बन गई. शंकर-जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध कई गीत अपनी ताल के कारण उल्लेखनीय बने. मसलन “तेरा जाना दिल के अरमानों का लुट जाना” (अनाड़ी), “अंदाज़ मेरा मस्ताना माँगे दिल का नज़राना” (दिल अपना और प्रीत पराई), “मेरे सपने में आना रे सजना” (राजहठ), “मैं पिया तेरी, तू माने या ना माने” (बसंत बहार), “बागड़ बम बम बम” (कठपुतली, “मेरी जाँ मेरी जाँ” (यहूदी), “मेरा दिल अब तेरा ओ साजना” (दिल अपना और प्रीत पराई), “रमय्या वस्ता वैया” (श्री 420), “सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था” (जब प्यार किसी से होता है), “तुझे जीवन की डोर से बाँध लिया है” (असली नकली), “बहार बनके वो मुस्कुराए हमारे गुलशन में” (अपने हुए पराए), “दिन सारा गुजारा तोरे अँगना” (जंगली), “वो दिन याद करो” (हमराही), “पान खाए सैंया हमारो” (तीसरी कसम), “तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाय तुमको हमारी उमर लगी जाए” (आई मिलन की बेला), “आज मैं जवान हो गई हूँ, गुल से गुलिस्तान हो गई हूँ ” (मैं सुंदर हूँ) और “सपेरा बीन बजा बीन बजा मैं तो नाचूँगी” (भाई भाई). इन गीतों को यदि सुस्वादु मिठाई कहा जाए, तो निश्चित ही दत्ताजी की ढोलक को चांदी का वर्क कहा जाएगा. .

जब राज कपूर ने उन्हें शंकर जयकिशन के साथ डूब कर काम में रमते हुए देखा, तो उन्हें अपने दोस्त महिपत राय की फिल्म `परवरिश’ में स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनने का अवसर दिला दिया. हालांकि अपने साधारण प्रस्तुतीकरण के कारण फिल्म तो कुछ खास कमाल न कर सकी, लेकिन इसके गीतों ने लोगों का मन मोह लिया. खास कर “आँसू भरी हैं ये जीवन की राहें” गीत बहुत पसंद किया गया. यदि पचास के दशक के दौरान मुकेश के दो सबसे प्रभावी दर्द भरे गीत चुनने के लिए कहा जाए, तो आज भी उन दो में से एक “आँसू भरी है ये जीवन की राहें” ही होगा. और हाँ दूसरा गीत संभवतः ” ये मेरा दीवानापन है या मुहोबत का सुरूर” (यहूदी) हो. इसी फिल्म के लता-मन्ना डे द्वारा गाए युगल गीत “मस्ती भरा है समां” में भी ग़ज़ब की मस्ती थी. तो `परवरिश’ में दत्ताराम के काम से प्रभावित होकर राज कपूर ने उन्हें अपनी फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” के संगीत का ज़िम्मा दे दिया. इस फिल्म के भी दो गीतों “चुन चुन करती आई चिड़िया” और “ये चमन हमारा अपना है” को खूब पॉपुलेरिटी मिली, लेकिन व्यावसायिकता के सींखचे में कैद हमारी फिल्म इंडस्ट्री के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि गीत हिट होने से संगीतकार नहीं चलता. संगीतकार चलता है, फिल्म के हिट होने से. इसीलिए पचासों सुमधुर गीत देने के बावजूद अद्भुत प्रतिभा के धनी मदन मोहन को बड़ी फिल्में इसीलिए नहीं मिल पाई क्योंकि `वह कौन थी’, `हकीकत’ और `मेरा साया’ जैसे तीन अपवाद छोड़ दें, तो मदन मोहन का मतलब हिट म्युज़िक विथ फ्लॉप फिल्म माना जाने लगा था. इसलिए बावजूद अपने सदनिष्ठ प्रयासों के, दत्ताराम को वह मुकाम हासिल न हो सका, जिसके अन्यथा वो वाकई हकदार थे. चाहे `कैदी नंबर 911′ (“प्यार भरी ये घटाएं राग मिलन के सुनाए” / “मीठी-मीठी बातों से बचना ज़रा”) हो या मुकेश के रूमानी गीत “हाले दिल हमारा जाने ना बेवफा ये ज़माना” से सज्ज “श्रीमान सत्यवादी” हो या फिर सुमन कल्याणपुर की संजीदगी से लैस “इतने बड़े जहाँ में अपना भी कोई होता” गीत वाली फिल्म `डार्क स्ट्रीट’ ही क्यों ना हो, दत्ताराम ने अपने काम में कभी कोताही नहीं बरती. उनके संगीत को `काला आदमी’ (“दिल ढ़ूँढ़ता है सहारे सहारे”), `जिंदगी और ख्वाब’ (“न जाने कहाँ हम थे, न जाने कहाँ तुम थे” ) और `बालक’ (“सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिट्ठी तेरे नाम”) में भी काफी सराहना मिली. उन्होंने `प्रेमची सावली’ नामक मराठी फिल्म पर भी हाथ साफ किए, जिसके नायक सदाबहार क्रिकेटर सुनील गावस्कर थे. लेकिन अंततः उन्हें शंकर-जयकिशन के सहायक के रूप में ही लौटना पड़ा. 1971 में जयकिशन के निधन के बाद शंकर अकेले पड़ गए और अच्छा संगीत देने के बावजूद 1972 में उनकी अधिकांश फिल्में पिट गईं. राज कपूर ने भी `बॉबी’ फिल्म में शंकर जयकिशन का स्थान लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को दे दिया. हालाँकि उन्होंने दत्ताराम की प्रतिभा को वाजिब सम्मान देते हुए उन्हें संगीत सलाहकार की महती भूमिका सौंपी, लेकिन दत्ताराम समझ गए कि अब दिल्ली दूर नहीं, बल्कि बहुत दूर निकल चुकी है. उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेटा, ढोलक उठाई और गोवा के मौलिंगम कस्बे की गलियों में खो गए. हालाँकि शरीर तो उन्होंने 8 जून 2007 को त्यागा, लेकिन ढोलक तो चालीस साल पहले ही खूँटी पर टँग चुकी थी. दत्ताराम को हम एक महान संगीतकार के रूप में याद नहीं करेंगे, हम उन्हें याद करेंगे संगीत जगत के एक महान कलाकार के रूप में, एक ऐसे कलाकार के रूप में जो जब “वो चाँद खिला वो तारे हँसे ये रात अजब मतवारी है” गीत के संग-संग ढोलक पर थाप देता था, तो कला को समझने वाला ताल से ताल मिलाने लगता था और जो न समझ पाता था वह? अब छोड़िए भी, जो ना समझे वो अनाड़ी है.

शशांक दुबे

Shashank Dubey's photo.