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Shri Shyam Shankar Sharma

फ़िल्म जगत में पूरे 2 दशक यानी बीस साल (1950-70) की अवधि शंकर जयकिशन के नाम रही।यह वो दौर था जब उनके संगीत से सजी हर फ़िल्म का हर गीत हिट हो जाता था।मन्ना डे कहते थे, “उनके पास हिट धुनों की एक जादुई पुड़ियां थी, जिसमे से बराबर एक से बढ़कर एक हिट गाने श्रोताओ को देते रहते थे।आज के संगीतकार तो एक फ़िल्म में किसी तरह एक हिट गाना देकर अपने आपको धन्य समझने लगते है।मगर उनके लिए यह एक मामूली बात थी।वे लगातार श्रेष्ठ सृजन करते रहे 1955 मे मैंने उनके लिए सीमा फ़िल्म का एक गीत..”तू प्यार का सागर है”..गाया था।इसके बाद उनके लिए मैंने जो भी गीत गाये, सारे के सारे जबरदस्त हिट रहे थे इस संगीतकार जोड़ी के बारे में यह बात भी मशहूर थी कि उनके पास हिट गानो का खजाना था,जिससे एक से बढ़कर एक हिट गीत निकले पर उनकी गुणवत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ा।विपिन रेशमिया लिखते है वे लीजेंड्स थे,आज के संगीतकार तो कोशिश ही नहीं करते?वे पहले संगीतकार थे।” जिन्होंने म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स का उपयोग बड़े पैमाने पर किया था. पियानो,आकार्डियन, मेंडोलिन,ओ बो.ड्रम्पेट आदि देसी विदेशी साजो का उन्होंने सटीक तालमेल बिठाया। साज़ बजाने वालोँ के मामले मे कोई कमी सख्त नापसंद थी। गायन के मामले मे भी वे हठधर्मी थे। मुकेश ,राज कपूर की आवाज थे पर इस जोड़ीं ने जरुरत पड़ने पर राजजी के कई गाने मन्नाजी से गवाएं।बाद में घोर आलोचकों ने भी यह कबूल किया की राजजी की शैली को मन्ना की आवाज ज्यादा मुफीद लगती है।इसी तरह लताजी से उन्होंने सर्वाधिक हिट गाने गवाये,पर आशाजी का भी बहुत सार्थक उपयोग किया।उस दौर के सारे नामचीन गायकों हेमन्त कुमार,तलत महमूद,रफ़ी,किशोर आदि का उन्होंने सदुपयोग किया।मृत्यु से कुछ दिन पहले हेमंत कुमार ने एक मुलाकात में उनके सम्मान में कहा “वो तो जीनियस छिलो अर्थात वो तो जिनियस है।आम धारणा है की RK की फ़िल्मो मे ही इस जोड़ी का हिट संगीत आया यह निराधार है,उस खेमे के वो जरूर थे पर इस भ्रम को उन्होंने बार बार तोड़ा, गलत सिद्ध किया,वो किसी एक खेमे के मोहताज नहीं थे।उस दौर के सारे नामचीन फ़िल्म मेकर्स के साथ काम किया।अमूमन यह कहा जाता है कि यह जोड़ी क्लासिक रागों से बचती है पर बसंत बहार,आम्रपाली,सीमा,साँझ और सवेरा,दिल एक मंदिर,तीसरी कसम,मेरे हज़ूर जैसी कई फ़िल्मो में शुद्ध क्लासिक रागों पर आधारित गानो की रचना कर उन्होंने सबका मुंह बंद कर दिया।1947 में हैदराबाद से आये शंकरजी और गुजरात से आये गुजु भाई जयकिशन जी के बाहरी व्यक्तित्व सर्वथा जुदा थे।पर संगीत ने उन्हें एकाकार कर दिया। RK की पहली फ़िल्म आग(1948) मे ये दोनों संगीतकार राम गांगुली के सहायक थे।पर राजजी की दूसरी फ़िल्म बरसात(1949) मे उन्होंने स्वतंत्र संगीत रचना की। यह साथ जयकिशनजी की मृत्यु तक बदस्तूर कायम रहा।1966 में अपने अनन्य मित्र गीतकार शैलेन्द्र की असामयिक मौत के बाद शंकर जी बेहद टूट गए थे।1971 मे जयकिशन के असामयिक निधन से शंकरजी का सृजन भी मानो बिखरने लगा था पर दृढ़ संकल्प के साथ शंकरजी ने कई हिट गीतों का निर्माण किया जिसमे सोहन लाल कँवर का उन्हें सच्चा साथ मिला।1975 में उन्होंने सन्यासी में हिट संगीत दिया और शंकर जयकिशन जोड़ी का नाम 1984 तक कायम रखा और इसी वर्ष ख़ामोशी के साथ शंकरजी ने सांसो के साथ संसार से विदा ली।इस जोड़ी ने कुल 8 बार फ़िल्म फेयर अवार्ड प्राप्त किये,सर्वप्रथम पदमश्री से सम्मानित किये गए।आज के कुछ संगीतकार देर सवेर भले ही उतने अवार्ड्स प्राप्त कर ले पर याद रखे कि यह अवार्ड्स उन्हें महान संगीतकारों के दौर मे मिले थे जिनका कोई सानी नहीं था।शंकर जयकिशन जैसी कर्णप्रियता लाना आज के संगीतकारों के वश की बात नहीं है।आज संगीत युगंधर शंकरजी की जन्म तिथि है में अपना यह आलेख पुष्प उन्हें सादर समर्पित करता हूँ।

कुछ विशेष टिप्पणियां दूसरे पाठकों द्वारा जो शंकर जयकिशन के मुरीद भी हैं

Dave Vijay  लिखते हैं कि :

शंकरजी (जय किशन) दोनों के बारे में कुछ भी मैं लिखू तो मैं छोटा पड़ जाऊंगा। मेरे अज़ीज़ मित्र Sss ने जो भी लिखा स्त प्रतिसत सच ही लिखा है।
आज मैं शंकरजी के बारे में कुछ लिखा रहा हु। जो मेरे हिसाब से सही है। जब जयकिशन जी का निधन हुआ तब शंकर जी अकेले पड गए थे। अचानक जय साब के जानेसे उनके ऊपर एक पहाड़ टूट पड़ा हो ऐसा वोह महसूस कर रहे थे।लेकिन ये आदमी हार माननेवालो में से नहीं था। अपने आप को उन्हों ने संभाल लिया और शंकर जयकिशन के नाम से ही म्यूजिक देना सुरु कर दिया। जब दोनों साथ में थे तब काम के ज्यादा भरण की वजह से दोनों अलग अलग फिल्मो का कार्यभार संभाल ने लगे थे। जरुरत पड़ने पर एक दूसरे के साथ स्स्लाह मशवरा करके काम करते थे। जय साब के निधन के बाद शंकरजी ने न केवल जय साब की फिल्मो का म्यूजिक पूरा किया लेकिन बाद में उन्होंने करीब 50 फिल्मो में और भी म्यूजिक दिया और शंकर जयकिशन के सूरज को अस्त नहीं होने दिया। और कई संगीतकार फ़िल्मी दुनिया में जोडियो में थे लेकिन ये कारनामा सिर्फ शंकरजी ने ही कर दिखाया। बाकी के संगीत कार पूरी तरह से विफल हो गए है। जब शंकरजी का निधन हुआ तब भी उनके पास 2 फिल्मो का करार था। ये इन्शान ने मौत को भी अपने पर हावी नहीं होने दिया मरते दम तक संगीत की साधना करते रहे और S J के नाम को कायम रखा। जय हो अमर S J की। 
राजजी के कैम्प से निकल ने के बाद शंकरजी अकेले हो गए थे। फिर भी ईमारत भलेही पुराणी थी लेकिन बुनियाद मजबूत थी उन्होंने अपने आप को संभाला और अन्पने काम में जुड़ गए । सोहनलाल कंवरजी राजेंद्र भाटियाजी और कुछ अन्या डायरेक्टर्स के साथ उन्होंने काम किया और सन्यासी दो जूथ दुनियादारी जंगल में मंगल आज की ताज़ा खबर नारी । हा दो और डायरेक्टर्स paacchi और आत्मरामजी के साथ भी काम किया। इत का जवाब पत्थर से इंटरनेशनल croook साजिस आत्माराम जैसी हिट्स फिल्मो में म्यूजिक दिया। अंत तक S J के बैनर के परचम को लहेराते रहे। धन्यवाद। S J की जय हो।

Shiv Shanker Gahlot  का कहना है कि :

बहुत सुन्दर लेख । शंकर जी की गाथा अनन्त है और उनके चाहने वाले पढ़ पढ़ कर आनन्दित रहते हैं ।

Raajeev Shrivaastav ने अपनी प्रतिक्रिया यों व्यक्त की :

शंकर-जयकिशन !
हिन्दुस्तानी सिने गीत-संगीत को भारत सहित विश्व के ढेरों देशों के जन मानस के ह्रदय से जोड़ने का प्रथम कार्य करने वाले संगीतकार जोड़े शंकर और जयकिशन वास्तव में सिने संगीत साम्राज्य के अब तक के एक मात्र ‘चक्रवर्ती सम्राट’ हैं.
शंकर-जयकिशन के सुरीले गीत-संगीत के ‘अश्वमेघ यज्ञ’ का अश्व जब भारत की सीमा लाँघ कर सुदूर तब के सोवियत रूस की धरती का स्पर्श करता हुआ अमरीका, कनाडा, जर्मनी, फ़्रांस, चीन सहित दक्षिण-पूर्व एशियाई के अनेकों देशों के व्योम की यात्रा करता हुआ इस सृष्टि के दशों दिशाओं में अपने कालजयी सरगम की पताका फहरा रहा था तब किसी भी राष्ट्र का गीत-संगीत उनके सुर-संग्राम को चुनौती देने की स्थिति में नहीं था. आज भी ‘आवारा हूँ’ और ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे उनके अनेकों गीतों की पुनरावृत्ति विश्व के कई देशों की वर्तमान पीढ़ी के अधरों पर सहज रूप से थिरक रही है. भारत के इस एकमात्र सर्वाधिक प्रतिभावान एवं प्रयोगवादी संगीतकार ने पाश्चात्य संगीत वाद्य यन्त्रों का जिस मनोयोग से भारतीयकरण किया उससे तब तो लोग अचम्भित हुए ही थे और आज भी अँग्रेज सहित पश्चिम के सभी संगीतकार उनके वाद्ययन्त्रों पर भारतीय धुनों को सजते हुए देख-सुन कर आश्चर्य से भर उठते हैं.
भारत के प्रथम और अब तक के एकमात्र ‘धर्म निरपेक्ष’ (सेक्युलर) संगीतकार शंकर-जयकिशन ही हैं. इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में लिखे मेरे पूर्व के आलेख को आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं —-https://www.facebook.com/notes/raajeev-shrivaastav/shanker-jaikishan-an-indian-musical-secular-face-the-emperor-of-filmfare/2149884102731   जिस अवधि (दौर) में हिन्दी सिने संगीत जगत में आर.के. कैम्प से जन्में और जीवन पर्यन्त इन्हीं के संग जुड़े रहने के शंकर-जयकिशन के संकल्प के समानान्तर जब संगीतकार नौशाद और सचिनदेव बर्मन ने देखा कि शंकर-जयकिशन गायक मुकेश के संग जुड़ कर राजकपूर के लिए धुनें सृजित कर रहे हैं तो पूर्ण सत्य को देखे-परखे बिना ही नौशाद ने मु. रफ़ी को और एस.डी. बर्मन ने किशोर कुमार को अपना स्थायी गायक (पुरुष स्वर) बना लिया. सिनेमा और संगीत के इतिहासवेत्ता (Film & Music Historian) के रूप में अपने शोध एवं अध्यन से मेरा आंकलन तथा निष्कर्ष यह रहा है कि ऐसा कर के नौशाद और एस.डी. बर्मन ने स्वयं अपना और सिने संगीत का अहित किया है. इन दोनों ही संगीतकारों के कई-कई गीत ऐसे हैं जिनमें क्रमशः रफ़ी और किशोर के स्थान पर वे अन्य दूसरे गायक से उसे और प्रभावी रूप में प्रस्तुत कर सकते थे. यदि ये शंकर-जयकिशन की तरह उदारवादी वृत्ति के होते तो सम्भवतः धर्म निरपेक्ष संगीतकारों में इनका भी नाम जुड़ जाता. आवश्यकता पड़ने पर शंकर-जयकिशन ने राजकपूर के लिए मुकेश के स्थान पर मन्ना डे से गवाया है तथा गीतों की प्रकृति के अनुरूप इस जोड़े ने मु. रफ़ी और किशोर कुमार से गीत गवाने में कभी भी परहेज नहीं किया. यहाँ तक की तलत महमूद, हेमन्त कुमार, महेन्द्र कपूर, सुबीर सेन, शमशाद बेग़म, आशा भोसले, शारदा, सुमन कल्याणपुर, मुबारक बेग़म के ढेरों श्रेष्ठ गीत इन्हीं के संगीतबद्ध किये हुए हैं. मु. रफ़ी के गायन में चमत्कारिक सुरीलेपन और ‘याहू’ सरीखा उन्मुक्त प्रभाव उत्पन्न करने का श्रेय तथा किशोर कुमार के ‘उड्लई’ शैली को नूतन प्रभाव देने का श्रेय शंकर-जयकिशन को ही जाता है. ऐसा शंकर-जयकिशन के ‘धर्म निरपेक्ष’ (Secular) उदारवादी मनोवृत्ति के कारण ही सम्भव हो सका था.
हाँ, भारत का ‘ऑस्कर’ कहा जाने वाला ‘फ़िल्मफ़ेयर’ पुरस्कार किसी एक श्रेणी और विधा में सर्वाधिक बार अर्जित करने वाले संगीतकार भी शंकर-जयकिशन ही तो हैं. सुरों के अद्भुत चितेरे इस संगीतकार की अपूर्व प्रेरणा ने ही मुझे उन पर एक कविता रचने का सौभाग्य प्रदान किया जिसे मैंने सर्वप्रथम भाई Sudarshan Pandey जी के संग साझा किया था. शंकर-जयकिशन पर लिखी गयी मेरी कविता जो उन्हीं के द्वारा रची गयी एक धुन पर आधारित है को आप सभी इस लिंक पर पढ़ सकते हैं —- https://www.facebook.com/notes/raajeev-shrivaastav/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%95-%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%A8-sargam-saadhak-shankar-jaikishan-/10202758399937174
आज यह सिद्ध हो चुका है की महान शंकर-जयकिशन विगत, वर्तमान और आगत के एकमात्र स्वयम्भू कालजयी संगीतकार हैं.
मंगल कामनाएं !
डॉ. राजीव श्रीवास्तव Dr Raajeev Shrivaastav

Shyam Shankar Sharma राजीव श्रीवास्तव जी के पोस्ट पर उत्तर देते हुये कहते हैं:

परम आदरणीय सर राजीव श्रीवास्तव जी,आपकी कलम में जादू है जो ह्रदय को स्पर्श करती है।आलेख का उत्तर आलेख वो भी प्रश्नो से परे।आपने जिस खूबी से SJ को सम्मान दिया है वो अप्रितम है।आज मे सांय 4 बजे दूरदर्शन के सांध्य कालीन कार्यक्रम मे शंकरजी के ऊपर बनाये कार्यक्रम को देख रहा था,तो बरबस आपकी याद आ गयी। सुरेश पुजारी , सिने इतिहासकार वही कुछ बता रहे थे जो आपने अपने आलेख मे प्रस्तुत किया है।शंकर जय किशन के बारे मे जो शब्द रचना सच्चाई से प्रस्तुत की है उससे मे अभिभूत हूँ और स्वयं को धन्य मानता हूँ कि इतने बड़े सिने इतिहासकार ने मेरी पोस्ट को मान दिया जो आपकी कविता का चरित्र उजागर करता है और आपकी विशालता को दर्शाता है।मैने अपने सम्पूर्ण जीवन मे हिंदी मे शंकर जयकिशन के ऊपर लिखे इतने उत्कृष्ठ आलेख को नहीं पड़ा।मै आपके लिंक्स पर जाकर जरूर लाभ प्राप्त करूँगा। एक मात्र धर्म निर्परक्ष संगीतकार शंकर जयकिशन को बताकर आपने उनकी खूबियों का सारांश लिख दिया।आपने सत्य ही लिखा की महान शंकर जयकिशन विगत, वर्तमान और आगत के एक मात्र कालजयी संगीतकार है। मेरा सादर प्रणाम। लिंक पर तो मे जाऊंगा पर जो कविता आपने सुदर्शनजी के संग साँझा की थी उसे मेरी इस पोस्ट पर प्रस्तुत कर मुझे कृतार्थ करे।पुनः नमन।

DrArdhaangini Kulshreshth का कहना है कि :

श्रीमान श्याम शंकर शर्मा जी का महान संगीतकार शंकर-जयकिशन पर सारगर्भित आलेख अत्यन्त ही तथ्यपरक एवं सूचनापूर्ण लगा. बधाई !
सम्भवतः आपके ही प्रस्तुत आलेख को सुरीला विस्तार देते हुए Dr Raajeev Shrivaastavसर ने ऊपर अपना जो लघु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है.
हिन्दी सिनेमा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार युगल शंकर-जयकिशन के कृतित्व का इतना गहन शोधपूर्ण अध्यन जिस प्रकार सिने संगीत के इतिहासवेत्ता के रूप में Dr Raajeev Shrivaastav सर ने प्रस्तुत किया है वह उन सब के लिए एक आँखे खोलने जैसा उपक्रम है. जो तथाकथित संगीत के महाग्यानी लोग अब तक शंकर-जयकिशन की अद्भुत प्रतिभा को विस्मृत करते रहे हैं उनके लिए इस आलेख से वृहद् सत्य का और क्या साक्ष्य हो सकता है ?
धर्म निरपेक्षता के मन्त्र को कोई भी हमारे देश की राजनीति में तो नहीं साध सका पर प्रयोगवादी के धनी संगीतकार शंकर-जयकिशन ने उसे सिने गीत-संगीत में अत्यन्त ही संतुलित एवं सहज रूप से क्रियान्वित कर के दिखा दिया. यह एक ऐसा महत्वपूर्ण क्रियान्वयन था जिसे तब मौन रह कर शंकर-जयकिशन ने व्यवहार रूप दे दिया था पर उस उदारवादी कार्य को आज Dr Raajeev Shrivaastav सर ने साक्ष्य के संग यहाँ सिद्ध कर दिया है.
‘फिल्मफ़ेयर’ पुरस्कारों पर शंकर-जयकिशन की श्रेष्ठता भी उनकी विशिष्ठ उपलब्धियों की एक महत्वपूर्ण पूँजी है. जी, विश्व में संगीत के एकमात्र ‘चक्रवर्ती सम्राट’ शंकर-जयकिशन ही हैं.
हार्दिक आभार एवं आत्मिक अभिनन्दन !

Shyam Shankar Sharma ने अर्धांगिनी कुलश्रेष्ठ जी की टिप्पणी पर कहा:
अर्धांगिनी कुलश्रेष्ठ जी, आपने मेरे आलेख् की सराहना कर मुझे कृतार्थ किया है।वस्तुतः में बाल्यकाल से ही उनके संगीत की शक्ति के प्रभाव क्षेत्र में आ गया था,और जब किशोर अवस्था में आया तो मुझे महसूस होने लगा की यह मुझे आनंद देता है।मे उनका नाम पड़कर ही फ़िल्म देखने जाता,उनके गानो को आत्म सात करता और पार्श्व संगीत मे उनकी खूबियों को समझता।में कलात्मक स्वाभाव का था पर घरवालों की इच्छा साइंस पढ़ाने की थी और उस वक़्त माता पिता की अवज्ञा करना आता ही नहीं था,मे अध्यन करता और ख़ाली समय में शरद,बंकिम,तारा शंकर वन्धोंपाध्याय,विमल मित्र,प्रेम चन्द की कृतियों को पड़ता।रेडियो पर गाने सीमित समय पर आते थे उस वक़्त का इंतज़ार करता।वक़्त ने मुझे फॉरेंसिक साइंस में वैज्ञानिक अधिकारी बना दिया और जॉब भी 24 घंटे की होती क्योंकि अपराध का कोई समय नहीं होता।में फ़िल्मो से दूर होता गया किन्तु विज्ञानं की प्रगति ने संगीत की उपलब्धता को आसान बना दिया और शंकर जयकिशन के संगीत से सजे गाने अब असली मजा देने लगे ,उनके संगीत की यही विशेषता है की वो समय से आगे रहते है यही कारण है की वो आज भी जीवंत है। 1912 में सेवानिवृति के बाद जहाँ जहाँ इंसान को वक़्त नहीं गुजरता किन्तु मुझे समय नहीं मिलता,आध्यात्मिक ज्ञान के बाद खाली समय शंकर जयकिशन के संगीत और पोते को पढ़ाने के सहारे आसानी से गुजारकर,एक दो घंटे जब नितांत अकेला होतो हूँ सोशल मीडिया पर गुजारता हूँ इसका मुझे यह लाभ मिला की बचपन की अधूरी प्यास कुछ कुछ तो बुझी और आप जैसी ज्ञानी विभूतियों के संपर्क में आया जिनमे आदरणीय डा.राजीव जी प्रमुख है इनका लेखन,शैलि, शब्द चयन इतना प्रभावशाली है की व्यक्ति अभिव्यक्ति करना भूल जाता है।शंकर जयकिशन पर जो आलेख उन्होंने लिखा वो अदभुद है,आपने उनके लेख के साथ जिस प्रकार जाकर शंकर जयकिशन की उपलब्द्धियों को उजागर किया है वो सचमुच अप्रितम है और उन महा ज्ञानी लोगो की आँखे खोलने को पर्याप्त है जो उनकी सृजन क्षमता का सही आंकलन ही नहीं कर सके कारण ये लोग प्रयोगवादी नहीं अपितु अवसरवादी है? और ज्ञान प्रयोगवादी के पास होता जो समय के साथ और निखरता है।आपका असीम आभार।

Dharma Kirthi जी ने अपने उदगार इन शब्दों में व्यक्त किये :
Shyam Shankarji, Dr.Rajeev Srivastav and Ardhaangini Kulshreshthji…the three of you have taken this discussion on the matchless and timeless genius of Shankar Jaikishan’s work to a philosophical level. I have no words to praise the quality of discussion and precise analytical observations.
One thing, which pleased me no end is the article about SJ’s Secular approach to singers and technicians, at a time when the industry was very sharply divided on parochial lines.
I was planning a detailed write up on this subject as this was bothering me since very young age…say from 1984 to be precise…
This article has strengthened my resolve to do that article, with stronger determination….!
Many thanks to all of you…!!
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लेकिन श्री Bhalchandra Wani जी ने सौ टके की बात की. उन्होने कहा कि :  Scientists might discover another Sun in the universe but there will never be another like the Great SHANKER JAIKISHEN